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कल्ला जी राठौड़
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कल्ला जी राठौड़ राठौड़ वंश आसा सिंह कृष्णा विक्रम संवत 1601, आश्विन शुक्ल अष्टमी मेड़ता, राजस्थान विक्रम संवत 1624 चित्तौड़गढ़ दुर्ग, मेवाड़ हिन्दू
thumb|मेवाड़ राज्य का नक्शा
कल्ला जी राठौड़ (आश्विन शुक्ल 8, 1601 विक्रमी - 1624 विक्रमी) राजस्थान के एक राजपूत योद्धा थे जिन्हें लोकदेवता माना जाता है।https://www.google.co.th/books/edition/Mev%C4%81%E1%B8%8Da_itih%C4%81sa_ke_avismara%E1%B9%87%C4%ABya_pr/mlJuAAAAMAAJ?hl=en&gbpv=1&bsq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC&dq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC&printsec=frontcover Mewar Itihas ke Avismaryiya Prasang गुप्ता कृष्ण स्वरूप 2005 शब्द महिमा प्रकाशन 4 सितंबर 2008 ये मेड़ता के राव जयमल के छोटे भाई आसा सिंह के पुत्र थे।https://books.google.co.in/books?id=TdRHAAAAMAAJ&q=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC+rajput&dq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC+rajput&hl=hi&sa=X&ved=2ahUKEwig8vma9KXuAhXbXSsKHQlpDgQQ6AEwBXoECAYQAg Vāgaṛa aura usakā sāhitya Agravāla Mathurā Prasāda Śarmā Girīśa 1966 Mantrī, Vāgaṛa Pradeśa Sāhitya Parishada hi [ http://www.vskgujarat.com/24-फरवरी-लोकदेवता-कल्ला-जी-र/ https://web.archive.org/web/20190911081836/http://www.vskgujarat.com/24-%E0%A4%AB%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%B0 11 सितंबर 2019 लोकदेवता कल्ला जी राठौड़] इन्होने मेवाड़ के लिये महाराणा प्रताप के साथ अकबर से युद्ध किया था। शीश कटने पर भी लड़ता रहा था धड़, ऐसा था अकबर की सेना से लड़ने वाला शूरवीरये तीसरे साका युद्ध (विक्रम संवत 1624) में चित्तौड़गढ़ में अकबर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त http://vedicuniversity.co.in/ संग्रहीत प्रति 27 अगस्त 2015 https://web.archive.org/web/20160110014234/http://vedicuniversity.co.in/ 10 जनवरी 2016 dead हो गये थे।
इतिहास
कल्ला जी राठौड़ का जीवन वीरता, त्याग और अदम्य साहस का अनुपम उदाहरण है, जिसकी स्मृति में 24 फ़रवरी को उनका बलिदान दिवस श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। राजस्थान की वीरभूमि ने अनेक ऐसे योद्धाओं को जन्म दिया, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा हेतु अपने प्राणों का अर्पण किया और लोकमानस में देवतुल्य सम्मान प्राप्त किया—कल्ला जी राठौड़ उन्हीं में से एक महान विभूति थे। उनका जन्म विक्रम संवत 1601 की आश्विन शुक्ल अष्टमी को मेड़ता के राजपरिवार में हुआ था। उनके पिता अचलसिंह, राव जयमल के छोटे भाई थे, जबकि भक्ति की प्रतिमूर्ति मीराबाई उनकी बुआ थीं।https://www.google.co.th/books/edition/Dharohar_Basic_Computer_Anudeshak_Evem_V/OXdgEAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC&pg=PA37&printsec=frontcover Dharohar Basic Computer Anudeshak Evem Varisth Computer Anudeshak (Hindi Edition) राव कुंवर कनक सिंह 2022 प्रभात प्रकाशन 5 मार्च 2022 9789354882760
बाल्यकाल से ही कल्ला जी में ज्ञान और शौर्य का अद्वितीय समन्वय दिखाई देता था। उन्होंने सामान्य शिक्षा के साथ-साथ योगाभ्यास, औषध विज्ञान और शस्त्र संचालन में विशेष दक्षता प्राप्त की। प्रसिद्ध योगी भैरवनाथ से उन्होंने योग की दीक्षा ली, जिसने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ और संयमित बनाया।
इसी कालखंड में मुगल सम्राट अकबर ने मेड़ता पर आक्रमण किया। राव जयमल के नेतृत्व में आसासिंह और कल्ला जी ने शत्रु का डटकर सामना किया, किंतु परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने पर जयमल अपने परिवार सहित चित्तौड़ चले गए। वहाँ राणा उदयसिंह ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और बदनौर की जागीर प्रदान की, जबकि कल्ला जी को रणढालपुर की जागीर देकर सीमांत क्षेत्र की सुरक्षा का दायित्व सौंपा।
कुछ समय पश्चात उनका विवाह शिवगढ़ के राव कृष्णदास की पुत्री कृष्णा से निर्धारित हुआ। किंतु विवाह के शुभ क्षणों में ही चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण का समाचार प्राप्त हुआ।https://www.google.co.th/books/edition/V%C4%ABra_Kall%C4%81_R%C4%81%E1%B9%ADhau%E1%B9%9Ba/UjluAAAAMAAJ?hl=en&gbpv=1&bsq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC&dq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC&printsec=frontcover Vīra Kallā Rāṭhauṛa सुखावाला घनश्याम 1995 साहित्यागार 3 सितंबर 2008 कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए कल्ला जी ने विवाह की औपचारिकताएँ पूर्ण कीं और अपनी नवविवाहिता पत्नी से शीघ्र लौटने का वचन देकर रणभूमि की ओर प्रस्थान कर दिया।
चित्तौड़ का किला चारों ओर से शत्रु सेना से घिर चुका था। भीषण संघर्ष के दिनों में जब वीरों की संख्या घटने लगी, तब सेनापति जयमल ने अंतिम युद्ध का निर्णय लिया। 23 फ़रवरी 1568 की रात्रि को क्षत्राणियों ने जौहर कर अपनी अस्मिता की रक्षा की, और अगले दिन 24 फ़रवरी को मेवाड़ी वीरों ने केसरिया धारण कर मृत्यु से निर्भय होकर युद्धभूमि में प्रवेश किया।
युद्ध के दौरान राव जयमल के पैर में गोली लग गई, जिससे वे खड़े होने में असमर्थ हो गए। उस निर्णायक क्षण में कल्ला जी ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए जयमल को अपने कंधों पर बैठा लिया और उनके हाथों में तलवार थमा दी। स्वयं भी दोनों हाथों में तलवारें लेकर वे रणभूमि में उतर पड़े। चारों तलवारें मानो बिजली की गति से चलने लगीं, और शत्रु सेना में भय और आतंक छा गया।https://www.google.co.th/books/edition/Dharohar_Rpsc_Grade_1_Samanya_Gyan_Evam/SDd0EAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC&pg=PA140&printsec=frontcover Dharohar Rpsc Grade-1 Samanya Gyan Evam Shaikshik Prabandhan राव कुंवर कनक सिंह 2022 प्रभात प्रकाशन 9 जून 2022 9789354883538 यह दृश्य देखकर अकबर को प्रतीत हुआ मानो कोई चार भुजाओं वाला देवता युद्ध कर रहा हो।https://www.google.co.th/books/edition/Dharohar_Vastunisth_Rajasthan_Rajasthan/4OKTEAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE+%E0%A4%9C%E0%A5%80+%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC&pg=RA3-PA69&printsec=frontcover Dharohar Vastunisth Rajasthan (Rajasthan Objective Hindi) राव कुंवर कनक सिंह 2022 प्रभात प्रकाशन 8 अक्टूबर 2022 9789354884580
अंततः इस भीषण संघर्ष में दोनों वीर गंभीर रूप से घायल हो गए। कल्ला जी जब जयमल की सहायता करने का प्रयास कर रहे थे, तभी एक शत्रु सैनिक ने पीछे से वार कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। किंतु लोककथाओं के अनुसार, सिर कटने के पश्चात भी उनका शरीर कुछ समय तक युद्ध करता रहा—यह दृश्य उनकी अदम्य वीरता और अमर बलिदान का प्रतीक बन गया।
इस प्रकार, कल्ला जी राठौड़ का जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्य और देशभक्ति की ऐसी प्रेरणादायी गाथा है, जो आज भी जनमानस में अटूट श्रद्धा और सम्मान के साथ जीवित है।
सन्दर्भ
श्रेणी:मेवाड़ के शासक