Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

खंडायत

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

खंडायत, पूर्वी भारत के ओडिशा में पाया जाने वाला एक क्षेत्रीय और भूमि-लड़ायक समूह है। वे शासक,सामंती-मुखिया, महामंत्री ,सेनापति, जमींदार, बड़े भूमिधारक थे। संख्यात्मक रूप से वे राज्य का तीसरा सबसे बड़ा समूह हैं। खंडायत ओडिशा के एक वीर क्षत्रिय जाती है। ब्रिटिश शासन के दौरान, उन्होंने ओड़िशा की कई सामंत रियासतों पर शासन किया, जिनमें खोरधा भी शामिल था।[1] == व्युत्पत्ति == खंडायत उपाधि की उत्पत्ति "खंडा" शब्द से हुई है जिसका अर्थ है तलवार, और खंडायत का अर्थ है तलवार-धारक।११वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा वंश के शासनकाल के दौरान, खंडायतों का उल्लेख सामंती प्रमुखों और सैन्य कर्मियों के रूप में मिलता है।”[2] खंडायत नाम मध्यकालीन काव्यात्मक अभिव्यक्ति से निकला है। इसका मूल संस्कृत शब्द ‘खण्ड’ है, जिसका अर्थ ‘भूमि का भाग’ तथा ‘तलवार’ दोनों होता है, जबकि ‘आयत’ का अर्थ किसी विशिष्ट क्षेत्र पर अधिकार या नियंत्रण होता है। एक अन्य मान्य व्याख्या के अनुसार ‘खण्ड’ शब्द ‘भू-खण्ड’ (भूमि का टुकड़ा) से जुड़ा है। मुग़ल कालीन ग्रंथ ‘आइने-अकबरी’ में गजपति साम्राज्य के विघटन के बाद ओडिशा की स्थिति का स्पष्ट विवरण मिलता है। इसमें खंडायत ज़मींदारों द्वारा शासित विभिन्न किलों का उल्लेख है, जो अपने राजा मुकुंद देव के साथ शासन करते थे।”[3] प्राचीन से लेकर मध्यकालीन काल तक खंडायत मुख्यतः शासन तथा सामाजिक व्यवस्था के संचालन से जुड़े हुए थे। उत्तरी भारत पर तुर्क-मंगोल आक्रमणों के बाद, जब अधिकांश योद्धा कुलों और समुदायों की शक्ति एवं प्रभुत्व में कमी आई, तब भी खंडायत समाज ने अपने पारंपरिक सैन्य और प्रशासनिक स्वरूप को काफी हद तक बनाए रखा। == इतिहास == परंपरागत रूप से खंडायतों को योद्धा-क्षत्रिय समुदाय माना जाता है। उनका इतिहास लगभग ढाई हजार वर्ष पुराना बताया जाता है और वे कलिंग युद्ध तथा पाइक विद्रोह जैसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं में सक्रिय रहे। पाइक विद्रोह के दौरान उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के विरुद्ध उग्र संघर्ष किया। गजपति सम्राट मुकुंद देव की 1541 में हत्या के बाद ओडिशा में भोंई (भौम्यकर) वंश की स्थापना गोविंद विद्याधर ने की, जिन्हें खंडायत वंशज माना जाता है। गजपति राउताराय राजवंश की उत्पत्ति भी खंडायत वंश परंपरा से मानी जाती है, जिसके प्रमुख शासक कपिलेंद्र राउताराय थे। इसके बाद सिंहदेव, भंजदेव, सिंहदेब आदि वंश ओडिशा के विभिन्न क्षेत्रों में शासन करते रहे। मध्यकालीन काल में जागीरदारी व्यवस्था के अंतर्गत युद्धों में योगदान देने वाले खंडायत सैनिकों और सेनापतियों को उनकी वीरता और पद के अनुसार जमीन दी जाती थी। इस कारण उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक ओडिशा की अधिकांश भूमि-स्वामित्व खंडायत समुदाय के पास आ गया। हालाँकि, ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन स्थापित होने के बाद भूमि-बँटवारा इस प्रकार किया गया कि अन्य जातियों — जैसे ब्राह्मण और करण समुदाय — को भी भूमि अधिकार दिए जाएँ, ताकि केवल खंडायत ही राजनीतिक-सामाजिक रूप से पूरी तरह प्रभावी न रह जाएँ। == रीति-रिवाज एवं संस्कृति == खंडायत समुदाय पारंपरिक रूप से उत्तर भारतीय ब्राह्मणीय रीति-रिवाजों और धार्मिक संस्कारों का कठोरता से पालन करता रहा है तथा विवाह के मामलों में अत्यंत जाति-सचेत माना जाता था। हालांकि, सामाजिक सुधारों के परिणामस्वरूप अब न केवल खंडायत समुदाय के भीतर बल्कि ओडिशा की विभिन्न समुदायों के बीच भी अंतर्जातीय विवाह होने लगे हैं। विवाह सामान्यतः गोत्र/वंश परंपरा और कुंडली/ज्योतिषीय मिलान के आधार पर संपन्न किए जाते हैं। खंडायतों में प्रचलित सामान्य गोत्रों में भारद्वाज, गौतम, कश्यप, वसिष्ठ, भार्गव, शुक्रस्य, बाछस्य, ओलकश्य, बल्लभद्र तथा नागेश्य शामिल हैं। खंडायत परिवारों में वेदसम्मत क्षत्रिय परंपराओं से जुड़े अनेक संस्कार और रीति-रिवाज प्रचलित हैं, जिनमें विवाह के समय उपनयन संस्कार का पालन भी शामिल है। खंडायत समुदाय के उच्च वर्ग आज भी यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने की परंपरा बनाए हुए हैं। खंडायत समाज का एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण अनुष्ठान काली पूजा के दौरान होने वाली ‘अस्त्र पूजा’ है, जिसमें परिवार की विरासत से जुड़े शस्त्र—जैसे तलवारें और भाले की पूजा की जाती है। यह परंपरा उनके क्षत्रिय सैन्य उत्तराधिकार का प्रतीक मानी जाती है। == वर्ण == वे क्षत्रिय वर्ण से होने काा दावा करते हैं। ओडिशा में ऐतिहासिक सामाजिक दृष्टिकोण से खंडायत को क्षेत्रीय माना जाता है। खंडायतों का संबंध राज शासन एवं ज़मींदारी से है। वे राजन्य एवं बड़े भूमि धारक थे । बिश्वमोय पति ने उन्हें ‘उड़ीसा के क्षत्रियों का एक रूप’ कहा है, जो ब्राह्मणों के साथ मिलकर अन्य लोगों पर काफ़ी प्रभाव और अधिकार रखते थे। कलिंग के खण्डायतों को भारत के प्राचीन क्षत्रिय अथवा योद्धा वर्ग का वंशज माना जाता है। वे स्वयं को भगवान जगन्नाथ के अनुयायी बताते हैं और प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ मंदिर के प्रबंधन के लिए भी उत्तरदायी रहे हैं।” == सन्दर्भ == == आगे पढ़े == Ernst, Waltraud; Pati, Biswamoy, eds. (2007). India's Princely States: People, Princes and Colonialism. Routledge. ISBN 978-1-13411-988-2. {{cite book}}: More than one of |ISBN= and |isbn= specified (help) Pati, Biswamoy (2001). Situating Social History: Orissa, 1800-1997. Orient Blackswan. ISBN 978-8-12502-007-3. {{cite book}}: More than one of |ISBN= and |isbn= specified (help) Senapati, Fakir Mohan (2005). Six Acres and a Third: The Classic Nineteenth-century Novel about Colonial India. Mishra, Rabi Shankar (trans.). University of California Press. ISBN 978-0-52022-883-2. {{cite book}}: More than one of |ISBN= and |isbn= specified (help) Roy, Bhaskar (2004). "Khandayats moving into political gear in Orissa". Times of India. 27 नवंबर 2018 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 28 सितंबर 2016.