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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

गुरु घासीदास

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फ़रवरी 2015 गुरु घासीदास जी Guru Ghasidas ji 1987 stamp of India.jpg 18 दिसम्बर,1756 गिरौदपुरी धाम, छत्तीसगढ़, भारत 1850 1756-1850 (सतनामी) सफुरा माता गुरु बालकदास महगूंदास, माता अमरौतिन गुरु अमरदास जी, राजा गुरु बालकदास जी गुरु अड़गड़िहादास जी , गुरु आगरदास जी , सहोद्रा माता जी गुरू घासीदास (1756 – 1850) भारत के एक सन्त थे जो छत्तीसगढ़ राज्य के बलोदा बाजार जिले के गिरौदपुरी गांव में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ अवतरित हुये थे। वे सतनाम पंथ जिसे आम बोलचाल में 'सतनामी समाज' कहा जाता है, के प्रवर्तक थे। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिवाद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान मनखे-मनखे एक समान यह संदेश दिया। इनसे समाज के लोग बहुत ही प्रभावित थे। जीवनी गुरू घासीदास का जन्म 1756 में बलौदा बाजार जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में पैदा हुए थे। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर कुठाराघात किया। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाया जाता है। गुरू घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड पर समाधि लगाये इस बीच गुरूघासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की। गुरु घासीदास ने सतनाम धर्म की स्थापना की और सतनाम धर्म की सात सिद्धांत दिए। सतनामी समाज १९५० के बाद से आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े होने के कारण अनुसुचित जाति मे शामिल कर लिया गया। गुरू घासीदास की शिक्षा गुरु घासीदास बाबा जी के शिक्षा दीक्षा के संबंध में जितने भी जानकारियां दी जाती है वे सब भ्रामक है उन्होंने किसी से भी शिक्षा प्राप्त नहीं किया और न ही उनके कोई गुरु थे बाबा घासीदास स्वयं महाज्ञानी थे। गुरू घासीदास बाबाजी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरू घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरता पूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरू घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरू घासीदास के सिध्दांतों का गहरा प्रभाव था। गुरू घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है। सात शिक्षाएँ सत्गुरू घासीदास जी की सात शिक्षाएँ हैं- (१) सतनाम् पर विश्वास रखना। (२) जीव हत्या नहीं करना। (३) मांसाहार नहीं करना। (४) चोरी, जुआ से दूर रहना। (५) नशा सेवन नहीं करना। (६) जाति-पाति के प्रपंच में नहीं पड़ना। (७) व्यभिचार नहीं करना। सत्य एवं अहिंसा धैर्य लगन करूणा कर्म सरलता व्यवहार इन्हें भी देखें गुरू घासीदास विश्‍वविद्यालय, बिलासपुर सतनाम आंदोलन सतनाम समाज बाहरी कड़ियाँ सतनाम के संस्थापक संतगुरु घासीदास जी गुरू घासीदास (छत्तीसढ़ सरकार का जालघर) Satnam Description Satnami Wiki Text From Ian E Akbari Satnami Website By Mr. T. R. Khuntā A Website on Guru Ghāsidāsजून 2020 InternetArchiveBot A Disciple of Sat A Yog Guru From Kurukshetra Collection of Satnam Panthi Songs सन्दर्भ श्रेणी:सन्त