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411 समाचार
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अभंग

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अभंग विट्ठल या विठोबा की स्तुति में गाये गये छन्दों को कहते हैं। महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के संतों ने 13वीं सदी के दौरान समाज में अलख जगाने के जो छंद क्षेत्रीय भाषा में गाये, उन्हें अभंग के नाम से जाना जाता है। यह एक प्रकार से हिंदी के छंद की तरह है। मोटे और पर छंद के उलट, अभंग में मात्राओं के स्थान पर अक्षरों की संख्या गिनी जाती है। अक्षरों की संख्या का पालन कठोरता से नहीं किया जाता बल्कि, यों कहना सही होगा कि उच्चारण की सुविधानुसार अक्षरों की संख्या कम-ज्यादा हो सकती है। अभंग क्या है ? अभंग और भजन पर्यायवाची हैं। अभंग शब्द दो शब्दों "अ" और "भंग" से मिलकर बना है। भंग शब्द का अर्थ है टूटा हुआ और इसके आगे अ का अर्थ है अटूट या अटूट। अब अटूट या अखण्ड क्या है? इसे कई तरीकों से देखा जा सकता है: अभंगों में वर्णित विषय भगवान है - सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी भगवान - कोई है जो पूरे ब्रह्मांड पर निर्बाध और अनवरत कृपा बरसाता है | इन अभंगों में दिए गए भक्ति सिद्धांत, सार्वभौमिक सत्य अटूट हैं। ये सनातन सत्य हैं और इस दुनिया के अंत और उसके बाद भी रहेंगे। अभंग हर युग में प्रासंगिक हैं। चाहे वे किसी भी काल में गाए गए हों, उनकी प्रासंगिकता बरकरार रहती है। जब भी उन्हें गाया, सुना, पढ़ा और पढ़ा जाएगा, वे सभी उम्र के भक्तों को प्रेरित करते रहेंगे। अभंग जो खुशी और खुशी देते हैं वह अटूट है। ये अभंग आपको स्थायी और निरंतर खुशी की ओर ले जाते हैं। मन खुशियों का भंडार बन जाता है और फिर उस खुशी का कोई अंत नहीं होता।https://www.amrutwani.com/Introduction.aspx What is Abhanga? अंगूठाकार|पाठ=अभंग|अभंग अभंग दो प्रकार के होते हैं - चार चरणों के और दो चरणों के.चार चरणों वाले अभंग की प्रथम तीन चरणों में 6-6 अक्षर होते हैं जबकि अंतिम चरण में चार अक्षर. इसके साथ ही दूसरे और तीसरे चरणों में यमक का पुट होता है। रही बात चौथा चरण की तो वह अभंग को पूर्णता प्रदान करता है- काय करूँ आता, धरुनिया भीड़ नि:शंक हे तोंड, वाजविले।। नव्हे जगी कोणी, मुक्तियांचा जाण सार्थक लाजुण, नव्हे हित।। दो चरणों वाले अभंग के प्रत्येक चरण में 8-8 अक्षर होते हैं और अंत में यमक होता है- जे का रंजले गांजले। त्यासी म्हणे जो आपुले।। पुढे गेले हरीचे दास । त्यांची आस आम्हांसी ॥१॥ त्याची मार्गीं आम्हीं जाऊं । वाचे गाऊं विठ्ठला ॥२॥ संसाराचा न करुं धंदा । हरुषें सदा नाम गाऊं ॥३॥ एका जनार्दनीं डोळे । पहाती पाउलें कोंवळें 2 बाहरी कड़ियाँ तुकाराम के अभंग (DV-TTYogesh फॉण्ट में) मराठी अभंग का संग्रह https://web.archive.org/web/20200809054541/https://santsahitya.org/category/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%A1%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%B0%E0%A4%B9/ 9 अगस्त 2020 (युनिकोड फॉन्ट) श्रेणी:भारतीय संगीत