411 REFERENCE · Wikipedia
चुनार का किला
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
गंगा नदी के दूसरे किनारे से चुनार दुर्ग का दृष्य|right|thumb|300px
मिर्जापुर के चुनार में स्थित चुनार किला कैमूर पर्वतमाला की उत्तरी दिशा में स्थित है। यह गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर बसा है। यह दुर्ग गंगा नदी के ठीक किनारे पर स्थित है। यह किला एक समय हिन्दू शक्ति का केंद्र था। हिंदू काल के भवनों के अवशेष अभी तक इस किले में हैं, जिनमें महत्वपूर्ण चित्र अंकित हैं। इस किले में आदि-विक्रमादित्य का बनवाया हुआ भतृहरि मंदिर है जिसमें उनकी समाधि है। किले में मुगलों के मकबरे भी हैं। अंग्रेजों के भारत आने से पूर्व यह किला बनारस रियासत के नियंत्रण में था। काशी नरेश महाराजा बलवंत सिंह ने सन् 1740 ईस्वी में इस किले को अवध के नवाब से जीतकर काशी राज्य के अधीन कर लिया था। इस किले के अंतिम भारतीय शासक काशी नरेश महाराजा चेत सिंह थे।
परिचय
18 अप्रैल सन 1924 को मिर्जापुर के तत्कालीन कलक्टर द्वारा दुर्ग पर लगाये एक शिलापत्र पर उत्कीर्ण विवरण के अनुसार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के बाद इस किले पर 1141 से 1191 ई. तक पृथ्वीराज चौहान, 1198 में शहाबुद्दीन गौरी, 1333 से स्वामीराज, 1445 से जौनपुर के मुहम्मदशाह शर्की, 1512 से शेर शाह सूरी, 1529 से बाबर, 1530 से शेरशाहसूरी और 1536 से हुमायूं आदि शासकों का अधिपत्य रहा है। शेरशाह सूरी से हुए युद्ध में हुमायूं ने इसी किले में शरण ली थी।
इस प्रसिद्ध किले का पुनरनिर्माण शेरशाह सूरी द्वारा करवाया गया था। इस किले के चारों ओर ऊंची-ऊंची दीवारें मौजूद है। यहां से सूर्यास्त का दृश्य देखना बहुत मनोहारी प्रतीत होता है। कहा जाता है कि एक बार इस किले पर अकबर ने कब्जा कर लिया था। उस समय यह किला अवध के नवाबों के अधीन था। किले में सोनवा मण्डप, सूर्य धूपघड़ी और एक विशाल कुंआ मौजूद है।
right|thumb|300px|स्वर्णमण्डप या 'सोनवा मण्डप'
मुगल बादशाह हुमायूँ और अफगान सरदार शेरशाह के बीच हुए युद्धों में इस किले का विशेष महत्व रहा है। १५३९ ई. में शेरशाह ने इसपर अधिकार कर लिया, फिर अकबर के शासनकाल में १५७५ ई. में इसपर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। १८वीं शताब्दी में यह किला अवध के नवाब के अधिकार में रहा, लेकिन सन 1740 ईस्वी में काशी नरेश महाराजा बलवंत सिंह ने इस किले को जीतकर अपने बनारस रियासत के अधीन कर लिया था। बाद में सन् 1767 ईस्वी में एक अंग्रेज अधिकारी हेक्टर मुनरो ने इसे काशी नरेश महाराजा बलवंत सिंह से छीनकर अपने नियंत्रण में कर लिया था। पुनः काशी नरेश महाराजा चेत सिंह ने इस किले को अपने नियंत्रण में लें लिया था। वारेन हेस्टिंग्स ने सन् 1781 ईस्वी में इस किले को काशी नरेश महाराजा चेत सिंह से छीनकर अपने नियंत्रण में ले लिया एवं यह किला हमेशा के लिए अंग्रेजों के अधीन चला गया। इसके बाद सितंबर, १७८१ में इसके संबध में एक संधिपत्र पर अवध के नवाब तथा हेंस्टिंग्ज ने हस्ताक्षर किए। कंपनी के शासनकाल में सीमा पर स्थित होने के कारण काफी समय तक इसका सैनिक महत्व बना रहा। वारेन हेस्टिंग्स का यह अत्यंत प्रिय निवासस्थान था। कंपनी ने चुनार का उपयोग अपन सेनाओं के वृद्ध तथा रोगी सैनिकों को बसाने के लिये किया था। यूरोपीय लोगों का निवासस्थान होने के चिह्न अभी तक कब्रगाह और गिरजाघर के रूप में वर्तमान हैं।
बाहरी कड़ियाँ
चुनार का गौरवशाली इतिहास
बूढ़ा हो गया है चुनारगढ़ में चन्द्रकांता का किला!
बड़ा भाग्यशाली होता है यहां जन्म लेने वाला
श्रेणी:मिर्जापुर जिले के पर्यटन स्थल