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तख़ल्लुस
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फ़ारसी, कुर्दी, पश्तो, तुर्की, हिन्दुस्तानी (हिन्दी-उर्दू), कश्मीरी, सिन्धी तथा पंजाबी में तख़ल्लुस शब्द (ar تخلّص से, शब्दार्थ 'मुक्त होना अथवा सुरक्षित होना'; फ़ारसी: تخلّص, अज़ेरी: təxəllüs; उज़्बेक: taxallus; उर्दू: تخلّص, पंजाबी: गुरुमुखी: ਤਖ਼ੱਲੁਸ, शाहमुखी: تخلّص) लेखन नाम का अर्थ रखता है। फ़ारसी, तुर्की, हिन्दुस्तानी (हिन्दी-उर्दू) तथा पंजाबी कवियों द्वारा लेखन नाम व्यापक रूप से अपनाये गये।Influence of Islam on Hindi Literature Alī Saiyada Asad 2000 Idarah-i-Adabiyat-Delli 198 en
तख़ल्लुस प्रायः मक़ता में, अर्थात् ग़ज़ल की अन्तिम द्विपदी (बैत) में सम्मिलित किया जाता है।https://dailytimes.com.pk/164447/history-art-performance-ghazal-hindustani-sangeet/ The history, art and performance of ghazal in Hindustani sangeet 2017-12-21 Daily Times en-US 2020-01-18https://books.google.com/books?id=D-clawwobAwC&dq=Takhallus+ghazal&pg=PA169 The Book of Iran: A History of Persian Literature : Schools, Periods, Styles and Literary Genres Tamīmʹdārī Aḥmad 2002 Alhoda UK 978-964-472-366-7 169 en
इतिहास तथा प्रयोग
शास्त्रीय अरबी साहित्य तथा अलंकारशास्त्र में तख़ल्लुस शब्द (अरबी: ar تخلّص, शब्दार्थ 'स्वयं को मुक्त करना, संक्रमण') मूलतः क़सीदा (स्तवकाव्य) की आरम्भिक प्रस्तावना (नसीब) से उसके मुख्य विषय, सामान्यतः प्रशंसा (मदीह), तक निर्विघ्न विषयगत संक्रमण को सूचित करता है। इस संक्रमण के कुशल निष्पादन को अरबी छन्दशास्त्र में अत्यन्त सम्मानित माना जाता है और उसे हुस्न अत-तख़ल्लुस (उत्तम संक्रमण) कहा जाता है।
जब ग़ज़ल बाद में पूर्णतः स्वतन्त्र काव्य-रूप में विकसित हुई, तब फ़ारसी तथा तत्पश्चात् उर्दू लेखकों ने इस शब्द को अपनाया और पुनःपरिभाषित किया। फ़ारसी परम्परा में तख़ल्लुस का अर्थ कवि द्वारा अपनाया गया लेखन नाम हो गया। यह औपचारिक संरचनात्मक परम्परा बन गई कि कवि इस लेखन नाम को काव्य के मक़ता (समापन द्विपदी) में बुन दे।https://dailytimes.com.pk/164447/history-art-performance-ghazal-hindustani-sangeet/ The history, art and performance of ghazal in Hindustani sangeet 2017-12-21 Daily Times en-US 2020-01-18
तख़ल्लुसात (तख़ल्लुस का भग्न बहुवचन) के उदाहरण
(ध्यातव्य है कि निम्नलिखित अनेक कवियों ने अनेक भाषाओं में लिखा, और केवल उसी भाषा में नहीं जिसके अन्तर्गत उन्हें वर्गीकृत किया गया है।)
कुछ प्रसिद्ध अरबी कवियों द्वारा प्रयुक्त तख़ल्लुसात तथा अलक़ाब (लक़ब) के उदाहरण
अल-ख़न्सा
अल-मुतनब्बी
अबू नुवास
ज़िर्याब
अल-ग़ज़ल
अबू तम्माम
कुछ प्रसिद्ध अज़ेरी तथा फ़ारसी कवियों द्वारा प्रयुक्त तख़ल्लुस के उदाहरण
सुमन - नीशापुर के अत्तार
हाफ़िज़
जामी
ख़ामूशन - रूमी
सादी
अशफ़ाक़ अत्तारी - फ़ानी बदायूँनी
महासती
निज़ामी
नसीमी
फ़ुज़ूली
फ़िरदौसी
ख़ाक़ानी
ख़ताई- सफ़वी ईरान के शाह इस्माईल प्रथम
कुछ प्रसिद्ध हिन्दुस्तानी (हिन्दी-उर्दू) तथा पंजाबी कवियों, और भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य इस्लाम-सम्बद्ध कवियों द्वारा प्रयुक्त तख़ल्लुसात के उदाहरण
बुल्ले शाह
फ़ैज़ – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
फ़ानी — फ़ानी बदायूँनी, शौकत अली ख़ान
ग़ालिब – मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान
हाली – अल्ताफ़ हुसैन हाली
जिगर - जिगर मुरादाबादी, सिकन्दर अली मुरादाबादी
कबीर
काकी - ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी
मख़्फ़ी - ज़ेब-उन-निसा
मीर - मीर मुहम्मद तक़ी मीर
रसख़ान
ज़फ़र - बहादुर शाह ज़फ़र, बहादुर शाह द्वितीय
हिन्दुस्तानी (हिन्दी-उर्दू), कश्मीरी, सिन्धी तथा पंजाबी कवियों में "हसरत" विशेष रूप से प्रचलित तख़ल्लुस है, जिस शब्द के अर्थ "इच्छा" अथवा "अभिलाषा" भी होते हैं, तथा जो अरबी हसरा (ar حسرة) से व्युत्पन्न है। यह फ़ारसी, हिन्दुस्तानी (हिन्दी-उर्दू), कश्मीरी, सिन्धी तथा पञ्जाबी में इस्लाम-सम्बद्ध आदरसूचक हद़रा (अरबी: ar حضرة) का वैकल्पिक उच्चारण भी है।
सन्दर्भ
श्रेणी:शायरी
श्रेणी:कविता
श्रेणी:कवि
श्रेणी:नाम