Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

वसुदेव (उपन्यास)-नरेन्द्र कोहली

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

वसुदेव 150px मुखपृष्ठ नरेन्द्र कोहली जून ०१, २००७ हिंदी भारत साहित्य पौराणिक-आधुनिकतावादी उपन्यास उपन्यास 544 81-216-1210-4 प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स मूल्य : $21.95 हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठतम उपन्यासों में से एक 'वसुदेव' कालजयी कथाकार एवं मनीषी डॉ॰नरेन्द्र कोहली द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास है। भारत की पौराणिक गाथाओं में वसुदेव और देवकी सुपरिचित नाम हैं। कृष्ण के माता-पिता के रूप में उन्हें सभी जानते हैं। किंतु, उनके बारे में विस्तार से चर्चा कम ही होती है। प्रख्यात उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली ने अपने उपन्यास ‘वसुदेव’ के द्वारा इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया है। उन्होंने वसुदेव-देवकी के उस जीवनकाल का वर्णन किया है जिसमें उनकी चरम जिजीविषा के दर्शन होते हैं। वसुदेव और देवकी के विवाह से लेकर कंस वध तक के विभिन्न घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए लेखक ने तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों को भी दर्शाने का एक सफल प्रयास किया है। इस उपन्यास की कथा ‘वासुदेव’ की नहीं, बल्कि ‘वसुदेव’ की है। व्यक्ति के धरातल पर वह चरित्र की शुद्धता की ओर बढ़ रहे हैं, समाज के धरातल पर सारे प्रहार अपने वक्ष पर झेलकर जागृति का शंख फूंक रहे हैं और राजनीति के धरातल पर एक सच्चे क्षत्रिय के रूप में शस्त्रबद्ध हो सारी दुष्ट शक्तियों से लोहा ले रहे हैं। इसमें उपनिषदों का अद्वैत वेदान्त भी है, भागवत की लीला और भक्ति भी तथा महाभारत की राजनीति भी। किन्तु नरेन्द्र कोहली कहीं नहीं भूलते कि यह कृति एक उपन्यास है। एक मौलिक सृजनात्मक उपन्यास। इस अद्भुत कथा में दुरूहता अथवा जटिलता नहीं है। यह आज का उपन्यास है। आप इसमें अपनी और अपने ही युग की अत्यन्त सरस कथा पाएंगे। कथावस्तु लेखक ने अपने उपन्यास में जिस प्लाट को लिया है, उसकी सभी बातें जगजाहिर हैं। उसके सभी मुख्य प्रसंग भारतीयों को कंठस्थ हैं। इसके बावजूद यह लेखक की कुशलता ही है कि उपन्यास में कहीं भी बोरियत नहीं होती। पौराणिक गाथाओं में वसुदेव और देवकी के विवाह तथा कृष्ण जन्म के बीच न के बराबर प्रसंग हैं। लेकिन इस शून्य में भी लेखक ने बड़े ही तार्किक ढंग से कई प्रसंगों की रचना की है। उपन्यास विधा में लेखक की पकड़ का यह प्रतीक है। पूरे उपन्यास में कुल 62 अध्याय हैं। जिनमें से 28 अध्याय कृष्ण के जन्म से पूर्व के घटनाक्रम के बारे में हैं। और यही 28 अध्याय पूरे उपन्यास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। इनमें देवकी और वसुदेव की चरम जिजीविषा का लोमहर्षक विवरण बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया गया है। किसी भी पाठक के लिए इन अध्यायों को पढ़ना अपने आप में अद्भुत अनुभव होगा। अलौकिक प्रसंगों की तर्कसंगत व्याख्या वसुदेव में पुराण कथा से कोई छेड़-छाड़ किए बिना, ही इसे तार्किकता का बाना पहनाया गया है। कथा में आने वाले अलौकिक प्रसंग जैसे कृष्‍ण के जन्म के समय कारागार के द्वार स्वत: खुल जाने को तर्कसंगत एवं युगानुकूल बनाया गया है। कृष्‍ण के जन्म के समय भयंकर वर्षा के कारण, अपने परिवारों की सुरक्षा हेतु चिंतित, कारागार के समस्त प्रहरी घबराहट और जल्दबाजी में द्वार खुले छोड़कर ही चले गए। दूसरा प्रसंग कृष्‍ण द्वारा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत धारण करने का है, जिसकी व्याख्या देवकी के मुख से लेखक ने इस प्रकार की है, कृष्‍ण ने गोपालों को लगाकर, भूमि खोदकर मिट्टी गोवर्धन पर चढ़ाकर उसे और ऊंचा कर दिया, इतनी ऊंची भूमि तैयार कर ली जिस पर सारे गोपाल और गाय सुरक्षित रह सकें, वहां तक बाढ़ का पानी नहीं चढ़ सकता। कथानक नायक वसुदेव अन्याय के सम्मुख न झुकने वाले और नीति एवं युक्ति से अपने संघर्ष को जारी रखने की शक्ति के प्रतीक हैं। देवकी के विवाह के पश्चात् विदाई के समय, मागध तांत्रिक भविष्यवाणी करता है कि देवकी की संतान से कंस के प्राणों को संकट है, कंस देवकी को मारने हेतु खड्ग उठा लेता है, यह देखकर भी वहां उपस्थित किसी भी व्यक्ति के हृदय में कंस के विरोध का विचार नहीं आता। कंस के राज्‍य में सर्वत्र भय, असहायता और विवशता ही व्याप्त है। ऐसी स्थिति में देवकी के पिता देवक और सगे भाई भी खड्ग तो क्या उठाते, जिह्वा से भी विरोध नहीं करते। वसुदेव, जो देवकी के पति हैं, क्रोधित नहीं होते, संतुलित मस्तिष्क से विचार करते हुए परिस्थिति को समझने का प्रयास करते हैं। जब कंस ने महाराजा उग्रसेन से सत्ता छीनकर उन्हें बंदी बना लिया तब उनकी सहायता के लिए ही कोई नहीं आया, मेरी सहायता कौन करेगा ? अत: वे संपूर्ण स्थिति का मन ही मन मूल्यांकन करके, तत्काल ही शक्ति नहीं वरन् युक्ति से काम लेने का निश्चय करते हैं। साहसी और नीति कुशल वसुदेव, कंस को देवकी का वध करने से रोकते हुए, कंस को वचन देते हैं कि वे देवकी की प्रत्येक संतान उसे सौंप देंगे। वसुदेव आस्थावादी हैं, उनका ईश्वर में अटूट विश्वास है। उनकी जिजीविषा प्रेरणादायी है। वे कहते हैं, मैं सैनिक हूं और सैनिक तब तक अपना शस्त्र नहीं छोड़ता, जब तक उसकी भुजा ही न कट जाए। वे संतान की रक्षा हेतु अथक प्रयास करते हैं, परंतु असफल ही रहते हैं। उनके सामने छ: संतानों का वध हो जाता है, परंतु देवकी के सातवें गर्भ को रोहिणी के शरीर में सुरक्षित करके, रोहिणी को नंदगांव भेजने में वे सफल हो ही जाते हैं। आठवीं संतान को वे स्वयं प्रतिकूल परिस्थिति में भी नंद को सौंपकर आते हैं। इसके पश्चात् भी वसुदेव कंस की शक्ति के सम्मुख पराजित नहीं होते। वे आह्वान करते हैं, देश के हित में अपना हित देखना सीखो, देश सुरक्षित नहीं तो हममें से कोई सुरक्षित नहीं है। कंस के वध के उपरांत भी यह उपन्यास समाप्त नहीं होता क्योंकि अधर्म का आधार स्तम्भ मथुरा नरेश कंस नहीं वरन् मगध नरेश जरासंध है। कंस वध के उपरांत, यादवों को समाप्त करने और मथुरा को नष्ट करने हेतु जरासंध के आक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। उपन्यास के अंतिम दृश्य में, अंतिम पृष्ठ पर वसुदेव यादवों का धर्मयुद्ध के लिए आह्वान करते हैं। इस समय भी वे अकेले ही संघर्ष के लिए तैयार हैं, धर्मयुद्ध में यह चिंतन नहीं करना होता है कि कौन मेरे साथ आएगा, कौन नहीं आएगा। इतना समझ लो कि मैं न युद्ध की अवहेलना करना चाहता हूं, न पलायन। क्षत्रिय तब तक संघर्ष से पीछे नहीं हटता, जब तक उसका मस्तिष्क ही न कट जाए।2 चरित्र-चित्रण नरेन्द्र कोहली ने अपने उपन्यास 'वसुदेव' में साहित्य में उपेक्षित रहे पात्र वसुदेव और देवकी को केन्द्र में रखकर कथा का ताना-बाना बुना है। इस उपन्यास के सभी प्रमुख पात्र -वसुदेव, देवकी, रोहिणी, नंद, बलराम हमारे सम्मुख नवीन एवं तेजस्वी रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। यद्यपि लेखक ने पौराणिक कथा में कोई परिवर्तन नहीं किया है, तथापि सभी पात्र और संपूर्ण कथानक, प्रेरणा और शक्ति के स्रोत तथा प्रासंगिक प्रतीत होते हैं और यही इसकी विशिष्टता है। वसुदेव कृष्‍ण के पिता होते हुए भी कृष्‍ण-साहित्य में उपेक्षित ही रहे हैं, सूर एवं सूर के सम-सामायिक परवर्ती कवियों की दृष्टि से भी उपेक्षित। वसुदेव या तो कंस के कारागार में असहाय और विवश बंदी दिखाई देते हैं या कृष्‍ण-जन्म के समय पुत्र को सुरक्षित गोकुल पहुंचाने हेतु आकुल उफनती यमुना पार करने वाले वसुदेव से ही हम परिचित हैं। इसके पश्चात् कंस-वध के बाद कारागार से मुक्त होने पर ही वसुदेव दृष्टिगोचर होते हैं। इसी प्रकार कृष्‍ण की माता के रूप में, कृष्‍ण की बाल-लीलाओं के वर्णन में यशोदा ही सामने आती है, देवकी नहीं। आधुनिक काल में हिन्दी साहित्य में भी केवल पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र के 'कृष्‍णायन' में और मैथिलीशरण गुप्त के 'द्वापर' में वसुदेव-देवकी का चित्रण किया गया है, लेकिन परंपरागत रूप में ही। इसी प्रकार रोहिणी का चरित्र भी कृष्‍ण-भक्ति काव्य में वात्सल्य की दृष्टि से यशोदा की छाया मात्र ही है। कृष्‍ण और बलराम की परिचर्चा में ही उसका एक दो बार उल्लेख किया गया है। नंद का स्थान भी गौण ही रहा है। गुप्त जी के द्वापर एवं हरिऔध के 'प्रिय प्रिवास' में अवश्‍य नंद का उल्लेख मिलता है। देवकी-वसुदेव की कथा कहते हुए लेखक ने बड़ी कुशलता से कृष्ण की बाललीलाओं का भी चित्रण किया है। अपने पूर्व उपन्यासों की भांति लेखक ने इस उपन्यास में भी कई प्रसंगों का प्रचलित धारणाओं के विपरीत मानवीकरण का प्रयास किया है, उनकी तार्किक प्रस्तुति का सहारा लिया है। लेकिन, साथ ही उन्होंने कई प्रसंगों में ईश्वरीय चमत्कार को भी स्वीकार किया है। वसुदेव महाभारत और कृष्ण से जुड़े विभिन्न धारावाहिकों में देवकी और वसुदेव का चित्रण प्राय: एक ऐसे असहाय माता-पिता के रूप में किया गया है, जो हाथ पर हाथ रखकर ईश्वरीय चमत्कार की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन, अपने इस उपन्यास में लेखक ने वसुदेव-देवकी के जीवन के उन सबसे मुश्किल क्षणों का एक बिल्कुल ही अलग चित्र खींचा है। उन्होंने वसुदेव को एक ऐसे कर्मयोगी के रूप में प्रस्तुत किया है जो अपनी विलक्षण मेधाशक्ति और सूझबूझ के साथ कंस के अन्याय का विरोध करते हैं। 'वसुदेव' लेखक की उपन्यास-कला तथा चिंतन शैली का सहारा पाकर एक स्‍पृहणीय व्यक्तित्व के रूप में उभर कर आए हैं। वे भारतीयता के आख्याता हैं तथा कष्‍ट सहने में चट्टान के समान वज्र-कठोर हैं। वे गंभीर हैं, वीर हैं, शस्त्र तथा शास्त्र के ज्ञाता हैं। नीतिनिपुण हैं और समायानुकूल आचरण करने वाले हैं। विषम से विषम परिस्थिति भी उन्हें तोड़ नहीं पाती। वे आस्तिक हैं तथा प्रभु की सामर्थ्य में उनका अटूट विश्‍वास है। स्वभाव से धैर्यवान होने के साथ-साथ वे उद्घत है। क्षत्रियोचित स्वाभिमान उनमें कूट-कूट कर भरा है। शास्‍त्रीय दृष्टि से वे धीरोदात्त नायक हैं उन्होंने कहा कि वसुदेव नीतिनिपूण हैं तथा व्यवहारिक हैं। तत्कालिक संकट से मुक्ति पाने के लिए दिए गए वचन की पालना करना वे आवश्‍यक नहीं समझते इसीलिए अपने पुत्रों को कंस से बचाने की योजना बनाते हैं तथा सातवें तथा आठवें पुत्रों की रक्षा करने में सफल रहते हैं। उन्होंने कहा कि वसुदेव का व्यक्तित्व श्रद्धास्पद है। वे विकट योद्धा हैं तथा मथुरा के समाज में उनके प्रति अटूट श्रद्धा है।http://www.abhivyakti-hindi.org/samachar/2007/samachar27.htm संग्रहीत प्रति 1 मार्च 2010 https://web.archive.org/web/20100613045820/http://abhivyakti-hindi.org/samachar/2007/samachar27.htm 13 जून 2010 dead देवकी देवकी भी वसुदेव के समान ही धैर्यशील, साहसी, आस्थावादी एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवट से काम लेने वाली शक्तिशालिनी नारी के रूप में दृष्टिगोचर होती है। उपन्यास के आरंभ में देवकी उतनी शक्तिशालिनी अथ्‍वा परिपक्व दिखाई नहीं देती, परंतु परिस्थितियों की अग्नि में तपकर वह सशक्त होती जाती है। यहां तक कि जब प्रथम पुत्र के वध के बाद, जहां वसुदेव निराश हो जाते हैं, देवकी सच्ची अर्धांगिनी के समान उनकी शक्ति बनती है। निराशा में डूबकर जब वसुदेव कहते हैं हम और पुत्रों को जन्म नहीं देंगे। देवकी दृढ़तापूर्वक कहती है - हम पुत्रों को जन्म देंगे ताकि हमारा आठवां पुत्र यथाशीघ्र इस अत्याचारी को समाप्त कर सके। यहां हम देवकी के (परम्परागत चरित्र के विपरीत) साहसी, ओजस्वी, जुझारु व्यक्तित्व से परिचित होते हैं। कंस के कारागार में भी देवकी सहमी हुई हिरनी नहीं वरन् सिंहनी जैसी दिखाई देती है। कृष्‍ण के जन्म से पूर्व तो वह भय और आशंका के स्थान पर अपूर्व आनंद में डूबी हुई दिखाई देती है। कंस कंस इस उपन्यास में सत्ता, शक्ति, अन्याय तथा अत्याचार का प्रतीक - एक खलनायक है। वह अपने पिता उग्रसेन से दस्यु के समान सत्ता छीनकर, स्वयं राजा बन जाता है। उसकी क्रूरता, शक्ति और आतंक के कारण कोई भी उसका विरोध करने का साहस नहीं करता। वसुदेव के प्रथम पुत्र का जन्म होने पर वह उसका वध कर देता है; परंतु वह इतना भयभीत है कि शिशु के अंतिम संस्कार के लिए वसुदेव के साथ कुछ लोगों को जाने की अनुमति भी नहीं देता। वह डरता है, कहीं कोई विरोध-प्रदर्शन या आंदोलन खड़ा न हो जाए। कंस के लिए, देवकी का सातवां गर्भ पहेली बन जाता है, अत: विवश एवं क्रोधित कंस, वसुदेव-देवकी को कारागृह में डाल देता है। जब वसुदेव की आठवीं संतान कन्या होती है, तब भी उसे संदेह होता है। उसे नंद के पुत्र कृष्‍ण पर संदेह होता है तो वह उसे मारने के अनेक असफल प्रयत्न करता है। अंतत: कृष्‍ण-बलराम को समाप्त करने के लिए वह षड्यंत्र रचता है और उन्हें मथुरा लाने हेतु अक्रूर को भेजता है। किंतु होता वही है, जो मागध तांत्रिक की भविष्यवाणी थी। देवकी की आठवीं संतान अर्थात् कृष्‍ण कंस का वध कर देते हैं। रोहिणी रोहिणी इस उपन्यास में एक और सशक्त पात्र है, जो हर कदम पर वसुदेव-देवकी का साथ देती है। यहां तक कि वह देवकी के सातवें गर्भ को स्‍वयं अपने शरीर में धारण करती है और नंदगांव जाकर बलराम को जन्म देती है। वह धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने वाली, तत्कालीन समाज और राजनीति की बारीकियों को समझने वाली विदुषी है। वह नंद को मथुरा की राजनीति और कंस के कारनामों से परिचित करवाती है। कंस से मुक्ति पाने का उपाय सुझाते हुए वह नंद से कहती है, सबसे पहले प्रजा की चेतना को कंस के कारागार से मुक्त करना होगा।3 उपन्यास के अंत में बलराम के प्रति उसका अधिकार भाव तथा मोह का अतिरेक, उसकी स्त्री सुलभ कमजोरी के परिचायक हैं। गुरु गर्गाचार्य गुरु गर्गाचार्य, उपन्यास के एक और सशक्त पात्र हैं जो उपन्यास में शक्ति के स्रोत के रूप में सामने आते हैं। वे धर्म के मर्म को समझते हैं और वसुदेव को हताशा और निराशा के क्षणों में सही मार्ग दिखाकर संघर्ष की प्रेरणा देते हैं। वे वसुदेव को स्मरण कराते हैं, तुम पर समाज में सतोगुण जगाने का दायित्व है। समाज की कायरता निरंतर किसी कंस का निर्माण करती है। जाओ साहसपूर्वक जीवन का संग्राम लड़ो। 4 यशोदा और कृष्‍ण यशोदा और कृष्‍ण को परंपरागत भूमिका में ही प्रस्तुत किया गया है। इन पात्रों में कोई नवीनता नहीं है। यह अवश्य है कि वसुदेव के नायक वसुदेव हैं, अत: कृष्‍ण यहां प्रमुख भूमिका में नहीं हैं, वे वसुदेव के लक्ष्य को पूर्ण करने में सहायक मात्र हैं। संवाद उपन्यास में देवकी-वसुदेव, नंद यशोदा, नंद-रोहिणी, वसुदेव-गर्गाचार्य के बीच कई ऐसे संवाद हैं जो भारत की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति और उसमें व्याप्त समस्याओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अध्याय 24 में एक जगह रोहिणी-नंद संवाद विशेष रूप से उल्लेखनीय है : रोहिणी नंद से कहती हैं, ”प्रजा का यह भ्रम दूर करना है कि कंस उनका राजा है।” ”राजा कंस नहीं है तो यादवों का राजा कौन है?” नंद कुछ संभ्रम में थे। ”कोई वन में रहकर प्रजा को लूटे, उसे पीड़ित करे, तो वह क्या है?” ”वह दस्यु है।” ”और वही दस्यु वन से निकल कर राजप्रासाद में आ जाए, तो वह राजा हो जाएगा क्या?” रोहिणी ने कहा, ”इसी भ्रम को तो मिटाना है। राजप्रासाद में रहने, राजसभा में सिंहासन पर बैठने तथा सेना पर नियंत्रण कर लेने से तो कोई राजा नहीं होता।” प्रतिपाद्य एवं प्रासंगिकता नरेन्द्र कोहली ने यह गाथा केवल आध्यात्मिक पक्ष की न रख आधुनिक सन्दर्भ से जोड़ कर सरल व्यवहार में लिखी है। कहानी द्वापर युग की होने के पश्चात् भी आज की परिस्थितियों से जोड़ी जा सकती हैं। उपन्यास में श्री कृष्ण के जन्म संबंधित घटनाएँ तथा उन के आलोकिक कृत्यों को आज के उन वैज्ञानिक बुद्धि वाले पाठकों को ध्यान में रख कर उकेरा गया हैं जो 'Mythology' और 'Science Fiction' के प्रति अलग अलग दृष्टिकोण रखतें हैं। उपन्यास के मध्यांतर पश्चात लगता ही नहीं कि आप कोई ऐतहासिक कथा पढ़ रहे हैं अपितु लगता है आज के ही राजनीतिक व सामाजिक परिवेश का चित्र देख रहे हैं। कंस को प्रसन्न करने के लिए उस के मंत्रियों सहित समाज के बुद्धिजिवियों द्वारा अपनी आत्मा बेच देने का अध्याय आज का ही लगता है। इतना ही नहीं कंस के एक शिक्षा मंत्री के कारनामें, नाम व ब्योरा अनायास ही पाठक के चेहरे पर मुस्कान ला देता है। लेखक ने पूरी क्षमता से समाज के उन लोगों को जागृत करने का प्रयास किया है जो अपने वातानुकूलित कक्षों में बैठ देश की अच्छी बुरी दशा पर अपनी राय देतें हैं और स्वयं वोट देना भी शर्म का काम समझतें हैं। देवकी वसुदेव की इस गाथा का एक मात्र और मुख्य संदेश यही हैं कि राष्ट्र की प्रत्येक समस्या का स्रोत, संताप और समाधान राष्ट्र के समाज में ही होता है और समाज के वसुदेव जैसे मनीषियों के बलिदानों से ही देश सुरक्षित व सभ्य रह पाता है। श्री कृष्ण जैसे अवतारों का अवतरण भी इन्हीं मनीषियों की तपस्या का परिणाम होता है न कि कोई स्वाभाविक प्रक्रिया। देश व समाज की हर समस्या पर शासक व राजनीति को दोष न दे कर स्वयं अपना धर्म निभाना और फिर उस कर्तव्यपूर्ति पश्चात किसी पुरस्कार की अपेक्षा न करने का संदेश ही संभवत: लेखक का निहित उद्देश्य है। यह उपन्यास एक और नागयज्ञ का मंगलाचरण है तथा समस्त भारतवासियों को इसमें आहुति देने का खुला निमंत्रण भी इसी में है। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग कंस के युग का ही अनुवाद है। इस युग में भी वसुदेव अनिवार्य हैं। जो कृष्‍ण को अपने रक्त में धारण कर सकें। तभी अधर्म का नाश और धर्म की रक्षा संभव है। इसी हेतु वसुदेव की रचना अत्‍यंत प्रासंगिक है। - अरविंद सोरलअभिव्यक्ति कोटा में वसुदेव' का लोकार्पण http://www.abhivyakti-hindi.org/samachar/2007/samachar27.htm https://web.archive.org/web/20100613045820/http://abhivyakti-hindi.org/samachar/2007/samachar27.htm 13 जून 2010 नरेन्द्र कोहली कृत 'वसुदेव' का हिन्दी औपन्यासिक साहित्य में स्थान सामाजिक उपन्यासों में जो स्थान प्रेमचंद के 'गोदान' का है, पौराणिक-आधुनिकतावादी उपन्यासों में नरेन्द्र कोहली कृत 'वसुदेव' का स्थान उससे तनिक भी न्यूनतर नहीं है। 'वसुदेव' मनुष्य की जिजीविषा, अन्याय एवं दमन के विरुद्ध लड़ने की उसकी अदम्य इच्छाशक्ति का एवं उसकी निष्कपट आस्था एवं समर्पण का अद्भुत महाकाव्य है। जहां 'गोदान' में प्रेमचंद ने जर्जर ग्रामीण एवं शहरी जीवन की सामाजिक व्यवस्था का मार्मिक चित्रण किया है, वहीं 'वसुदेव' में कोहली ने लोभ, स्वार्थ एवं त्रास से क्षीयमान समाज को कुशलता से न सिर्फ उकेरा है बल्कि उसके कारणों की भी खासी पड़ताल करी है। प्रेमचंद ने 'गोदान' में मालती एवं मेहता के संवादों के माध्यम से अपने दार्शनिक विचारों को सामने रखा है, जो पर्याप्त लम्बे और उबाऊ हो गए हैं एवं कथा के प्रवाह में विघ्न उत्पन्न करते हैं। पाठक उन्हें सरसरी निगाह से पढ़कर या पन्ने पलट कर छोड़ देता है। इसके विपरीत 'वसुदेव' में कोहली का चिंतन संक्षिप्त सूक्तियों के माध्यम से प्रकट होता है, जो पाठक के दिमाग को तुरंत पकड़ लेती हैं। कथा के रस में व्याघात उत्पन्न नहीं होता, वरन पाठक एक नयी उपलब्धि पर मन ही मन और तृप्त होता हुआ और सामग्री की अपेक्षा में आतुरतापूर्वक आगे पढता चलता है। संक्षेप में कहा जाये तो प्रतिपाद्य, शिल्प और भाषा की दृष्टि से 'वसुदेव' के रूप में हिन्दी उपन्यास के उस विकास के चरम के दर्शन होते हैं जो लगभग सात दशकों पूर्व प्रेमचंद के 'गोदान' के रूप में उपलब्ध हुआ था। हिन्दी साहित्य के भविष्य के लिए यह तथ्य अत्यंत उत्साहजनक है कि विभिन्न ऊँचे -नीचे मोड़ों से गुज़रते हुए हिन्दी उपन्यास ने यह मुकाम हासिल कर लिया है। इस सदी के पूर्वार्ध में नरेन्द्र कोहली के रूप में हिन्दी ने उस कालजयी साहित्यकार को अपने विकसित रूप में पुनः प्राप्त कर लिया है जो उसने प्रेमचंद के रूप में पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में खोया था।