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411 समाचार
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पिट का भारत अधिनियम

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सितंबर 2020 सन् 1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने और ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय क्षेत्रों के प्रशासन को अधिक सक्षम और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने के लिये अगले एक दशक के दौरान जाँच के कई दौर चले और ब्रिटिश संसद द्वारा अनेक कदम उठाये गए। इनमें सबसे महत्पूर्ण कदम 1784 ई. में पिट के भारत अधिनियम (पिट्स इंडिया एक्ट) को पारित किया जाना था, जिसका नाम ब्रिटेन के तत्कालीन युवा प्रधानमंत्री विलियम पिट के नाम पर रखा गया था। इस अधिनियम द्वारा ब्रिटेन में (बोर्ड ऑफ़ कण्ट्रोल) की स्थापना की गयी थी जिसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार भारत में कंपनी के नागरिक, सैन्य और राजस्व सम्बन्धी कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण रखती थी। अभी भी भारत के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार बना रहा और उसे कंपनी के अधिकारियों को नियुक्त करने या हटाने का अधिकार प्राप्त था। अतः ब्रिटिश भारत पर ब्रिटिश सरकार और कम्पनी दोनों के शासन (अर्थात द्वैध शासन) की स्थापना की गयी। गवर्नर जनरल को महत्वपूर्ण मुद्दों पर परिषद् के निर्णय को न मानने की शक्ति प्रदान की गयी। मद्रास व बम्बई प्रेसीडेन्सी को उसके अधीन कर दिया गया और उसे भारत में ब्रिटिश सेना, कंपनी और ब्रिटिश सरकार दोनों की सेना, का सेनापति बना दिया गया। भूमिका 1774 से 1783 के बीच विभिन्न घठनाओं ने रेगुलेटिंग एक्ट को स्पष्ट कर दिया था। मद्रास व बंबई की प्रसीडेन्सियों पर बंगाल सरकार का पर्याय नियंत्रण ने होने के कारण कंपनी को अनावश्यक युद्धों में उलझना पड़ा थ। सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित दोषों को 1781 के एक अधिनियम द्वारा दूर कर दिया गया किन्तु प्रशासन संबंधी दोष अभी भी विद्यमान थे। 1781-82 में इंग्लैण्ड की संसद ने वॉरेन हेस्टिंग्ज को वापस बुलाना चाहा, किन्तु कंपनी के अंशधारकों की सभा ने इसका सफलतापूर्वक विरोध किया। इस प्रकार कंपनी पर संसद का अपर्याप्त नियंत्रण भी स्पष्ट हो गया। अतः रेग्युलेटिंग एक्ट में संशोधन करने की आवश्यकता महसूस की गई। इस संबंध में डूंडास का भारत बिल तथा फाक्स का ईस्ट इंडिया बिल अस्वीकृत हो चुके थे। अतः प्रधानमंत्री यंग पिट्ट ने एक विधेयक प्रस्तुत किया, जो 1784 में पारित कर दिया गया। यह अधिनियम 'पिट का भारत अधिनियम 'के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अधिनियम की व्यवस्थाएँ कंपनी शासन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए इंग्लैण्ड में छः कमिश्नरों का एक बोर्ड गठित किया गया, जिसे बोर्ड ऑफ कंट्रोल कहा गया। इस बोर्ड में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट तथा वित्त मंत्री के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य रखे गये, जिनकी नियुक्ति ब्रिटिश ताज द्वारा होती थी। सदस्यों के वेतन आदि का खर्चा भारत के राजस्व से वसूल करने का निर्णय लिया गया। संचालकों द्वारा भेजे जाने वाले प्रस्तावित आदेश तथा अन्य पत्र भारत भेजने से पूर्व बोर्ड ऑफ कंट्रोल द्वारा अनुमोदित होने चाहिए। बोर्ड किसी भी आदेश या पत्र के प्रारूप में संशोधन कर सकता था अथवा उस प्रारूप के स्थान पर नया प्रारूप तैयार कर सकता था। संचालकों द्वारा प्रस्तावित आदेश या पत्र बोर्ड द्वारा अस्वीकार भी किये जा सकते थे। बोर्ड को संचालकों की अनुमति के बिना भी आदेश या पत्र भेजने का अधिकार था। संचालकों में से तीन सदस्यों की गुप्त समिति गठित की गई। जिसे बोर्ड ऑफ द्वारा गुप्त मामले प्रेषित किये जाते थे, जो अन्य संचालकों को नहीं बताये जाते थे। भारत के गवर्नर-जनरल की कौंसिल के समान ही बंबई व मद्रास प्रेसीडेन्सियों के लिए भी तीन सदस्यों की कौंसिल बनाई गई। मद्रास तथा बंबई की सरकारों को पूर्ण रूप से बंगाल सरकार के अधीन कर दिया गया। यदि उन्हें कोई आदेश सीधे संचालकों से प्राप्त हो, जो बंगाल सरकार के आदेशों के विपरीत हों, तब भी वे आदेश पहले बंगाल सरकार को भेजने होंगे तथा फिर बंगाल सरकार के आदेशानुसार ही कार्य करना होगा। गवर्नर-जनरल तथा गवर्नरों की नियुक्ति संचालक करते थे, किन्तु उन्हें वापस बुलाने का अधिकार ब्रिटिश ताज को सौंपा गया। गवर्नर-जनरल की नियुक्ति के लिए संचालकों को ताज की पूर्व स्वीकृति लेनी आवश्यक थी। प्रथम बार कंपनी के भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजी राज्य के प्रदेश कहा गया। गवर्नर-जनरल तथा उसकी कौंसिल बोर्ड ऑफ कंट्रोल की बिना अनुमति के अथवा कम से कम गुप्त समिति की पूर्वानुमति के भारत में किसी शक्ति के विरुद्ध युद्ध की घोषणा नहीं कर सकेगी। इस एक्ट में यह घोषणा की गई थी कि, भारत में राज्य विस्तार और विजय की योजनाओं को चलाना, ब्रिटिश राष्ट्र की नीति,मान और इच्छा के विरुद्ध है। बम्बई व मद्रास प्रेसीडेन्सियाँ पूर्णतया गवर्नर-जनरल तथा उसकी कौंसिल के अधीन होगी। बंगाल तथा इंग्लैण्ड के अधिकारियों की आज्ञाओं का अल्लंघन करने पर प्रेसीडेन्सियों के गवर्नर को निलंबित किया जा सकता था। अधिनियम का महत्त्व यद्यपि इस अधिनियम ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के मूलभूत संविधान में कोई परिवर्तन नहीं किया, फिर भी इस ऐक्ट का अत्यधिक महत्त्व है, क्योंकि इसके द्वारा पहली बार कंपनी के भारतीय राज्यों को अंग्रेजी राज्य का अंग माना गया और उन पर नियंत्रण रखने के लिए बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना की गई। गुप्त समिति का गठन करके कंपनी के कार्यों में कार्यकुशलता उत्पन्न की गई। इस एक्ट के द्वारा गवर्नर-जनरल का बंबई व मद्रास सरकारों पर नियंत्रण निश्चित एवं वास्तविक बन गया तथा कंपनी के समस्त सैनिक व असैनिक मामलों पर ब्रिटिश संसद का नियंत्रण स्थापित किया गया । इस प्रकार रेग्युलेटिंग एक्ट द्वारा ब्रिटिश संसद का जो अनिश्चित नियंत्रण स्थापित हो गया था, उसे अब वास्तविक बना दिया गया। इस एक्ट द्वारा कंपनी की विदेश नीति को भी एक नई दिशा दी गयी। अब कंपनी के कार्यों को दो भागों में बाँट दिया गया। राजनीतिक व शासन-संबंधी कार्यों पर नियंत्रण के लिए बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना की गई तथा व्यापारिक कार्यों पर नियंत्रण संचालकों पर छोड़ दिया गया। बोर्ड ऑफ कंट्रोल के छः सदस्यों में से एक सेक्रेटरी ऑफ स्टेट तथा दूसरा वित्त मंत्री होता था। अतः वोर्ड ऑफ कंट्रोल का वास्तविक कार्य सरकार के इन दो सदस्यों द्वारा ही किया जाता था,अन्य चार सदस्य बोर्ड के कार्यों में बहुत ही कम रूचि लेते थे। बोर्ड ऑफ कंट्रोल संचालकों द्वारा नियुक्त किसी भी कर्मचारी को वापस बुला सकता था। इसका परिणाम यह निकला कि संचालक अब ऐसे किसी व्यक्ति को नियुक्त नहीं करते थे, जिसे बोर्ड ऑफ कंट्रोल नहीं चाहता था। अतः स्वाभाविक ही था कि भारत के गवर्नर-जनरल संचालकों के आदेशों की अपेक्षा बोर्ड ऑफ कंट्रोल के आदेशों को अधिक महत्त्व देते थे। इस प्रकार कंपनी की नीतियों का संचालन पूरी तरह से ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया। अल्बर्ट ने ठीक ही लिखा है कि पिट्ट ने कंपनी के संविधान में भारी परिवर्तन किये बिना ही भारत की ईस्ट इंडिया कंपनी पर सरकार का नियंत्रण स्थापित कर दिया। इन्हें भी देखें यूनाइटेड किंगडम की संसद रेग्युलेटिंग एक्ट सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ पिट्ट का इंडिया ऐक्ट पिट्स इंडिया एक्ट 1784 पिट्स इंडिया एक्ट 1784 https://web.archive.org/web/20210512190818/https://uppscexams.com/%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%9f-1784-in-hindi/ 12 मई 2021 श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:यूनाइटेड किंगडम की संसद द्वारा पारित अधिनियम