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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

लैला अल-आमिरिया

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लैला अल-आमिरिया ليلى العامرية ar Frontispiece to Laili and Majnun, a poem, from the original Persian of Nazami.jpg 250px निज़ामी की 'लैला-मजनूँ' की एक ऐतिहासिक फ़ारसी पांडुलिपि का मुख्य पृष्ठ लैला बिन्त महदी बिन सअद अल-आमिरिया लगभग 648 ईस्वी (28 हिजरी) नज्द, अरब प्रायद्वीप लगभग 688 ईस्वी (68 हिजरी) ताइफ़, अरब प्रायद्वीप अरबी कवयित्री 'लैला-मजनूँ' आख्यान, अरबी कविता वर्द बिन मुहम्मद अल-उकैली लैला अल-आमिरिया (अरबी: ليلى العامرية; जन्म: लगभग 648 ईस्वी – निधन: 688 ईस्वी) उम्मय्यद काल की एक अरबी कवयित्री थीं। उनका मूल नाम 'लैला बिन्त महदी बिन सअद अल-आमिरिया' था। अरबी और फ़ारसी साहित्य में उन्हें मुख्य रूप से कवि क़ैस इब्न अल-मुलाव्वाह (जिन्हें 'मजनूँ' कहा जाता है) की प्रेमिका के रूप में जाना जाता है। साहित्यिक शोधों के अनुसार लैला केवल एक प्रेरणा या काल्पनिक पात्र नहीं थीं, बल्कि उन्होंने स्वयं भी कविताएँ रची थीं जो शास्त्रीय अरबी साहित्य का हिस्सा हैं।https://poetsgate.com/poet.php?pt=2585 بوابة الشعراء - ليلى العامرية بوابة الشعراء ar 2026-03-18 प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि लैला का जन्म अरब प्रायद्वीप के नज्द क्षेत्र में बनू आमिर कबीले में हुआ था। ऐतिहासिक स्रोतों और आख्यानों के अनुसार, लैला और क़ैस एक ही कबीले से थे। उनके संबंध को 'उध्री प्रेम' (विशुद्ध और आध्यात्मिक प्रेम पर आधारित एक अरबी साहित्यिक परंपरा) का प्रतीक माना जाता है, जो तत्कालीन अरबी काव्य का एक प्रमुख विषय था।بن خميس عبد الله معجم اليمامة 1 95 ar विवाह और सामाजिक स्थिति युवावस्था में क़ैस ने अपनी कविताओं में लैला के प्रति अपने लगाव का सार्वजनिक रूप से वर्णन करना शुरू किया। तत्कालीन अरब समाज की परंपराओं के अनुसार, विवाह से पूर्व इस प्रकार का सार्वजनिक वर्णन परिवार के लिए अनुचित माना जाता था। इसी सामाजिक मान्यता के कारण, जब क़ैस ने लैला के पिता के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, तो उसे अस्वीकार कर दिया गया।قواميس عربي http://ara.bi/poetry/86023/%D9%83%D9%84%D8%A7%D9%86%D8%A7-%D9%85%D8%B8%D9%87%D8%B1-%D9%84%D9%84%D9%86%D8%A7%D8%B3-%D8%A8%D8%BA%D8%B6%D8%A7/ 14 जुलाई 2014 ar 18 मार्च 2026 https://web.archive.org/web/20140714183032/http://ara.bi/poetry/86023/%D9%83%D9%84%D8%A7%D9%86%D8%A7-%D9%85%D8%B8%D9%87%D8%B1-%D9%84%D9%84%D9%86%D8%A7%D8%B3-%D8%A8%D8%BA%D8%B6%D8%A7/ dead इसके पश्चात्, लैला के परिवार ने उनका विवाह उसी कबीले के 'वर्द बिन मुहम्मद अल-उकैली' नामक व्यक्ति से कर दिया। विवाह के बाद लैला अपने पति के साथ नज्द छोड़कर ताइफ़ शहर चली गईं। इस अलगाव के कारण क़ैस का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और समाज में उन्हें 'मजनूँ' (विक्षिप्त) कहा जाने लगा।قواميس عربي http://ara.bi/poetry/86023/%D9%83%D9%84%D8%A7%D9%86%D8%A7-%D9%85%D8%B8%D9%87%D8%B1-%D9%84%D9%84%D9%86%D8%A7%D8%B3-%D8%A8%D8%BA%D8%B6%D8%A7/ 14 जुलाई 2014 ar 18 मार्च 2026 https://web.archive.org/web/20140714183032/http://ara.bi/poetry/86023/%D9%83%D9%84%D8%A7%D9%86%D8%A7-%D9%85%D8%B8%D9%87%D8%B1-%D9%84%D9%84%D9%86%D8%A7%D8%B3-%D8%A8%D8%BA%D8%B6%D8%A7/ dead साहित्यिक योगदान यद्यपि लैला को मुख्य रूप से मजनूँ की कविताओं की नायिका माना जाता है, अरबी साहित्य के अभिलेखागारों में उनके नाम से भी कविताएँ दर्ज हैं। इन कविताओं में अलगाव और सामाजिक बंधनों का वर्णन मिलता है। उन्होंने क़ैस की कविताओं के उत्तर में भी रचनाएँ की थीं, जिनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं: "नफ़्सी फ़िदाउक..." (मेरा प्राण तुम पर न्योछावर है, यदि मेरा अपने प्राणों पर अधिकार होता...): इस कविता में लैला अपनी विवशता को व्यक्त करती हैं।https://poetsgate.com/poem.php?pm=84935 نفسي فداؤك لو نفسي ملكت اذا - ليلى العامرية بوابة الشعراء ar 2026-03-18 "अला लैता शिअरी..." (काश मुझे ज्ञात होता...): इसमें दूरी के बावजूद प्रेम का वर्णन है।https://poetsgate.com/poem.php?pm=84936 الا ليت شعري والخطوب كثيرة - ليلى العامرية بوابة الشعراء ar 2026-03-18 "उखबिर्तु अन्नाक़..." (मुझे सूचना मिली है कि तुम मेरे कारण विक्षिप्त हो गए हो...): यह कविता क़ैस की मानसिक स्थिति पर उनकी प्रतिक्रिया दर्शाती है।https://poetsgate.com/poem.php?pm=84937 اخبرت انك من اجلي جننت وقد - ليلى العامرية بوابة الشعراء ar 2026-03-18 मृत्यु और सांस्कृतिक प्रभाव ताइफ़ में रहते हुए, लैला बीमार पड़ गईं और लगभग 688 ईस्वी (68 हिजरी) में उनका निधन हो गया। साहित्यिक आख्यानों के अनुसार, जब क़ैस को उनकी मृत्यु का समाचार मिला, तो वे उनकी कब्र पर गए और कुछ समय बाद वहीं उनका भी निधन हो गया। लैला अल-आमिरिया की ऐतिहासिक वास्तविकता समय के साथ किंवदंतियों में परिवर्तित हो गई। 12वीं शताब्दी में फ़ारसी कवि निज़ामी गंजवी ने 'लैलत उल-मजनूँ' नामक महाकाव्य लिखा, जिसने इस पात्र को सूफीवाद का प्रतीक बना दिया। इसके बाद लैला का नाम दक्षिण एशियाई, तुर्की, फ़ारसी और अरबी साहित्यों में एक प्रमुख सांस्कृतिक प्रतीक बन गया। इन्हें भी देखें क़ैस इब्न अल-मुलाव्वह सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ विकिडाटा पर लैला अल-आमिरिया श्रेणी:अरबी भाषा के कवि श्रेणी:648 में जन्मे लोग श्रेणी:688 में निधन श्रेणी:महिला कवयित्री श्रेणी:उम्मय्यद काल