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411 समाचार
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प्राणनाथ पटनायक

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प्राणनाथ पट्टनायक ପ୍ରାଣନାଥ ପଟ୍ଟନାୟକ ओड़िआ १६ नवंबर १९०५ डिमिरी, पुरी जिला, ओड़िशा ५ अक्टूबर १९७० ओड़िशा, भारत भारतीय काशी विद्यापीठ स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, लेखक किसान आंदोलन, समाजवादी आंदोलन, प्रजामंडल आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसभारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ओड़िशा विधानसभा के सदस्य खुर्दा १९५७ १९६१ प्राणनाथ पट्टनायक (१६ नवंबर १९०५ – ५ अक्टूबर १९७०) ओड़िशा के स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी और किसान नेता, राजनीतिज्ञ तथा लेखक थे। वे ओड़िशा में समाजवादी और किसान आंदोलनों के प्रारंभिक नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार कारावास भोगा। बाद में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और ओड़िशा में किसान आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।Mishra Akhaya Kumar Contribution of Prananath Pattnaik in Freedom Movement in Odisha International Journal of English Language, Literature and Humanities 2016 वे राणपुर प्रजामंडल आंदोलन से भी जुड़े थे। १९३९ में राणपुर के राजनीतिक एजेंट मेजर आर. एल. बजेलगेट की हत्या के बाद गिरफ्तार किए गए आंदोलनकारियों के बचाव के लिए उन्होंने अन्य समाजवादी नेताओं के साथ एक रक्षा समिति गठित करने में भूमिका निभाई।अतुल चंद्र प्रधान Freedom Movement in Khurda Orissa Review 2007 August Government of Odisha स्वतंत्रता के बाद भी वे सक्रिय राजनीति में रहे और १९५७ के चुनाव में खुर्दा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ओड़िशा विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए।1957 Orissa Legislative Assembly election Election-related archival records प्रारंभिक जीवन और शिक्षा प्राणनाथ पट्टनायक का जन्म १६ नवंबर १९०५ को तत्कालीन पुरी जिले के कनास क्षेत्र के डिमिरी गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम मदनमोहन पट्टनायक था। उनका परिवार सामाजिक रूप से सक्रिय था और स्थानीय क्षेत्र में उनके पिता की प्रतिष्ठा थी। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव और कनास में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने पुरी जिला विद्यालय में प्रवेश लिया। विद्यार्थी जीवन में ही उनमें राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति रुचि उत्पन्न हुई। आगे चलकर वे कटक के रेवेनशॉ कॉलेज में अध्ययन करने लगे। वहीं रहते हुए १९३० के सविनय अवज्ञा आंदोलन से प्रभावित होकर वे राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। बाद में उन्होंने काशी विद्यापीठ से बी.ए. की शिक्षा प्राप्त की। काशी में अध्ययन के दौरान राष्ट्रीय आंदोलन, समाजवादी विचारधारा और औपनिवेशिक शासन के विरोध से उनका संपर्क और गहरा हुआ।Prananath Pattnaik — MLA Profile, Khurda Constituency Odisha legislative biographical records स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी १९३० में राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश के बाद प्राणनाथ पट्टनायक ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हो गए। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। उपलब्ध जीवनी संबंधी अभिलेखों के अनुसार उन्होंने १९३०, १९३२, १९३९, १९४० और १९४२ के विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया तथा कुल मिलाकर लगभग दस बार कारावास भोगा। उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ केवल ब्रिटिश शासन के विरोध तक सीमित नहीं थीं। वे ग्रामीण गरीबों, किसानों और श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जोड़ने के पक्षधर थे। इसी कारण वे धीरे-धीरे समाजवादी और किसान आंदोलनों के प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल हो गए। समाजवादी आंदोलन प्राणनाथ पट्टनायक ओड़िशा में समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक नेताओं में से थे। १९३४ में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ, तब वे ओड़िशा में इसके प्रारंभिक संगठन से जुड़े और इसके प्रथम अध्यक्षों में रहे। समाजवादी आंदोलन के माध्यम से उन्होंने किसानों और ग्रामीण जनता के बीच राजनीतिक चेतना फैलाने का प्रयास किया। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल ब्रिटिश शासन का अंत नहीं था, बल्कि आर्थिक और सामाजिक असमानताओं में कमी तथा किसानों और श्रमिकों के अधिकारों की स्थापना भी था। ओड़िशा में समाजवादी आंदोलन के विस्तार में उनके साथ नबाकृष्ण चौधरी, भगवती चरण पाणिग्राही, गुरुचरण पट्टनायक, सचिदानंद राउतराय और अन्य समाजवादी तथा वामपंथी कार्यकर्ता जुड़े हुए थे। किसान आंदोलन प्राणनाथ पट्टनायक ओड़िशा के किसान आंदोलन के प्रमुख प्रारंभिक संगठकों में थे। १९३५ में गठित उत्कल प्रांतीय किसान सभा से वे जुड़े और बाद में ओड़िशा में अखिल भारतीय किसान सभा की गतिविधियों के विस्तार में योगदान दिया। उनका किसान आंदोलन मुख्यतः किसानों की भूमि, लगान, वन अधिकार और सामंती शोषण से संबंधित समस्याओं पर केंद्रित था। खुर्दा और आसपास के क्षेत्रों में उन्होंने किसानों को संगठित करने तथा ग्रामीण जनता में राजनीतिक चेतना विकसित करने का प्रयास किया। १९३६ के बाद खुर्दा क्षेत्र में किसान सभाओं और समाजवादी गतिविधियों का विस्तार हुआ। प्राणनाथ पट्टनायक, गंगाधर मिश्र, गोकुल मोहन रायचूड़ामणि तथा अन्य नेताओं ने किसानों को संगठित करने में भूमिका निभाई। राणपुर प्रजामंडल आंदोलन प्राणनाथ पट्टनायक का संबंध तत्कालीन देशी रियासतों में चल रहे प्रजामंडल आंदोलन से भी था। राणपुर में १९३८ में प्रजामंडल का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य रियासत की निरंकुश शासन-व्यवस्था के विरुद्ध प्रजा के अधिकारों की माँग करना था। रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा इसके प्रमुख नेताओं में थे।The Prajamandal Movement in Orissa: Ranpur in Retrospect Orissa Review 2005 August Government of Odisha जनवरी १९३९ में राणपुर प्रजामंडल को गैरकानूनी घोषित किए जाने और उसके नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन उग्र हो गया। ५ जनवरी १९३९ को राणपुर में बड़ी भीड़ एकत्र हुई और ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट मेजर आर. एल. बजेलगेट की हत्या हो गई। इस घटना के बाद अनेक आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया। प्राणनाथ पट्टनायक ने राणपुर के गिरफ्तार आंदोलनकारियों के बचाव के लिए समाजवादी नेताओं के साथ मिलकर एक रक्षा समिति गठित की। इस समिति की अध्यक्षता अधिवक्ता लोकनाथ मिश्र ने की। दीनबंधु साहू, गदाधर जेना और शत्रुघ्न महान्ती ने अभियुक्तों की ओर से वकालत की। इस भूमिका के कारण प्राणनाथ पट्टनायक राणपुर प्रजामंडल आंदोलन के समर्थन में सक्रिय रहने वाले ओड़िशा के समाजवादी नेताओं में शामिल हुए। साम्यवादी आंदोलन १९३० के दशक के मध्य तक प्राणनाथ पट्टनायक समाजवादी राजनीति से आगे बढ़कर साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए। १९३६ में उन्होंने गुरुचरण पट्टनायक और भगवती चरण पाणिग्राही के साथ मिलकर ओड़िशा में साम्यवादी संगठन के निर्माण में भूमिका निभाई। ओड़िशा में कम्युनिस्ट आंदोलन के शुरुआती चरण में पार्टी की गतिविधियाँ मुख्यतः किसानों और मजदूरों के बीच संगठन निर्माण तथा साम्राज्यवाद और सामंती शोषण के विरोध पर केंद्रित थीं। खुर्दा, जटणी, चंदका, बोलगढ़ और बेगुनिया क्षेत्रों में प्राणनाथ पट्टनायक का प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय था। १९३९ तक कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के भीतर साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित कार्यकर्ताओं का एक अलग समूह विकसित हो गया था। प्राणनाथ पट्टनायक कांग्रेस से जुड़े रहने के साथ-साथ किसान और वामपंथी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते रहे। व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन १९४० में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान प्राणनाथ पट्टनायक ने खुर्दा में गांधी का संदेश जनता तक पहुँचाया। दिसंबर १९४० में एक सभा में गांधी का संदेश पढ़ने के बाद उन्हें व्यक्तिगत सत्याग्रही के रूप में गिरफ्तार किया गया। १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी ओड़िशा में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक गतिविधियाँ हुईं। प्राणनाथ पट्टनायक का राजनीतिक प्रभाव खुर्दा और आसपास के क्षेत्रों में बना रहा। उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों में बार-बार गिरफ्तार किया गया। स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक जीवन भारत की स्वतंत्रता के बाद प्राणनाथ पट्टनायक ने सक्रिय राजनीति जारी रखी। वे किसानों और श्रमिकों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक मंच पर उठाते रहे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। १९५७ के ओड़िशा विधानसभा चुनाव में वे खुर्दा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए। वे द्वितीय ओड़िशा विधानसभा के सदस्य रहे। विधानसभा में उन्होंने गरीबों, किसानों और वंचित वर्गों से जुड़े प्रश्नों को उठाया। उनका राजनीतिक कार्यक्षेत्र मुख्यतः खुर्दा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्रित रहा। शिक्षा के क्षेत्र में योगदान प्राणनाथ पट्टनायक शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण साधन मानते थे। उन्होंने खुर्दा और जटणी क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना तथा उनके विकास में योगदान दिया। उनके प्रयासों से खुर्दा कॉलेज, जटणी हाई स्कूल और जयीराजगुरु हाई स्कूल जैसे संस्थानों के विकास को प्रोत्साहन मिला। उनके सामाजिक कार्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार और सामान्य जनता में राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना उत्पन्न करना महत्वपूर्ण था। साहित्यिक गतिविधियाँ राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के अतिरिक्त प्राणनाथ पट्टनायक साहित्य से भी जुड़े हुए थे। उन्होंने ओड़िआ भाषा में सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन किया। उनकी प्रमुख कृतियों में अशांत कलिर साहित्य (Ashanta Kalira Sahitya), गीता संस्कृति (Geeta Sanskruti), प्रबासरे ओड़िआ संस्कृति (Prabasare Odia Sanskruti) तथा ओड़िशा के कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास से संबंधित लेखन का उल्लेख मिलता है। वे ओड़िआ साप्ताहिक पत्रिका नुआ दुनिया के संपादन से भी जुड़े रहे। पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने सामाजिक समानता, किसान-मजदूर अधिकार और प्रगतिशील विचारों का प्रचार किया। सोवियत संघ की यात्रा १९६४–६५ के दौरान प्राणनाथ पट्टनायक भारतीय पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में सोवियत संघ गए। यह यात्रा उनके राजनीतिक और पत्रकारिता संबंधी जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग थी। मृत्यु प्राणनाथ पट्टनायक का निधन ५ अक्टूबर १९७० को हुआ। उनके निधन के बाद ओड़िशा के स्वतंत्रता आंदोलन, समाजवादी राजनीति और किसान आंदोलन में उनके योगदान को विभिन्न लेखों और स्मृतियों में रेखांकित किया गया। विरासत प्राणनाथ पट्टनायक का सार्वजनिक जीवन ओड़िशा के स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रवादी, समाजवादी और किसान आंदोलनों के परस्पर संबंध का उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को ग्रामीण जनता और किसानों के प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया। राणपुर प्रजामंडल आंदोलन के दौरान गिरफ्तार आंदोलनकारियों के लिए रक्षा समिति के गठन में उनकी भूमिका तथा खुर्दा क्षेत्र में किसान आंदोलन के संगठन ने उन्हें ओड़िशा के प्रजामंडल और किसान आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया। स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने संसदीय राजनीति, पत्रकारिता, शिक्षा और किसान आंदोलन के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई। प्रमुख कृतियाँ आसन्ता कालिर साहित्य गीता संस्कृति प्रबासरे ओड़िआ संस्कृति History of Communist Movement in Orissa यह भी देखें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ओड़िशा विधानसभा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ Contribution of Prananath Pattnaik in Freedom Movement in Odisha Freedom Movement in Khurda — Orissa Review Prananath Pattnaik — Khurda विधानसभा संबंधी जीवनी https://web.archive.org/web/20260216174229/https://naveenpatnaik.com/MLA-Prananath-Pattnaik-of-KHURDA-constituency-1095.html 16 फ़रवरी 2026 प्राणनाथ पट्टनायक — ओड़िआ विकिपीडिया श्रेणी:१९०५ में जन्म श्रेणी:१९७० में निधन 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