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जर्राह
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जर्राह, शल्य चिकित्सक का अरबी पर्याय है। जर्राह शब्द का अरबी साहित्य में प्रयोग सर्वप्रथम 9वीं शताब्दी में मिलता है, तत्पश्चात् यह चिकित्सा शास्त्र में प्रयुक्त हुआ। उस समय तक समाज में शल्य चिकित्सक का स्थान निकृष्ट माना जाता था। इस्लाम की शिक्षा के अनुसार किसी मनुष्य या पशु की शारीरिक स्थिति में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। इब्न सीना और इब्न जुहर जैसे विख्यात चिकित्सक भी इस प्रणाली को निम्न कोटि का और विशेष पेशेवर जर्राहों और मुजब्बिलों (अस्थिचिकित्सक) का काम मानते थे। इब्न सोना ने अपनी "कानून" पुस्तक में "इल्म-अल-जर्राह" (शल्य चिकित्सा प्रणाली) पर विस्तार से लिखा है। अल-मजूसी ने अपनी "कामिल-अल-सीना" में इस प्रणाली की विशेष चर्चा की है। अल-कुफ की कृति अल-उम्दा-फि-सिनाअत-अल-जिराह अरबी शल्य चिकित्साशास्त्र में बहुत महत्व रखती है। पाश्चात्य संसार को आंशिक रूप से इस प्रणाली का परिचय देने का श्रेय अल-जहरावी की रचना किताब-अल-तशरीफ़ को है। मध्यकाल में अरब और यूरोप में शल्य चिकित्सा साथ साथ और पारस्परिक प्रभाव में विकसित हुई।
श्रेणी:चिकित्सा शास्त्र