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मदिरा के हानिकारक प्रभाव
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मदिरा मानव के लिये वरदान और अभिशाप दोनों हैं। इसके अल्पमात्रिक व्यवहार से प्राय: मानसिक और शारीरिक आह्लाद होता है, जिसमें मनुष्य प्रसन्न, संतुष्ट और शांत रहता है। यदि मदिरा की मात्रा अधिक हो जाए, तो मनुष्य के मानसिक संतुलन का ह्रास होता है, सिर गरम, चेहरा लाल और कपोलास्थि प्रदेश की धमनियों का स्पंदन स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यदि मदिरा की मात्रा और अधिक बढ़े, तो ऐल्कोहॉल विषाक्तता के लक्षण प्रकट होते हैं तथा मानसिक संतुलन पूर्णतया नष्ट हो जाता है। मद्यसेवी के पैर लड़खड़ाने लगते हैं, बातचीत अस्पष्ट, असंबद्ध तथा अनर्गल हो जाती है। उसे उचित या अनुचित का ज्ञान नहीं रहता और यही स्थिति आगे चलकर बेहोशी का रूप धारण कर लेती है। मचली और वमन भी हो सकता है तथा चेहरा पीला पड़ जाता है। पेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, जिससे अनजाने में मल-मूत्र का त्याग हो सकता है। वस्तुत: इससे शरीर की प्राय: समस्त प्रतिवर्ती क्रियाएँ (reflex actions) बंद हो जाती हैं, नाड़ी मंद पड़ जाती है, शरीर का ताप गिर जाता है, साँस में घरघराहट होने लगती है तथा श्वसनकेंद्र का कार्य बंद हो जाने से मृत्यु तक हो सकती है।
परिणाह तंत्रिका (peripheral nerves) पर मदिरा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, पर दीर्घकालीन मदात्यय (alcoholism) की दशा में आँतों द्वारा विटामिन बी का पूरा अवशोषण न हो सकने का कारण परिणाह शोथ और हृत्पेशी विस्तारण (myocardial dilatation) के लक्षण मिलने लगते हैं। कुछ व्यक्तियों में प्रमस्तिष्क-मेरु-द्रव (cerebro-spinal fluid) का स्राव दबाव को बढाता है, जिससे प्रमस्तिष्क शोथ की अवस्था उत्पन्न हो सकती है।
मदिरासेवन से यक्ष्मा और न्यूमोनिया सदृश रोगों से और शल्य क्रियाओं के परिणाम से बचने की क्षमता घट जाती है। कुछ रोग भी उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं :
(1) जीर्ण आमाशय शोथ (gastritis) में ऐल्कोहॉल से आमाशय का शोथ होता है, जिससे वह स्थायी रूप में क्षतिग्रस्त हो जाता है, पाचनशक्ति का ह्रास हो जाता है और व्यक्ति दिन प्रति दिन दुबला पतला होता जाता है तथा
(2) यकृत का सूत्रण रोग (cirrhosis of the liver)। ऐसे रोग उत्पन्न करने में विभिन्न व्यक्तियों को ऐल्कोहॉल की विभिन्न मात्रा प्रभावित करती है। कुछ व्यक्ति अल्प मात्रा में ही शीघ्र आक्रांत होते हैं और कुछ लोगों के आक्रांत होने में वर्षों लग जाते हैं। मदिरा से यकृत का जीर्ण प्रदाह होता है, जिससे रेशेदार ऊतक बहुत बढ़ जाता है।
रेशेदार ऊतक के संकोचन (contraction) से यकृत की कोशिकाएँ दबाव पड़ने से नष्ट हो जाती हैं, जिससे शिराओं (veins) में रुधिर का बहाव अवरुद्ध हो जाता है। इससे यकृत का आकार साधारणतया छोटा हो जाता है। इस संकोचन का परिणाम यह होता है कि विस्तारित और संपीडित शिराओं से द्रव का स्पंदन (effusion) पर्युदर्या गुहा (peritoneal cavity) में होता है, जिससे एक प्रकार का जलोदर रोग हो जाता है। मद्यसेवी धीरे धीरे अधिक रोगी होने लगता है और जलोदर होने के कुछ मास बाद उसकी मृत्यु हो जाती है।
मदिरा का घातक प्रभाव
अत्यधिक मात्रा में मदिरा सेवन से तीव्र विषाक्तता के लक्षण प्रकट होते हैं। रुधिर में ज्यों ज्यों इसकी मात्रा बढ़ती है, बेहोशी की स्थिति उत्पन्न होती है। ओंठ नीले (cyanosis) तथा आँखों का तारा (pupil) विस्तारित हो जाते हैं और निष्क्रिय त्वचा पर जुड़पित्ती (Urticaria) इत्यादि प्रकट होती हैं। साँस में ऐल्कोहाल की गंध आती है, पैर में लड़खड़ाहट, फिर प्रलाप एवँ मूर्छा उत्पन्न होती है। साथ ही वमन भी होता है। मूर्छा 12 घंटे से अधिक रहती है। ये लक्षण भयंकर समझे जाते हैं। साँस बंद होते ही मृत्यु हो हाती है। मदिरा के चिरकालीन सेवन से आमाशय शोथ, सूत्रण रोग, यकृत विकार आदि होते हैं। अंगों की शक्ति क्षीण हो जाती है और शरीर की प्रतिरक्षा की क्षमता कम हो जाने से रोगों के आक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। इच्छाशक्ति तथा उच्च भावना शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होकर कंपोन्माद (deliriumtremens), अपस्मार (epilepsy), पक्षाघात (paralysis) तथा पागलपन आदि के लक्षण प्रकट होते हैं। निद्रानाश, जलोदर, वृक्कशोथ तथा देहशोथ भी होते देखा जाता है। मद्यसेवी साधारणतया क्षीणकाय होते हैं, पर बीयर सेवी स्थूलकाय भी होते हैं।
श्रेणी:स्वास्थ्य