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उदाकिशुनगंज
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सितंबर 2026
सितंबर 2026
260 वर्ग मील में फैले इस उदाकिशुनगंज को 21 मई 1983 को अनुमंडल का दर्जा प्राप्त करने वाला उदाकिशुनगंज अनुमंडल का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गाथा गौरवशाली रहा है।छह प्रखंडों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस अनुमंडल अंतर्गत कुल 77 ग्राम पंचायतें है। उदय सिंह और किशुन सिंह दो भाई थे. इन्हीं दोनों के नाम पर उदाकिशुनगंज का नाम रखा गया था. 16 वीं सदी के छाया परगना के अधीन यह क्षेत्र घनघोर जंगल, कोसी नदी तथा उसकी छाड़न नदियों से आच्छादित हुआ करती थी. किवदंतियों के अनुसार बताया जाता है कि 16वीं सदी में छोटानागपुर से एक परिवार आकर यहां बसे और हरीश नामक एक व्यक्ति ने काफी प्रयास कर विभिन्न जातियों के लोगों को इस क्षेत्र में लाकर बसाया। 1703 ई में उदय सिंह नामक एक चंदेल राजपूत सरदार ने इस क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया और अपने कब्जे में ले लिया। उदय सिंह के उत्तराधिकारी ने शाह शुजा से अपने राजस्व का वैधानिक फरमान प्राप्त कर लिया। कालांतर में राजपूत सरदार के बंशज राजा देव सिंह के पुत्रों में जमींदारी का बंटवारा हुआ। बंटवारे में छोटे पुत्र सरदार हसौल सिंह को मौजा शाह आलमनगर प्राप्त हुआ। शाह आलमनगर के तत्कालीन शासक चंदैल वंशजों द्वारा निर्मित दुर्ग और जलाशय आज भी दर्शनीय है।
चंदैल शासकों के उत्तराधिकारी आज भी यहां मौजूद है। सहरसा गजेटियर के मुताबिक छय तिरहुत परगना से अलग कर शाह आलमनगर को भागलपुर में मिला दिया गया। 19 मई 1798 को भागलपुर के कलक्टर के कार्यालय से प्राप्त पत्र के मुताबिक 5000 एकड़ जमीन यहां के राजा किशुन सिंह से तत्कालीन सरकार ने जागीरदारों के लिए खरीदी थी। कहा जाता है कि राजा उउदाकिशुनगंज क्षेत्र ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि आजादी के दीवानों की भी धरती रही है।
मधेपुरा जिला के ऐतिहासिक सर्वेक्षण के मुताबिक मधेपुरा सहित उदाकिशुनगंज अनुमंडल के तीन दर्जन से अधिक ऐतिहासिक स्थलों को चिन्हित किया गया है। इसमें खुरहान, आसिनपुर अखरी, करामा, पचरासी, मधुकरचक, रजनी, बभनगामा, गमैल आदि ऐतिहासिक स्थल हैं जो उदाकिशुनगंज अनुमंडल के गौरवशाली अतीत को रेखाकित करता है।
वहीं अनुमंडल अंतर्गत सरसंडी ग्राम में बादशाह अकबर द्वारा निर्मित एक विशाल मस्जिद जो मिट्टी में दबी हुई है. अकबर कालीन गंधबरिया राजा बैरीसाल का किला, चंद्रगुप्त द्वितीय काल में स्थापित नयानगर का मां भगवती मंदिर, चंदेल शासकों द्वारा शाह आलमनगर में निर्मित जलाशय और दुर्ग, शाह आलमनगर के खुरहान में स्थित मां डाकिनी का अतिप्राचीन मंदिर, आसिनपुर अखरी में स्थित जो कि बहुत सुुन्दर मस्जिद इस्लामी मस्जिद आसिनपुर अखरी
खरी शाह आलमनगर में राजा का ड्योढ़ी, चौसा में स्थित मुगल बादशाह रंगीला के समकालीन चरवाहाधाम पचरासी, चौसा के चंदा में स्थित अलीजान शाह का मकबरा, ग्वालपाड़ा के नौहर ग्राम में मिले अवशेष आदि अनगिनत साक्ष्य उदाकिशुनगंज अनुमंडल के समृद्ध इतिहास के प्रमाण आज भी मौजूद हैं. कैसे मिला अनुमंडल का दर्जा अंग्रेजी हुकूमत के समय (सन्-1883) यहां मुंसिफ कोर्ट हुआ करता था. 80 वर्ष बाद 1962 में आयी भयंकर बाढ़ के कारण यहां का मुंसिफ कोर्ट सुपौल में स्थानांतरित कर दिया गया. 1970 में शिक्षाविद कुलानंद साह के नेतृत्व में उदाकिशुनगंज को अनुमंडल का दर्जा दिये जाने की मांग उठी. करीब दो दशक बाद उदाकिशुनगंज के तत्कालीन विधायक सिंहेश्वर मेहता, पुर्व मंत्री वीरेंनदर सिंह एवं पुर्व मंत्री विद्याकर कवि एमएलसी वागेशवरी प्रसाद सिंह के सकारात्मक प्रयास के बदौलत ही इसे अनुमंडल का दर्जा प्राप्त हुआ. ज्ञात हो कि 21 मई 1983 ई में तत्कालीन मुख्यमंत्री डा जगन्नाथ मिश्रा के करकमलों द्वारा एचएस उच्च विद्यालय के मैदान में अनुमंडल का उद्घाटन किया गया. उस समय इस अनुमंडल का कार्यालय एचएस उच्च विद्यालय के छात्रावास में ही बनाया गया था. यह करीब 1993 तक चला. इसके बाद से अबतक यह अनुमंडल कार्यालय सरकार द्वारा अधिकृत जमीन पर बने सामुदायिक भवन में ही चल रहा है. हालांकि पास ही स्थायी व भव्य अनुमंडल कार्यालय भवन बन कर तैयार हो चुका है
कामना शक्ति पीठ के रुप में ख्याति प्राप्त उदाकिशुनगंज सार्वजनिक दुर्गा मंदिर न केवल धार्मिक और अध्यात्मिक बल्कि ऐतिहासिक महत्त्व को भी दर्शाता है। यहां सदियों से पारंपरिक तरीके से दुर्गा पूजा धूमधाम से मनाया जाता है। पूजा के दौरान कई देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती है। मंदिर कमिटी और प्रशासन के सहयोग से विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है। अध्यात्म की स्वर्णिम छटा बिखेर रही सार्वजनिक दुर्गा मंदिर के बारे में कहा जाता है कि करीब 250 वर्षों से भी अधिक समय से यहां मां दुर्गा की पूजा की जा रही है। बड़े-बुजूर्गो का कहना है कि करीब 250 वर्ष पूर्व 18 वीं शताब्दी में चंदेल राजपूत सरदार उदय सिंह और किशुन सिंह के प्रयास से इस स्थान पर मां दुर्गा की पूजा शुरू की गयी थी। तब से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहा है। उन्होंने कहा कि कोशी की धारा बदलने के बाद आनंदपुरा गांव के हजारमनी मिश्र ने दुर्गा मंदिर की स्थापना के लिए जमीन दान दी थी। उन्हीं के प्रयास से श्रद्धालुओं के लिए एक कुएं का निर्माण कराया गया था, जो आज भी मौजूद है। उदाकिशुनगंज निवासी प्रसादी मिश्र मंदिर के पुजारी के रुप में 1768 ई में पहली बार कलश स्थापित किया था। उन्हीं के पांचवीं पीढ़ी के वंशज परमेश्वर मिश्र उर्फ पारो मिश्र वर्तमान में दुर्गा मंदिर के पुजारी हैं ।
उदाकिशुनगंज अनुमंडल की कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ*
अनुमंडल अंतर्गत एक मात्र बिहारीगंज रेलवे स्टेशन 1931 में बना।
गृह आरक्षी विभाग के आदेश से 16 अक्टूबर 1914 को उदाकिशुनगंज में थाना बना।
1अप्रैल 1932 को उदाकिशुनगंज में प्रखंड कार्यालय शुरू हुआ।
1987 में यहाँ करीब तीन करोड़ की लागत से उपकारा का निर्माण करवाया गया।
29जनवरी 1995 को यहां सामुदायिक भवन में अनुमंडल कार्यालय का शुभारंभ कोसी के प्रमंडलीय आयुक्त के द्वारा किया गया।
इलाके की चिरप्रतीक्षित मांग अनुमंडल कोर्ट का शुभारम्भ यहाँ 7 सितम्बर 2014 को चीफ जस्टिस रेखा एम दोशित के करकमलों द्वारा किया गया।
30 जून 2017 को यहां स्थाई रूप से अनुमंडल कार्यालय भवन का उद्घाटन हुआ।
चौसा प्रखंड अंतर्गत लौआलगान के पचरासी में अवस्थित लोकदेवता बाबा विशुराउत की समाधि स्थल पर लगने वाले विश्व प्रसिद्ध चरवाहा धाम मेला को बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के द्वारा ज्ञापांक 898(8) दिनांक 01/11/2017 जारी कर बिहार राज्य मेला प्राधिकार अधिनियम 2008 के तहत राजकीय मेला का दर्जा दिया गया।
श्रेणी:इतिहास