411 REFERENCE · Wikipedia
सेरिवाणिज जातक कथा
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
सेरिवाणिज जातक बुद्ध के पाँच सौ पचास जातकों https://www.pitt.edu/~dash/jataka.html jataka tales में से एक है। तथागत ने यह कथा तब सुनायी जब वे श्रावस्ती के जेतवन में थे।
कथा
अब से पाँच कल्प पूर्व बोधिसत्त्व सेरिव नामक देश में फेरी करने वाले बनिए (वाणिज) के रूप में पैदा हुए थे। वह सेरिव नामक एक (दूसरे) फेरी करने वाले लोभी बनिये के साथ नील वाहिनी नामक नदी पार कर, अन्धपुर नामक नगर में गये । दोनों ने नगर की गलियों को आपस में बाँट लिया। बोधिसत्त्व अपने हिस्से की गलियों में सौदा बेचते; दूसरा बनिया अपने हिस्से की गलियों में।
उस समय नगर के एक सेठ का परिवार दरिद्र हो गया था। उसके जातिसम्बन्धी और उसका धन नष्ट हो गया था। उस परिवार में बाकी रह गई थी अपनी दादी के साथ एक लड़की। दोनों जने दूसरों की नौकरी-चाकरी मजदूरी करके पेट पालते थे। लेकिन, उनके घर में पहले महासेठ के उपयोग में आनी वाली दूसरे साधारण बरतनों में फेंकी हुई एक सोने की थाली थी। चिरकाल से उपयोग में न आने के कारण वह मैली हो गई थी। वह दोनों इतना भी नहीं जानती थीं कि यह सोने की थाली है। उस समय वह लोभी बनिया “(हीरे) मोती लो, (हीरे) मोती लो’ कहता घूमता हुआ, उस घर के सामने आया। लड़की ने उसे देख कर अपनी दादी से कहा, “अम्मा ! मुझे एक कण्ठा दिला दो।” अम्मा ने कहा,"हम दरिद्र क्या देकर लेंगे।" “हमारे पास यह थाली जो है, यह हमारे किसी काम की नहीं है, इसे दे कर ले लें।”
उसने (दादी ने) व्यापारी को बुला कर, आसन पर बिठा, वह थाली देकर कहा– “आर्य ! इस थाली को लेकर, अपनी बहन को कुछ दे दो।” व्यापारी ने थाली हाथ में ले, सोने की थाली होगी सोच उलट कर, थाली की पीठ पर सूई से रेखा खीची। सोने की है जान, “इनसे मुफ्त में ही थाली लेनी चाहिये” सोच कहा, “यह कितने दाम की होगी ? यह तो आधे मासे के मूल्य की भी नहीं है” कह थाली को भूमि पर फेंक, आसन में उठ कर चला गया। (अपने में तै पाये नियम के अनुसार) एक के गली में हो आने पर, दूसरा उस गली में प्रवेश करता था। उस बनिये के बाद बोधिसत्त्व उस गली में प्रविष्ट हो ‘ (हीरे) मोती लो, (हीरे) मोती लो’ कहते घूमते हुए उसी द्वार पर पहुंचे। उस लड़की ने फिर उसी प्रकार अपनी दादी को कहा। दादी ने पूछा -“अम्मा ! पहला आया व्यापारी थाली को ज़मीन पर पटक कर चला गया, अब क्या देकर ‘कण्ठा’ ले ?” लड़की ने उत्तर दिया-“अम्मा ! वह व्यापारी कटोर-भाषी था, लेकिन यह सौम्य मूति तथा मृदुभाषी है। आशा है कि यह थाली को ले लेगा।” अच्छा ! तो पुकार।”
उसने उसे बुलाया। उसके घर में प्रवेश कर बैठने पर, उन्होंने उसे वह थाली दी। उसने ‘थाली सोने की है' यह जानकर, कहा-“अम्मा ! यह थाली लाख के मूल्य की है। थाली के मूल्य का सामान मेरे पास नहीं ।” “आर्य ! पहले आया व्यापारी, यह आधे मासे के मूल्य की भी नहीं है, कह पृथ्वी पर पटक कर चला गया था। यह अब तेरे ही पुण्य के प्रताप से सोने की थाली हो गई होगी। हम इसे तुझे देते है। (इसके बदले मे) हमें कुछ ही देकर, इसे ले जाइये।” बोधिसत्त्व के हाथ में उस समय पाँच सौ कार्षापण और पांच सौ के मूल्य का सौदा था। वह सब देकर, ‘मुझे यह तराजू, थैली, और आठ कार्षापण दें,” मांग, लेकर चले गये। और शीघ्र ही नदी के किनारे पहुँच, मल्लाह को आठ कार्षापण दे, नाव पर चढ़ चले।
तब लोभी बनिये ने फिर उनके घर जा कर कहा–“लाओं वह थाली में तुम्हें कुछ दे ही दूँ।” लड़की ने उसे गाली देते हुए कहा-“तू हमारी लाख के मूल्य की थाली को आधे मासे के मूल्य की भी नहीं बताता था। लेकिन तेरे स्वामी जैसा एक धर्मात्मा व्यापारी, हमें एक हज़ार दे कर उसे ले गया।” यह सुन ‘मैंने लाख के मूल्य की सोने की थाली गंवा दी, उसने मेरी बड़ी हानि की’ सोच अत्यन्त व्याकुल (शोकग्रस्त) हो उठा। उसकी स्मृति ठिकाने न रही, और वह पागल (संज्ञाहीन) सा हो गया। उसने अपने हाथ के कार्षापण और सौदे को घर के दरवाजे पर बखेर दिया। जो कुछ पहने-ओढ़े था, उसे भी उतार दिया, और वह तराजू की टण्डी की मुगरी बना, बोधिसत्व के पीछे पीछे भागा। नदी के किनारे पहुँच, बोधिसत्त्व को नाव में जाते देख, मल्लाह से कहा-“ओ ! मल्लाह ! मल्लाह ! नाव को लौटाओ’। बोधिसत्व ने नाव को मत लौटाओ” कह मना किया। उस बनिये को बोधिसत्त्व को निकल जाते देख, अन्यन्न शोक हुआ। उस का हृदय गर्म हो गया। और मुंह से खून निकल पड़ा, तथा हृदय (सूखे ) कीचड़ की तरह फट गया। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व के प्रति शत्रुता का भाव मन में रख, उसी क्षण मर गया। बोधिसत्त्व के प्रति देवदत्त का यह पहला डाह हुआ। बोधिसत्त्व भी दान आदि पुण्य करके कर्मानुसार गति को प्राप्त हुए।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
जातक कथाएँ
बोधिसत्त्व
बाहरी कड़ियाँ
Serivāṇija-jātakaa (पालि में कथा, अंग्रेजी अनुवाद)
श्रेणी:बौद्ध ग्रंथ