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भारत-रूस सम्बन्ध
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भारत (हरा) तथा रूस (केसरिया)|right|thumb|300px
मोदी और पुतिन|right|thumb|300px
right|thumb|300px|कुंदनकुलम का नाभिकीय रिएक्टर, भारत और रूस के प्रद्योगिकीय सम्बन्ध का जीवन्त उदाहरण है।
भारत की स्वतन्त्रता के बाद से ही भारत और रूसी संघ के सम्बन्ध बहुत अच्छे रहे हैं। शीत युद्ध के समय भारत और सोवियत संघ में मजबूत रणनीतिक, सैनिक, आर्थिक, एवं राजनयिक सम्बन्ध रहे हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी दोनों के सम्बन्ध पूर्ववत बने रहे।
भारत और रूस के बीच मजबूत द्विपक्षीय संबंध हैं जो उनकी विदेश नीतियों में परिलक्षित होता है। भारत, रूस को एक दीर्घकालिक और परखा हुआ मित्र मानता है जिसने इसके आर्थिक विकास और सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। रूस, भारत के लिए लंबे समय से एक विश्वसनीय साझेदार रहा है। भारत और रूस के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक संबंध सोवियत काल से ही हैं। दोनों देशों के बीच आपसी सम्मान, विश्वास और सहयोग के रिश्ते रहे हैं।
रूस (पूर्व नाम यूएसएसआर) ने न केवल भारत की सुरक्षा में योगदान दिया है, बल्कि देश के वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के लिए प्रौद्योगिकी, उपकरण और वित्तीय सहायता भी प्रदान की है। ऐतिहासिक रूप से, भारत और रूस के बीच शीत युद्ध के समय से ही घनिष्ठ संबंध रहे हैं, जब भारत एक गुटनिरपेक्ष देश था और सोवियत संघ एक महाशक्ति था। 1950 और 1960 के दशक के दौरान भारत और सोवियत संघ ने मुख्यतः रक्षा और आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में मजबूत संबंध स्थापित किये। शीत युद्ध के दौरान, भारत और सोवियत संघ ने एशिया में संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए एक मजबूत रणनीतिक, सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक साझेदारी बनाए रखी। 9 अगस्त 1971 को दोनों देशों ने मैत्री और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए, जिससे उनकी साझेदारी और मजबूत हुई। इस संधि में दोनों देशों के बीच आपसी रक्षा सहयोग और परामर्श प्रावधान, आर्थिक और वैज्ञानिक सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान शामिल थे। इस संधि ने तीन महीने बाद बांग्लादेश की मुक्ति के लिए युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ भारत की ऐतिहासिक जीत की नींव रखी।
दोनों देश अंतरिक्ष अन्वेषण में भी सहयोग करते हैं। यूएसएसआर ने भारतीय उपग्रहों (जैसे आर्यभट्ट और भास्कर) को प्रक्षेपण सेवाएं प्रदान किया। दोनों देश संयुक्त अंतरिक्ष अन्वेषण कार्यक्रमों में संलग्न रहे हैं।
सोवियत संघ ने हमेशा कश्मीर पर भारत के रुख का समर्थन किया है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत और रूस के बीच संबंध समायोजन के दौर से गुजरे। इस समय मास्को ने पश्चिम समर्थक नीति अपनाई।
वर्ष 2000 में व्लादिमीर पुतिन की यात्रा के दौरान भारत और रूस ने रणनीतिक सहयोग स्थापित किया, जिसे वर्ष 2010 में उन्नत करके विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त साझेदार बना दिया गया। वर्ष 2010 से भारत और रूस ने उच्च स्तरीय यात्राओं, संयुक्त सैन्य अभ्यासों तथा बढ़ते व्यापार और निवेश के माध्यम से अपने सामरिक सहयोग को मजबूत किया है। 13 अप्रैल, 2012 को भारत और रूस ने अपने राजनयिक संबंधों की 65वीं वर्षगांठ मनाई। दोनों देशों ने अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे और रूसी सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्र के विकास जैसी पहलों पर भी काम किया है।
उपरोक्त के बावजूद, हाल ही में भारत-रूस संबंधों को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। रूस, भारत के अमेरिका के साथ विकसित होते संबंधों तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर उसके झुकाव को लेकर चिंतित रहा है। इसके अलावा, मास्को ने इजरायल के साथ भारत के बढ़ते रक्षा संबंधों पर भी चिंता व्यक्त की है। हालाँकि, उच्च स्तरीय आदान-प्रदान और यात्राओं के माध्यम से भारत रूस के साथ अपने सामरिक संबंधों को बनाए रखने के लिए काम करना जारी रख रहा है।
दिसंबर 2021 में पहली भारत-रूस 2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता नई दिल्ली में आयोजित की गई थी।
वर्तमान में, दोनों देश छह प्रमुख क्षेत्रों में अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए काम कर रहे हैं: राजनीति, रक्षा और सुरक्षा, व्यापार, अर्थव्यवस्था, विज्ञान और संस्कृति।
भारत और रूस का २३वाँ वार्षिक शिखर सम्मेलन
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 04-05 दिसंबर 2025 को प्रधानमंत्री मोदी के निमंत्रण पर भारत की दो दिवसीय राजकीय यात्रा पर नयी दिल्ली आए। यात्रा के दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय वार्ता की, कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए और संयुक्त वक्तव्य जारी किया। यात्रा के दौरान येकातेरिनबर्ग और कजान में खुले भारतीय महावाणिज्य दूतावासों का भी उल्लेख हुआ, जो अंतर-क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाएंगे।23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के बाद संयुक्त वक्तव्य
मुख्य मुद्दे
वर्ष 2030 तक $100 अरब द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य को समयबद्ध प्राप्त करना
राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान व्यवस्था को मजबूत करना
ऊर्जा, परमाणु, रक्षा, अंतरिक्ष और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग
उत्तरी समुद्री मार्ग, आई.एन.एस.टी.सी. और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक गलियारे जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट
आतंकवाद, उग्रवाद और अफगानिस्तान स्थिति पर समन्वय
ब्रिक्स, एस.सी.ओ., जी-20 में बहुपक्षीय सहयोग।
यात्रा के प्रमुख परिणाम
वर्ष 2030 तक आर्थिक सहयोग के रणनीतिक क्षेत्रों का कार्यक्रम अपनाया गया।
प्रवासन-गतिशीलता, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, ध्रुवीय जल प्रशिक्षण, उर्वरक और मीडिया सहयोग पर 15 से अधिक समझौते हुए।
रूस ने अंतरराष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (IBCA) में शामिल होने का निर्णय लिया
रूसी नागरिकों को 30 दिन का मुफ्त ई-वीजा और समूह पर्यटक वीजा की सुविधा दी गयी है।
कुडनकुलम परमाणु परियोजना की शेष इकाइयों के निर्माण में तेजी और दूसरे स्थल पर चर्चा हुई।
भारत और रूस के बीच सहयोग के प्रमुख क्षेत्र
रक्षा सहयोग : 'खरीदार–विक्रेता मॉडल से संयुक्त उत्पादन की ओर : रक्षा साझेदारी संरचनात्मक रूप से मेक इन इंडिया और प्रौद्योगिकी अंतरण की ओर स्थानांतरित हो गई है, ताकि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित हो सके तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला अवरोधों के बीच युद्ध-कुशलता बनी रहती है। सीधे रक्षा-खरीद के स्थान पर सह-विकास केंद्रित इस मॉडल से पश्चिमी प्रतिबंधों के जोखिम में कमी आएगी और भारतीय शस्त्रागार के रूसी मूल के उपकरणों की दीर्घकालिक अनुरक्षण-क्षमता सुनिश्चित होती है। RD-191M सेमी-क्रायोजेनिक इंजन प्रौद्योगिकी अंतरण के लिये वर्ष 2025 का सौदा और शेष S-400 ट्रायम्फ रेजिमेंट्स (5.43 बिलियन डॉलर मूल्य) की जारी आपूर्ति-प्रक्रिया, केवल बिक्री से परे इस गहन तकनीकी एकीकरण को रेखांकित करती है।
ऊर्जा सुरक्षा-रणनीतिक हाइड्रोकार्बन संरेखण: भारत ने वैश्विक मुद्रास्फीति से अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये रूस से प्राप्त रियायती कच्चे तेल का सक्रिय रूप से लाभ उठाया है, जिससे भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद, रूस एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा-आपूर्तिकर्त्ता में बदल गया है। अब सहयोग रूसी फार-ईस्ट में दीर्घकालिक निवेशों की ओर विस्तारित हो रहा है जिसके माध्यम से भारत इस्पात-उद्योग की आवश्यकता अनुसार इक्विटी ऑयल और कोकिंग कोल परिसंपत्तियाँ सुरक्षित कर रहा है। वर्ष 2024–25 में रूस भारत का शीर्ष तेल-आपूर्तिकर्त्ता बना रहा तथा द्विपक्षीय व्यापार 68.7 अरब डॉलर (वित्त वर्ष 2025) के अभूतपूर्व स्तर पर पहुँचा।
संपर्क तंत्र– भू-अर्थव्यवस्था उन्मुख समुद्री गलियारे : दोनों देश अस्थिर स्वेज़ चैनल की अनिश्चितता को दरकिनार करते हुए चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मेरीटाइम कॉरिडोर (CVMC) जैसे नए लॉजिस्टिक मार्गों को क्रियान्वित कर रहे हैं जिससे परिवहन-खर्च घटता है तथा एक प्रत्यक्ष ऊर्जा पुल निर्मित होता है। यह रणनीतिक विविधीकरण आवागमन के समय को काफी कम करता है जिससे व्यापारिक दक्षता बढ़ती है और भारत आर्कटिक तथा प्रशांत संसाधन-नेटवर्क से अधिक घनिष्ठ रूप से जुड़ता है। CVMC को नवंबर 2024 में परिचालित घोषित किया गया जिसने यात्रा-समय को 40 दिनों से घटाकर 24 दिन कर दिया (लगभग 40 प्रतिशत कमी) और दूरी को लगभग 5,600 नौटिकल माइल कर दिया जो यूरोपीय मार्ग की तुलना में काफी कम है।
परमाणु ऊर्जा-स्वच्छ ऊर्जा एवं प्रौद्योगिकी समन्वय: असैन्य परमाणु सहयोग भारत–रूस साझेदारी का सर्वाधिक ठोस और उच्च-तकनीकी क्षेत्र है जो भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्यों के लिये बड़े पैमाने के परमाणु रिएक्टरों के निर्माण द्वारा आधार प्रदान करता है जिन पर प्रायः पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जाने वाले कठोर दायित्व नहीं होते। यह सहयोग स्थिर है और इसका विस्तार हो रहा है तथा रूस ही एकमात्र ऐसा देश है जो वर्तमान में भारत में परमाणु संयंत्र बना रहा है। हाल ही में रूस की राज्य-नियंत्रित परमाणु निगम ने तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के तीसरे रिएक्टर के प्रारंभिक ईंधन-लोडिंग हेतु प्रथम खेप प्रदान की है।
अंतरिक्ष क्षेत्र- उच्च स्तरीय प्रणोदन प्रौद्योगिकी: अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग अब मानव अंतरिक्ष उड़ान तथा क्रायोजेनिक प्रणोदन जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों तक विस्तारित हो गया है जिससे भारत के महत्त्वाकांक्षी गगनयान मिशन के महत्त्वपूर्ण तकनीकी अंतर को भरा जा रहा है। यह क्षेत्र विश्वास-आधारित सहयोग का उदाहरण है, क्योंकि रूस अर्ध-क्रायोजेनिक इंजन जैसी विशिष्ट प्रौद्योगिकियाँ प्रदान करता है, जिन्हें अन्य अंतरिक्ष शक्तियों द्वारा शायद ही कभी साझा किया जाता है। भारत की अभूतपूर्व मानव अंतरिक्ष उड़ान पहल, गगनयान के लिये अंतरिक्ष यात्रियों को रूस के यूरी गागरिन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर में व्यापक प्रशिक्षण दिया गया।
उर्वरक सुरक्षा-कृषि आपूर्ति शृंखला समुत्थानशीलता : रूस भारत के लिये मृदा पोषक तत्त्वों का निर्णायक आपूर्तिकर्त्ता बनकर उभरा है, जो भारतीय कृषि को वैश्विक उर्वरक मूल्य उथल-पुथल से प्रभावी रूप से सुरक्षित रखता है तथा 1.4 बिलियन लोगों के लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है। वैश्विक गैस कीमतों में अस्थिरता को देखते हुए यह विश्वसनीय आपूर्ति शृंखला महत्त्वपूर्ण है, जिसका घरेलू उर्वरक उत्पादन लागत पर सीधा प्रभाव पड़ता है। वर्ष 2024–25 में रूस ने भारत के मिश्रित उर्वरकों का 90 प्रतिशत से अधिक निर्यात किया और अगस्त वर्ष 2025 में हुई उच्च-स्तरीय वार्ताओं (IRIGC-TEC) में DAP तथा यूरिया की दीर्घकालिक आपूर्ति को सुनिश्चित करने पर बल दिया गया जिससे भारत की सब्सिडी व्यय-रचना स्थिर रह सके।
व्यापार-निपटान तथा वित्तीय पारस्परिकता : प्रतिबंधों से बचने और व्यापार की गति को बनाए रखने के लिये, दोनों देश रुपया-रूबल भुगतान तंत्र को तीव्रता से परिष्कृत कर रहे हैं तथा भारत-यूरेशियन आर्थिक संघ (EAEU) मुक्त व्यापार समझौते की संभावना तलाश रहे हैं। अब प्राथमिकता व्यापार असंतुलन को दूर करने पर है जिसके लिये रूस के पास संचित रुपये को भारत के अवसंरचना परियोजनाओं तथा सरकारी प्रतिभूतियों में पुनर्निवेश करने की रूपरेखा आगे बढ़ाई जा रही है। भारत और रूस ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रुपया-रूबल भुगतान बढ़ाया तथा वर्ष 2030 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।
राजनयिक विश्वास–व्यवहारिक सहयोग से आगे: द्विपक्षीय संबंध केवल लेन-देन आधारित नहीं हैं, बल्कि यह संबंध उच्च-स्तरीय नेतृत्व-आधारित विश्वास की नींव पर टिके हैं, जो मानक राजनयिक जुड़ाव से परे पश्चिमी दबाव के विरुद्ध भू-राजनीतिक स्थिरता के रूप में कार्य करता है तथा बहुध्रुवीय व्यवस्था में रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है। यह व्यक्तिगत कूटनीति सुनिश्चित करती है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रशासनिक जड़ता पर हावी है तथा बाह्य प्रतिबंधों और वैचारिक दबाव के बावजूद साझेदारी को निरंतर बनाए रखती है। इस विशिष्ट समन्वय का उदाहरण देते हुए, भारतीय प्रधानमंत्री ने हाल ही में राष्ट्रपति पुतिन का हवाई अड्डे पर व्यक्तिगत रूप से स्वागत करने के लिये सख्त राजनयिक प्रोटोकॉल को तोड़ा, जो एक दुर्लभ संकेत है कि वैश्विक अलगाववादी आख्यानों के बावजूद रूस शीर्ष स्तर की प्राथमिकता बना हुआ है।
भारत और रूस के बीच मतभेद के प्रमुख क्षेत्र
रक्षा आपूर्ति शृंखला में व्यवधान-क्षमता अंतराल : यूक्रेन में चल रहे युद्ध ने महत्त्वपूर्ण रक्षा अनुबंधों को पूरा करने की रूस की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे भारतीय सशस्त्र बलों के लिये क्षमता शून्यता उत्पन्न हो गई है तथा नई दिल्ली को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ रही है। यह अविश्वसनीयता चीन के विरुद्ध भारत की परिचालन तत्परता को खतरे में डालती है, क्योंकि रूस अपनी अग्रिम पंक्ति की आवश्यकताओं को निर्यात प्रतिबद्धताओं से ऊपर रख रहा है, जिससे महत्त्वपूर्ण वायु रक्षा और नौसैनिक प्लेटफॉर्मों में विलंब होता है। इसी कारण S-400 सिस्टम की शेष दो रेजिमेंटों को 2026 तक विलंबित कर दिया गया है तथा अकुला-श्रेणी की परमाणु पनडुब्बी का लगभग तीन अरब डॉलर मूल्य वाला पट्टा अब वर्ष 2028 तक स्थगित कर दिया गया है जो मूल समय-सीमा से कई वर्ष पीछे है।
व्यापार असंतुलन - एकतरफा आर्थिक मार्ग: द्विपक्षीय व्यापार अस्थिर रूप से असंतुलित हो गया है, जिससे भारत वस्तुतः रूस के लिये पूँजी-निर्यातक की भूमिका निभा रहा है जबकि रूस भारतीय औषधियों या विनिर्माण उत्पादों के लिये अपने बाज़ार में समान अवसर प्रदान नहीं करता। यह संरचनात्मक कमी साझेदारी की आर्थिक तर्कशीलता को कमज़ोर करती है क्योंकि रूस उच्च-मूल्य वाले उत्पाद चीन से आयात करता जा रहा है जबकि भारत से की जाने वाली उसकी खरीद बहुत नगण्य है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025 में भारत का रूस को निर्यात केवल 4.88 अरब डॉलर था जबकि आयात 63.84 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
सामरिक विचलन - जूनियर पार्टनर सिंड्रोम: भारत रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता को चिंता की दृष्टि से देखता है, क्योंकि यह आशंका प्रबल हुई है कि रूस बीजिंग का जूनियर पार्टनर बनता जा रहा है। इससे यह संभावना उत्पन्न होती है कि संभावित चीन–भारत संघर्ष की स्थिति में मॉस्को की तटस्थता कमज़ोर पड़ेगी। इस भू-राजनीतिक पुनर्संरचना से यूरेशियाई भू-भाग में भारत के लिये रणनीतिक संतुलनकर्त्ता के रूप में रूस की उपयोगिता कमजोर होने का खतरा है। वर्ष 2024 में चीन–रूस व्यापार 244.8 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच गया तथा रूस की चीनी दोहरे-उपयोग प्रौद्योगिकी पर बढ़ती निर्भरता ने उसे बीजिंग के रणनीतिक हितों के प्रति अधिक से अधिक कृतज्ञ बना दिया है।
भुगतान संकट: रुपया जाल तंत्र: प्रतिबंधों के कारण मानक बैंकिंग चैनलों के निलंबन से भुगतान संकट उत्पन्न हो गया है, जहाँ अरबों डॉलर के भुगतान या तो अटक गए हैं या उनका निपटान करना मुश्किल हो रहा है। रूसी निर्यातक अस्थिर भारतीय रुपए को संचित करने में अनिच्छुक हैं, जिसके कारण विनिमय तंत्र पर घर्षण उत्पन्न हो रहा है तथा भविष्य में रक्षा और ऊर्जा अनुबंधों में रुकावट आ रही है। भारत के साथ असंतुलित व्यापार संबंध के कारण रूस को प्रत्येक महीने 1 बिलियन डॉलर तक की राशि रुपए में जमा करनी पड़ रही है।
ऊर्जा अर्थव्यवस्था– रणनीतिक रियायतों का क्षरण: रियायती रूसी कच्चे तेल से मिलने वाला आर्थिक लाभ अब तेज़ी से घट गया है क्योंकि रियायतें संकीर्ण हो रही हैं और टैंकर एवं बीमा पर पश्चिमी प्रतिबन्ध कड़े होते जा रहे हैं, जिससे भारत के लिये कूटनीतिक लागत बढ़ रही है, जबकि पहले उसे उच्च आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा था।
इससे भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा है जबकि आर्थिक लाभ पहले जैसा नहीं रहा। मध्य-पूर्वी कच्चे तेल की तुलना में रूसी कच्चे तेल का मूल्य-अंतर कम होने के कारण भारत के लिये पश्चिमी दबाव झेलने की प्रोत्साहन-शक्ति भी घट रही है। पिछले लगभग तीन वर्षों में भारत ने रूसी तेल से 12.6 अरब डॉलर की बचत की थी, परंतु वर्ष 2024–25 में यह रियायत घटकर औसतन केवल 2.3 डॉलर प्रति बैरल रह गई।
इन्हें भी देखें
भारत के विदेश संबंध
बाहरी कड़ियाँ
भारत रूस संयुक्त सैन्य अभ्यास
भारत-रूस सैन्य सहयोग
"रूस ने सदा ही भारत का साथ दिया है" - डॉ॰ मुरली मनोहर जोशी
भारत-रूस संबंध : नये दौर में पुराने रिश्ते की मजबूती (प्रभात खबर)
भारत - रूस: नई ऊंचाइयों की ओर (जागरण जोश)
विश्लेषणः भारत-रूस रक्षा संबंध (बीबीसी हिन्दी)
विश्लेषणः भारत-रूस रक्षा संबंध (वन इण्डिया)
सन्दर्भ
श्रेणी:भारत के द्विपक्षीय संबंध