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अरुंधति राय
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नवम्बर 2014
नवम्बर 2014
अरुंधति राय Arundhati Roy W.jpg अरुंधति राय 2013 में 1961 11 24 y शिलौंग, भारतीय नास्तिकProfile – Arundhati Roy https://web.archive.org/web/20130908083056/http://nndb.com/people/240/000073021/ 8 सितंबर 2013 NNDB लेखिका और समाजसेवी 1997 – ਹੁਣ ਤੱਕ द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स बुकर पुरस्कार (1997) Arundhati Roy signature.svg
सुज़ेना अरुंधति राय (जन्म: 24 नवंबर, 1961) अंग्रेजी की एक लेखिका और समाजसेवी हैं।https://www.edexlive.com/happening/2021/jun/06/throwbacktoday-tbt-writer-arundhati-roy-book-booker-prize-21429.html #ThrowbackToday: Writer Arundhati Roy's second book comes out two decades after she won the Booker Prize The New Indian Express en 2021-07-01
इसने कुछेक फ़िल्मों में भी काम किया है। "द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स" के लिये बुकर पुरस्कार प्राप्त अरुंधति राय ने लेखन के अलावा नर्मदा बचाओ आंदोलन समेत भारत के दूसरे जनांदोलनों में भी हिस्सा लिया है।उनकी अनूदित पुस्तकें न्याय का गणित,आहत देश,कठघरे में लोकतंत्र है।
हाल ही में उनकी पुस्तक "द डॉक्टर एंड द सेंट: द अंबेडकर-गांधी डिबेट" (अंग्रेजी:The Doctor and the Saint: The Ambedkar-Gandhi Debate) चर्चा में है जिसका हिन्दी अनुवाद प्रोफेसर रतनलाल ने "एक था डॉक्टर एक था सन्त" के नाम से किया है।
आरंभिक जीवन
शिलौंग में 24 नवम्बर 1961 को अरुंधति राय का जन्म, केरल की सीरियाई ईसाई माता, मेरी रॉय व कलकत्ता के निवासी बंगाली हिंदू पिता, राजीब रॉय के घर हुआ। जब वे दो वर्ष की थीं, तब उनके माता-पिता का विवाह-विच्छेद हो गया और वो अपनी माता और भाई के साथ केरल आ गयीं। उनकी माता महिला अधिकार आंदोलनकारी थीं व उनके पिता चाय बाग़ान प्रबंधक थे। अरुंधती ने अपने जीवन के प्रारंभिक दिन केरल में गुज़ारे। https://www.nytimes.com/2014/03/09/magazine/arundhati-roy-the-not-so-reluctant-renegade.html Arundhati Roy, the Not-So-Reluctant Renegade Deb Siddhartha www.nytimes.com March 5, 2014 en 2020-04-21 https://web.archive.org/web/20160421172502/http://www.nytimes.com/2014/03/09/magazine/arundhati-roy-the-not-so-reluctant-renegade.html 21 अप्रैल 2016 live
उसके बाद उन्होंने आर्किटेक्ट की पढ़ाई दिल्ली से की। अपने करियर की शुरुवात उन्होंने अभिनय से की। मैसी साहब फिल्म में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई। इसके अलावा कई फिल्मों के लिये पटकथायों भी उन्होंने लिखीं। जिनमें In Which Annie Gives It Those Ones (1989), Electric Moon (1992) को खासी सराहना मिली। १९९७ में जब उन्हें उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स के लिये बुकर पुरस्कार मिला तो साहित्य जगत का ध्यान उनकी ओर गया।
हाल ही में उनकी पुस्तक "The Doctor and the saint:the ambedkar-Gandhi Debate" पुस्तक चर्चा में है जिसका हिन्दी अनुवाद भी "एक था डॉक्टर एक था सन्त" के नाम से प्रोफेसर रतनलाल जी ने है किया गया है काफ़ी चर्चा में है।
प्रमुख कृतियाँ
उपन्यास
द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स (The God of Small Things, 1997) — 1997 का बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास।
द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस (The Ministry of Utmost Happiness, 2017)
गैर-कथा
द एंड ऑफ़ इमेजिनेशन (The End of Imagination, 1998)
द कॉस्ट ऑफ़ लिविंग (The Cost of Living, 1999)
द ग्रेटर कॉमन गुड (The Greater Common Good, 1999)
द अलजेब्रा ऑफ़ इनफाइनाइट जस्टिस (The Algebra of Infinite Justice, 2002)
पावर पॉलिटिक्स (Power Politics, 2002)
वॉर टॉक (War Talk, 2003)
एन ऑर्डिनरी पर्सन्स गाइड टू एम्पायर (An Ordinary Person's Guide to Empire, 2004)
पब्लिक पावर इन द एज ऑफ़ एम्पायर (Public Power in the Age of Empire, 2004)
द शेप ऑफ़ द बीस्ट (The Shape of the Beast, 2008)
लिसनिंग टू ग्रासहॉपर्स (Listening to Grasshoppers: Field Notes on Democracy, 2009)
ब्रोकन रिपब्लिक (Broken Republic, 2011)
वॉकिंग विद द कॉमरेड्स (Walking with the Comrades, 2011)
कश्मीर: द केस फ़ॉर फ़्रीडम (Kashmir: The Case for Freedom, 2011)
द हैंगिंग ऑफ़ अफ़ज़ल गुरु (The Hanging of Afzal Guru and the Strange Case of the Attack on the Indian Parliament, 2013)
कैपिटलिज़्म: अ घोस्ट स्टोरी (Capitalism: A Ghost Story, 2014)
थिंग्स दैट कैन एंड कैनॉट बी सेड (Things That Can and Cannot Be Said, 2016)
द डॉक्टर एंड द सेंट (The Doctor and the Saint, 2017)
माई सेडिशियस हार्ट (My Seditious Heart: Collected Non-Fiction, 2019)
आज़ादी: फ़्रीडम. फ़ैसिज़्म. फ़िक्शन. (Azadi: Freedom. Fascism. Fiction., 2020)
मदर मैरी कम्स टू मी (Mother Mary Comes to Me, 2025) — हिंदी अनुवाद: मेरी माँ मेरी गैंगस्टर।
मदर मैरी कम्स टू मी (Mother Mary Comes to Me, 2025)
क्रांतिकारी विचार
अमरीकी साम्राज्यवाद से लेकर, परमाणु हथियारों की होड़, नर्मदा पर बाँध निर्माण आदि कई स्थानीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करती रही हैं अरुंधति राय. लेकिन अब उनका मानना है कि कम से कम भारत में अहिंसक विरोध प्रदर्शनों और नागरिक अवज्ञा आंदोलनों से बात नहीं बन रही है।
संसदीय व्यवस्था का अंग बने साम्यवादियों और हिंसक प्रतिरोध में भरोसा रखने वाले माओवादियों की विचारधाराओं में फंसी अरुंधति स्वीकार करती हैं कि वो गांधी की अंधभक्त नहीं हैं। उन्हीं के शब्दों में- "आख़िर गांधी एक सुपरस्टार थे। जब वे भूख-हड़ताल करते थे, तो वह भूख-हड़ताल पर बैठे सुपरस्टार थे। लेकिन मैं सुपरस्टार राजनीति में यक़ीन नहीं करती. यदि किसी झुग्गी की जनता भूख-हड़ताल करती है तो कोई इसकी परवाह नहीं करता."
अरुंधति का मानना है कि बाज़ारवाद के प्रवाह में बहते चले जा रहे भारत में विरोध के स्वरों को अनसुना किया जा रहा है। जनविरोधी व्यवस्था के ख़िलाफ़ न्यायपालिका और मीडिया को प्रभावित करने के प्रयास नाकाम साबित हुए हैं। उन्होंने कहा, "मैं समझती हूँ हमारे लिए ये विचार करना बड़ा ही महत्वपूर्ण है कि हम कहाँ सही रहे हैं और कहाँ ग़लत. हमने जो दलीलें दी वे सही हैं।.. लेकिन अहिंसा कारगर नहीं रही है।"
न्यायपालिका
न्यायपालिका की अवमानना के आरोप में संक्षिप्त क़ैद काट चुकी अरुंधति का स्पष्ट कहना है कि वह हथियार उठाने वाले लोगों की निंदा नहीं करतीं। उन्होंने रॉयटर्स को इंटरव्यू में कहा, "मैं ये कहने की स्थिति में नहीं हूँ कि हर किसी को हथियार उठा लेना चाहिए, क्योंकि मैं ख़ुद हथियार उठाने को तैयार नहीं हूँ... लेकिन साथ ही मैं उनलोगों की निंदा भी नहीं करना चाहती जो प्रभावी होने के दूसरे तरीकों का रुख़ कर रहे हैं।"
अपने इस विचार को उन्होंने गार्डियन को दिए साक्षात्कार में थोड़ा और स्पष्ट किया- "मेरे लिए किसी को हिंसा का उपदेश देना अनैतिक होगा, जब तक मैं ख़ुद हिंसा पर उतारू नहीं हो जाती। लेकिन इसी तरह, मेरे लिए विरोध प्रदर्शनों और भूख-हड़तालों की बात करना भी अनैतिक होगा, जब मैं घिनौनी हिंसा से सुरक्षित हूँ। मैं निश्चय ही इराक़ियों, कश्मीरियों या फ़लस्तीनियों को ये नहीं कह सकती कि वे सामूहिक भूख-हड़ताल करें तो उन्हें सैन्य क़ब्ज़े से मुक्ति मिल जाएगी. नागरिक अवज्ञा आंदोलन सफल होते नहीं दिख रहे।"
रविवार को दिये साक्षात्कार में वे कहती हैं-"हमारी जो संसदीय राजनीति है, उसमें अभी हर पार्टी के दस-दस पंद्रह-पंद्रह सिर है। जो बंगाल में वामपंथ बोलते हैं, वही नंदीग्राम में लोगों को अपने घरों से भगा रहे हैं, महाराष्ट्र वाले आदिवासी का साथ दे रहे हैं। वही भाजपा, जो यहां एसईजेड बनाना चाहती है, पश्चिम बंगाल में उसके खिलाफ बोलती है। हम सब एक ऐसे पागलखाने में घूम रहे हैं, जहां किसी की एक ही शक्ल नहीं है।"
अरुंधति को सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा अहिंसक जनांदोलनों को नज़रअंदाज़ किए जाने का व्यक्तिगत अनुभव नर्मदा आंदोलन से जुड़ कर हुआ। उनका कहना है कि नर्मदा आंदोलन एक गांधीवादी आंदोलन है जिसने वर्षों तक हर लोकतांत्रिक संस्थान के दरवाज़े पर दस्तक दी, लेकिन इससे जुड़े कार्यकर्ताओं को हमेशा अपमानित होना पड़ा। किसी भी बाँध को नहीं रोका गया, उल्टे बाँध निर्माण सेक्टर में नई तेज़ी आई।
पुरस्कार
1997 में द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग के लिए बुकर पुरस्कार।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
पेंटर ने ओसामा और माओ के बीच अरुंधती राय की नंगी पेंटिंग बना जताया विरोध
अरुंधति राय से साक्षात्कार
अरुंधति राय (अंग्रेजी में)
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