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411 समाचार
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युग संधि

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दो युगों के बीच का समय संधि काल या युग संधि नाम से जाना जाता है| प्रस्तुत लेख यहाँ पर कलियुग और सतियुग के बीच के समय को इंगित करता है | काल गणना के संदर्भ में युग शब्द का उपयोग अनेक प्रकार से होता है। जिन दिनों जिस प्रचलन या प्रभाव की बहुलता होती है उसे उसी नाम से पुकारा जाने लगता है। रामराज्य के दिनों की सर्वतोन्मुखी प्रगति, शांति और सुव्यवस्था को सतयुग के नाम से जाना जाता है। कृष्ण की विशाल भारत निर्माण सम्बंधी योजना के एक संघर्ष पक्ष को महाभारत का नाम दिया जाता हे। परीक्षित के काल में कलयुग के आगमन और उससे राजा के संभाषण अनुबंधों का पुराण गाथा में वर्णन है। अब भी रोबोट युग, कम्प्यूटर युग, विज्ञान युग आदि की चर्चा होती रहती हैं। अनेक लेखक अपनी रचनाओं के नाम युग शब्द जोड़कर करते है। यहाँ युग शब्द का अर्थ जमाने से है। जमाना अर्थात उल्लेखनीय विशेषता वाला जमाना, एक एरा, एक पीरियड इसी संदर्भ में आमतौर से 'युग' शब्द का प्रयोग होता है। इसी भाँति पंचांगों में कितने ही संवत्सरों के आरंभ संबंधी मान्यताओं की चर्चा है। एक मत के अनुसार युग करोड़ों वर्ष का होता है। इस आधार पर मानवीय सभ्यता की शुरुआत के खरबों वर्ष बीत चुके हैं और वर्तमान कलयुग की समाप्ति में अभी लाखों वर्ष की देरी है। पर उपलब्ध रिकार्डों के आधार पर नृतत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों का कहना है कि मानवीय विकास अधिकतम उन्नीस लाख वर्ष पुराना है, इसकी पुष्टि भी आधुनिक तकनीकों द्वारा की जा चुकी है। इस प्रकार कृत युग के आदि और अन्त में प्रत्येक और चार सौ वर्ष त्रेता युग के आगे और पीछे प्रत्येक ओर तीन सौ वर्ष का, द्वापर के पहले और बाद में प्रत्येक ओर दो सौ वर्ष का तथा सन्धिकाल होता है, सब मिलाकर चारों युगों का आदि अन्त सहित सन्धि काल दो हजार वर्ष का आदि अन्त सहित सन्धि काल दो हजार वर्ष का होता है। ये दो हजार वर्ष और पहले बताये हुए सांख्य मतानुसार चारों युगों के दस हजार वर्ष मिलाकर कुल बारह हजार वर्ष युगों के दस हजार वर्ष मिलाकर कुल बारह हजार देव वर्ष होते है। इन गणनाओं के अनुसार हिसाब फैलाने से पता चलता है कि वर्तमान समय संक्रमण काल है। प्राच्य ग्रन्थ में इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है यह वैदिक शास्त्र स्कन्द पुराणआदि से मान्य नहीं है। (१) हमत् कल्प १ लाख ९ हजार ८ सौ वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर ८५८०० वर्ष पूर्व तक, (२) हिरण्य गभर् कल्प ८५८०० विक्रमीय पूर्व से ६१८०० वर्ष पूर्व तक, ब्राह्म कल्प ६०८०० विक्रमीय पूर्व से ३७८०० वर्ष पूर्व तक, (३) ब्राह्म कल्प ६०८०० विक्रमीय पूर्व से ३७८०० वर्ष पूर्व तक, (४) पाद्म कल्प ३७८०० विक्रम पूर्व से १३८०० वर्ष पूर्व तक और (५) बाराह कल्प १३८०० विक्रम पूवर् से आरम्भ। अब तक बारह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत-मनु चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वन्तर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णैमनु की अन्तर्दशा चल रही है। कल्कि पुराण में बारह कल्प के सावण मनु के दक्ष, ब्रह्म, रुद्रदेव और इन्द्र सावणयों के मन्वन्तर बीत जाने पर, अवतार होने और धरती में कलियुग की संध्या समाप्त होकर सतयुग प्रारम्भ होने का वर्णन आता है। कलियुग सम्वत् की जानकारी के लिए राजा पुलकेशिन (द्वितीय) चालुक्य ने विद्वान् ज्योतिषियों से गणना कराई थी। यदा देवषर्यः सप्तमघासु विचरन्ति हि। तदा प्रवृत्तस्तु कलिद्वार्दशाब्द शतात्मकः॥३१॥ यदा मघाभ्यो यास्यन्ति पूवार्षाढ़ा महषर्यः। तदा नन्दात् प्रभृत्येष कलिवृर्द्धिगमिष्यति॥३२॥ यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्न्व तदाहनि। प्रतिपन्नं कलियुगमित प्राहुः पुराविदः॥३३॥ अर्थात जब सप्तऋषि (तारगण) मघा नक्षत्र पर आये थे तब कलियुग का आरम्भ हुआ और जब सप्तऋषि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में आ चुकेंगे तो भाद्रपद माह में वर्तमान सम्वत 2079 से 5124 वर्षो पूर्व जब भगवान कृष्ण अपने धाम को पधारे, उसी समय से कलयुग प्रारम्भ हुआ। जिसके प्रथम चक्रवर्ती सम्राट परीक्षित थे। सप्तऋषि तारागण वर्तमान समय ये कृतिका नक्षत्र पर है।है- कृतम्॥ काल गणना करते समय व्यतिरेक वस्तुतः प्रस्तुतीकरण की गलती के कारण है। ग्रंथों में जो युग गणना बतायी गई है, उसमें सूर्य परिभ्रमण काल को चार बड़े खण्डों में विभक्त कर चार देव युगों का कल्पना की गई है। एक देव युग को 4,32,000 वर्ष का माना गया है। इस आधार पर धमर्ग्रन्थों में वर्णैत कलिकाल की समाप्ति की संगति प्रस्तुत समय से ठीक-ठीक बैठ जाती है। यह संभव है कि विरोधाभास की स्थिति में लोग इस काल गणना पर सहज ही विश्वास न कर सकें, अस्तु यहाँ 'युग' का तात्पर्य विशिष्टता युक्त समय से माना गया है। युग निर्माण योजना आन्दोलन अपने अन्दर यही भाव छिपाये हुए है। समय बदलने जा रहा है, इसमें इसकी स्पष्ट झाँकी है। प्रत्येक संधि का अपना विशेष महत्व होता है। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय संधिकाल कहलाता है। यह दोनों समय 'पर्व काल' कहलाता हैं। साधना पर विश्वास करने वाले इन दोनों समयों में उपासना साधना का विशेष महत्व मानते हैं। मंदिरों से आरती और मस्जिदों से अजान की ध्वनि इन्हीं संधि वेलाओं में सुनाई देती है। सर्दी और गर्मी, इन दो प्रधान ऋतुओं के मिलन काल पर आश्विन और चैत्र की नव रात्रियाँ होती है। इन दोनों बेलाओं को पुण्य पर्व माना जाता है। इस अवधि में साधक गण विशेष साधनायें करते हैं। रात्रि का अंत और दिन का उदय 'प्रभात पर्व' है। उस वेला में सभी में उत्साह उमड़ता है। फूल खिलते हैं, पक्षी चहचहाते हैं और सभी प्राणी अपने-अपने कार्यों में विशेष उत्साह के साथ लग पड़ते हैं। नयी सहस्राब्दी के बारे में भी ऐसा ही मानना चाहिए। इक्कसीवीं सदी भी ऐसे ही शुभ संदेश साथ लेकर आ रही है। उसके सम्बंध में उज्जवल भविष्य की ही कल्पना और मान्यता बनानी चाहिए। स्कंद पुराण काल गणना अनुसार कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का होता है। वाजस संहिता में मनुष्ययुग-देवयुग अलग-अलग स्पष्ट बताये गये हैं। 'श्रुतकणर्ॐसं प्रथस्तमत्वागिरा देव्यमानुषा' 11। 111 तैतिरीय संहिता में युग की कल्पना- 'या जाता ओषधयो देवेन्यस्त्रियुगं पुरा।' ऋग्वेद ज्योति पाठ में प्रजापति ब्रह्मा का युग 5 सम्वत्सर का बताया हैः- पंचम संवत्सरमय युगाध्यक्षं प्रजापतिम्। युगस्रू द्वदशाब्दानि तत्र तानि बृहस्पतेः॥ तिष्यादिच युग प्राहुवर्वसिष्ठात्रि पाराशराः। बृहस्पतिस्तु सौम्यान्त सदा द्वादश वाशिर्कम्॥मनुस्मृति में इस सम्बंध में स्पष्ट कहा गया है- ब्राह्मस्यतु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समारुतः। एकैकशे युगानान्तु क्रमशस्त्रार्न्नबार्धत। चत्वायार्हु सहस्राणि देववषार्णांतु कृतं युग। तस्यतावत् शती संध्या संध्याशश्च तथाविधः। इतेयेरेषु स संध्येषु स संध्याशेषु च त्रिपु। एकोयायेन वतर्न्ते दिव्यसहस्राणि शतानि च। (मनु.1। 67-69) प्रत्येक महायुग में 4 युग निहित हैं, वे इस प्रकार हैं- चार हजार दिव्य देववर्ष और उतने ही शत अर्थात चार सौ दिव्य देववर्ष की पूर्व संध्या और चार सौ दिव्य देववर्ष की उत्तर संध्या इस प्रकार कुल 4800 दिव्य वर्ष का सतयुग, इसी प्रकार तीन हजार छह सौ दिव्य देववर्ष का त्रेता, दो हजार चार सौ दिव्य देववर्ष का द्वापर और बारह सौ दिव्य देववर्ष का कलियुग। दिव्याब्दानां सहस्रान्ते चतुथेर्तु पुनः कृतम्। भविष्यति यदा नृणां मन आत्म प्रकाशकम्॥ ‍ इसका शब्दार्थ यह है कि- 'चार हजार दिव्य वषों के अन्त में अर्थात चार हजार दिव्य वर्षो में (कलियुग बीता)' फिर सतयुग आयेगा जो मनुष्यों के मन और आत्मा में प्रकाश करेगा। इस श्लोक में दिव्य शब्द आया है। 'इन्दं मित्रं वरुणमग्नि माहुःरथो दिव्यः ससुपणोर् गरुत्मान्।' अर्थात अग्नि रूपी सूर्य को इन्द्र मित्र वरुण कहते हैं। वही दिव्य सुपर्, गुरुत्मान है।' यह मित्रं निरुक्त दैवत काण्ड 7। 18 में भी आता है। वहाँ दिव्य शक्ति की व्युत्पत्ति यह की गई है-'दिव्यो दिविजो' अर्थात जो दिवि में प्रकट होता है, उसे दिव्य कहते हैं। दिवि 'द्य' को कहते हैं। नैघण्टुक काण्ड में दिन के 12 नाम लिखे हैं, उनमें द्यु शब्द भी दिन का वाचक है, अब दिव्य का अर्थ हुआ कि 'जो दिन में प्रकट होता है।' और यह प्रत्यक्ष है कि दिन में सूर्य ही प्रकट होता है। अतः दिव्य सूर्य का नाम है।दिव्य देववर्ष भागवत पुराण ऋग्वेद 1। 16। 3। 10 के मन्त्र-ईमार्न्तांसः सिलिक......... दिव्य मज्मश्वाः।' का अश्वो अग्निदेवता अर्थात आग का घोड़ा (सूर्य) है। इसमें भी सूर्य का ही वर्णन है। इस मंत्र पर निरुक्त ने दिव्य शब्द की व्युत्पत्ति दिव्या दिवि की है। बात वही है। जो दिन में प्रकट होता है, वह दिव्य सूर्य है और यह भी स्पष्ट लिखा है कि - अस्त्यादित्यस्तुति अर्थात इस नाम से सूर्य की स्तुति है। वेद में दिव्य नाम सूर्य का है, देवता को दिव्य कदापि नहीं कहते। यह दो बड़े प्रमाण वेद के है। व्याकरण से भी दिव्य शब्द का अर्थ देवता नहीं बनता। दिव् धातु में 'स्वार्थेयत' प्रत्यय लगाने से दिव्य शब्द बनता है। इसकी व्युत्पत्ति यह हुई - 'दिव भवं दिव्यन्' अर्थात जो दिवि में प्रकट होता है। अतः दिव्य सूर्य सदृश तेज को कहते हैं। 'एतस्य श्लोकस्यादो यदे तन्मानुषम् चतुयुर्गं परिगणितम् एतद्देवानं युग मुच्यते।' अर्थात-चारों युग मनुष्यों के हैं, इनके बराबर देवताओं का एक युग होता है। इसलिए सतयुग 4800 दिव्य देववर्ष का और कलियुग 1200 दिव्य देववर्ष का हुआ। दिव्य देवताओं का वर्ष है। इसलिए जो 360 से 1200 को गुणा किया, तो कलियुग की ठीक आयु 432000 वर्षो की ही हुई। हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व में भी युगों का हिसाब इसी प्रकार बताया गया है यथा- अहोरात्रं विभज्यनो लौकिकं परम्। सामुपादाय गणना श्रृणं संख्य, मन्दिरम्। चत्वायैर्व सहस्राणि सषार्णानुकृत युगं। तावच्छसी भवेत्संध्या संध्याशश्च तथानृप॥ त्रीणि वषर् सहस्राणि त्रेतास्या स्परिमाणतः। तस्रूाश्च त्रिशती संध्या संध्याशश्च तथा विधः॥ तथा वषर् सहस्र द्वै द्वापरं परिकीतिर्तः। तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्चैवताद्वियः॥ कलिवषर् सहस्रं व संख्यातोऽत्र मनिषिभिः। तस्यापि शतिक संध्या संध्यांशश्च तथाविधिः॥ लिंग पुराण तथा श्रीमद् भागवत में भी इसी प्रकार की युग गणना मिलती है। भागवत के तृतीय स्कन्ध मं कहा गया है- चत्वारि त्रीणि दू चैके कृतादिषु यथाक्रमन्॥ संख्यातानि सहस्राणि द्वि गुणानि शतानि च॥ अर्थात-चार, तीन, दो और एक ऐक कृतादि युगों में यथाक्रम द्विगुण सैकड़ों की संख्या बड़ती है। आशय यही है कि कृतयुग को चार हजार वर्ष में आठ सौ वर्ष और जोड़कर ४८०० वर्ष माने गये। इसी प्रकार शेष तीनों युगों की कालावधि समझी जाय। कुछ स्थानों पर मनुष्य के व्यवहार के लिए बारह वर्ष का एक युग भी माना गया है। सहस्र युगपयर्न्त मध्यर्द् ब्रह्मणो विदुः। रत्रि युग सहस्रान्तां तेऽहोरात्र विदोजना॥ अहोरात्र को तत्वतः जानने वाले पुरुष समझते हैं कि हजार महायुगों का समय ब्रह्मदेव का एक दिन होता है और ऐसे ही एक हजार युगों की उसकी रात्रि होती है। और ऐसे ही एक हजार युगों की उसकी रात्रि होती है। लोकमान्य तिलक ने इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि महाभारत, मनुस्मृति में इस युग गणना का स्पष्ट विवेचन आता है। लोकमान्य तिलक के अनुसार हमारा उत्तरायण की अवधि देवताओं का दिन है और सूर्य के दक्षिणायन की पूरी अवधि उनकी रात है। क्योंकि स्मृति ग्रन्थों और ज्योतिष शास्त्र की संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है कि देवता मेरु पर्वत पर अर्थात कैलाश में रहते हैं। '' अर्थात दो अयनों छःछ मास का हमारा एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर और हमारे ३६० वर्ष देवताओं के १ दिन-रात के बराबर होते है। वृहद पाराशर ज्योतिष संहिता अनुसार कृत, त्रेता, द्वापर और कलि ये चार युग माने गये है परन्तु एक युग समाप्त होते ही दूसरा युग एकदम आरम्भ नहीं हो जाता, बीच में दो युगों के संधि काल में कुछ वर्ष बीत जाते हैं। दो मन्वंतर का संधिकाल एक सत्य युग के बराबर होता है। अग्नि पुराण, वायु पुराण अनुसार भी, ब्रम्हा के 1 माह में 30 कल्प होते है और 1 कल्प में 14 मन्वंतर, एक मन्वंतर में 71 चतुर्ययुग होते हैं। (स्कंद पुराण) संध्याकाल मिलाकर 1 कल्प अर्थात 14 मन्वंतर में 1000 चतुर्ययुग होते हैं। श्रेणी:समय मापन