411 REFERENCE · Wikipedia
मुंडेश्वरी मंदिर
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
मार्च 2021
मुंडेश्वरी मंदिर, बिहार के भोजपुरी क्षेत्र के कैमूर जिले के रामगढ़ गाँव के पंवरा पहाड़ी पर स्थित है जिसकी ऊँचाई लगभग 600 फीट है वर्ष 1812 ई0 से लेकर 1904 ई0 के बीच ब्रिटिश यात्री आर.एन.मार्टिन, फ्रांसिस बुकानन और ब्लाक ने इस मंदिर का भ्रमण किया था Ihttps://books.google.co.in/books?id=5iBAEQAAQBAJ&pg=PA247&dq=Mundeshwari+bhojpuri&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&sa=X&ved=2ahUKEwiqwcn-9o2XAxUgwzgGHR2xONkQ6AF6BAgHEAI#v=onepage&q=Mundeshwari%20bhojpuri&f=false Paradigma Paravidya-aparavidya: Eksplorasi Paradigma Holistik dalam Sistem Pengetahuan Hindu Donder I. Ketut Behura Ajitkumar Suwantana I. Gede Subawa I. Made Pasek Witana I. Nyoman 2025-01-16 PT. Dharma Pustaka Utama 978-623-10-6433-2 id पुरातत्वविदों के अनुसार यहाँ से प्राप्त शिलालेख 389 ई0 के बीच का है जो इसकी पुरानता को दर्शाता है I मुण्डेश्वरी भवानी के मंदिर के नक्काशी और मूर्तियों उतरगुप्तकालीन है I यह पत्थर से बना हुआ अष्टकोणीय मंदिर है I इस मंदिर के पूर्वी खंड में देवी मुण्डेश्वरी की पत्थर से भव्य व प्राचीन मूर्ति मुख्य आकर्षण का केंद्र है I माँ वाराही रूप में विराजमान है, जिनका वाहन महिष है I मंदिर में प्रवेश के चार द्वार हैं जिसमे एक को बंद कर दिया गया है और एक अर्ध्द्वर है I इस मंदिर के मध्य भाग में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है I जिस पत्थर से यह पंचमुखी शिवलिंग निर्मित किया गया है उसमे सूर्य की स्थिति के साथ साथ पत्थर का रंग भी बदलता रहता है I मुख्य मंदिर के पश्चिम में पूर्वाभिमुख विशाल नंदी की मूर्ति है, जो आज भी अक्षुण्ण है I यहाँ पशु बलि में बकरा तो चढ़ाया जाता है परंतु उसका वध नहीं किया जाता है बलि की यह सात्विक परंपरा पुरे भारतवर्ष में अन्यत्र कहीं नहीं है ।मार्च 2013
बेलोन मंदिर
परिचय
बिहार के भभुआ जिला केद्र से चौदह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है कैमूर की पहाड़ी। साढ़े छह सौ फीट की ऊंचाई वाली इस पहाड़ी पर माता मुंडेश्वरी एवं महामण्डलेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर को भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है, पर कितना प्राचीन, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। हां! इतना प्रमाण अवश्य मिल रहा है कि इस मंदिर में तेल एवं अनाज का प्रबंध एक स्थानीय राजा के द्वारा संवत्सर के तीसवें वर्ष के कार्तिक (मास) में २२वां दिन किया गया था। इसका उल्लेख एक शिलालेख में उत्कीर्ण राजाज्ञा में किया गया है। अर्थात् शिलालेख पर उत्कीर्ण राजाज्ञा के पूर्व भी यह मंदिर था यह पता चलता है। वर्तमान में पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर भग्नावशेष के रूप में है। ऐसा लगता है कि किसी ने इस मंदिर को तोड़ा है। मूर्तियों के अंग ऐसे टूटे हैं मानो किसी तेज हथियार से उन पर चोट की गयी हो। पंचमुखी महादेव का मंदिर तो ध्वस्त स्थिति में है। इसी के एक भाग में माता की प्रतिमा को दक्षिणमुखी स्वरूप में खड़ा कर पूजा-अर्चना की जाती है। माता की साढ़े तीन फीट की काले पत्थर की प्रतिमा है, जो भैंस पर सवार है।
इस मंदिर का उल्लेख कनिंघ्म ने भी अपनी पुस्तक में किया है। उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि कैमूर में मं◌ुडेश्वरी पहाड़ी है, जहां मंदिर ध्वस्त रूप में विद्यमान है। इस मंदिर का पता तब चला जब कुछ गड़ेरिये पहाड़ी के ऊपर गए और मंदिर के स्वरूप को देखा। यह कुल २०-२५ वर्ष पूर्व की बात है। तब इसकी इतनी ख्याति नहीं थी जितनी अब है। प्रारम्भ में पहाड़ी के नीचे निवास करने वाले लोग ही इस मंदिर में दीया जलाते और पूजा-अर्चना करते थे। वर्तमान में धार्मिक न्यास बोर्ड, बिहार द्वारा इस मंदिर को व्यवस्थित किया गया और पूजा-अर्चना की व्यवस्था की गई। माघ पंचमी से पूर्णिमा तक इस पहाड़ी पर एक मेला लगता है जिसमें दूर-दूर से भक्त आते हैं।
कहते हैं कि चंड-मुंड के नाश के लिए जब देवी उद्यत हुई थीं तो चंड के विनाश के बाद मुंड युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी में छिप गया था और यहीं पर माता ने उसका वध किया था। अतएव यह मुंडेश्वरी माता के नाम से स्थानीय लोगों में जानी जाती हैं। एक मजेदार बात, आश्चर्य एवं श्रद्धा चाहे जो कहिए, यहां भक्तों की कामनाओं के पूरा होने के बाद बकरे की बलि चढ़ाई जाती है। पर, माता रक्त की बलि नहीं लेतीं, बल्कि बलि चढ़ने के समय भक्तों में माता के प्रति आश्चर्यजनक आस्था पनपती है। जब बकरे को माता की मूर्ति के सामने लाया जाता है तो पुजारी अक्षत (चावल के दाने) को मूर्ति को स्पर्श कराकर बकरे पर फेंकते हैं। बकरा तत्क्षण अचेत, मृतप्राय हो जाता है। थोड़ी देर के बाद अक्षत फेंकने की प्रक्रिया फिर होती है तो बकरा उठ खड़ा होता है। बलि की यह क्रिया माता के प्रति आस्था को बढ़ाती है।
पहाड़ी पर बिखरे हुए पत्थर एवं स्तम्भ को देखते हैं तो उन पर श्रीयंत्र सरीखे कई सिद्ध यंत्र एवं मंत्र उत्कीर्ण हैं। प्रत्येक कोने पर शिवलिंग है। ऐसा लगता है कि पहाड़ी के पूर्वी-उत्तरी क्षेत्र में माता मुण्डेश्वरी का मंदिर स्थापित रहा होगा और उसके चारों तरफ विभिन्न देवी-देवताओं के मूर्तियां स्थापित थीं। खण्डित मूर्तियां पहाड़ी के रास्ते में रखीं हुई हैं या फिर पटना संग्रहालय में हैं। जैसा कि शिलालेख मं◌े उल्लेख है कि यहां का स्थान एक गुरुकुल आश्रम के रूप में व्यवस्थित था। पहाड़ी पर एक गुफा भी है जिसे सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिया गया है।
इस मंदिर के रास्ते में सिक्के भी मिले हैं और तमिल, सिंहली भाषा में पहाड़ी के पत्थरों पर कुछ अक्षर भी खुदे हुए हैं। कहते हैं कि यहां पर श्रीलंका से भी भक्त आया करते थे। बहरहाल, मंदिर के गर्भ में अभी कई रहस्य छिपे हुए हैं, बहुत कुछ पता नहीं है, बस माता की अर्चना होती है। भक्त माता एवं महादेव की आस्था में लीन रहते हैं। मंदिर की यात्रा के क्रम में ऐसा प्रतीत हुआ कि मंदिर अपने आप में कई अनुभवी आध्यात्मिक स्वरूपों को छिपाये हुए है, बस आवरण नहीं उठ रहा है। लेखक को कई तथ्यात्मक अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ।
मंदिर की प्राचीनता एवं माता के प्रति बढ़ती आस्था को देख राज्य सरकार द्वारा भक्तों की सुविधा लिए यहां पर विश्रामालय, रज्जुमार्ग आदि का निर्माण कराया जा रहा है। पहाड़ पर स्थित मंदिर में जाने के लिए एक सड़क का निर्माण कराया गया है, जिस पर छोटे वाहन सीधे मंदिर द्वार तक जा सकते हैं। मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियों का भी उपयोग किया जा सकता है।
बिहार राज्य पर्यटन निगम की बसें प्रतिदिन पटना से पहाड़ी के नीचे बसा गांव रामगढ़ तक जाती हैं। यहां रेल से पहुंचने के लिए पटना या गया से मोहनियां स्टेशन उतरना पड़ता है। मोहनियां से मंदिर तक पहुंचने के लिए टेम्पो, जीप, मिनी बस की सहायता ली जा सकती है।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
भारत के प्राचीनतम मंदिर ‘मुंडेश्वरी’ को देखने एक बार जरूर जाएं!
श्रेणी:भारत में मंदिर
श्रेणी:बिहार में पर्यटन आकर्षण