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बरिशाल षडयंत्र मामला
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सन 1913 के बरिशाल षड्यंत्र मामले में बंगाल के ४४ क्रांतिकारियों पर मुकदमा चला था। उन पर ब्रिटिश अधिकारियों ने ब्रिटिश राज के विरुद्ध विद्रोह का षडयन्त्र करने का आरोप लगाया था। जिन लोगों पर मुकद्दमा चला था उनमें त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती एवं प्रतुल चन्द्र गांगुली के नाम प्रमुख थे।
विवरण
बरिशाल, बंगाल के दक्षिण-पूर्वी कोने में स्थित एक जिला था। वहाँ की अंग्रेज पुलिस ने बताया कि उन्होंने क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति से संबंधित कुछ दस्तावेज़ ज़ब्त किए हैं। इस संगठन की पूर्वी बंगाल शाखा का नेतृत्व त्रिलोक्यनाथ चक्रवर्ती और प्रतुल चन्द्र गांगुली कर रहे थे। ज़ब्त किए गए दस्तावेज़ों में देशी सैनिकों को उकसाने और भर्ती करने के प्रस्ताव शामिल थे।
जून 1913 में कलकत्ता में 44 आरोपियों का मुकदमा शुरू हुआ। अभियोजन पक्ष ने यह सबूत पेश करने की योजना बनाई थी कि किस प्रकार षड्यंत्रकारियों ने राजद्रोह फैलाने के लिए बंगाल को अलग-अलग जिलों में विभाजित किया था। अनुशीलन समिति ने विशेष रूप से सभाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से छात्रों और अविवाहित युवाओं को अपने साथ लाने का प्रयास किया था। अकेले बारीशाल जिले में ही इसके सदस्यों की संख्या सैकड़ों में थी।
जनवरी 1914 में निर्णय सुनाया गया। मूल रूप से आरोपित 44 आरोपियों में से 32 को बरी कर दिया गया या क्षमादान दे दिया गया, या उनके खिलाफ मामला वापस ले लिया गया। शेष 12 आरोपितों को ब्रिटिश राज के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का दोषी पाया गया। इन 12 में से पांच, जिनमें प्रतुल चंद्र भी शामिल थे, को १२ से १९ वर्ष के लिए अंडमान की सेल्युलर जेल निर्वासित कर दिया गया। शेष सात को दो से सात वर्ष के लिए निर्वासित किया गया।
यह मामला यहीं नहीं थमा। कोलकाता के दैनिक समाचार पत्र 'अमृता बाजार पत्रिका' ने इस विषय पर कई लेख प्रकाशित किए। इसके संपादक मोतीलाल घोष और समाचार पत्र के प्रकाशक के खिलाफ अदालत की अवमानना के लिए 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया गया। हालांकि, बाद में उच्च न्यायालय की एक विशेष पीठ ने इस याचिका को खारिज कर दिया।
सन्दर्भ
श्रेणी:बंगाल का इतिहास