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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

नानालाल

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जुलाई 2016 thumb|हस्ताक्षर सुप्रसिद्ध कवीश्वर दलपतराय के पुत्र नानालाल (१८७७-१९४६ ई.) आधुनिक गुजराती साहित्य में सांस्कृतिक चेतना और भावसमृद्धि की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। जब तक उनका नाम रहेगा उनके द्वारा प्रवर्तित अपद्यागद्य या 'डोलनशैली' की सत्ता भी बनी रहेगी। गुजराती काव्य के क्षेत्र में उन्होंने अपने पिता से भी अधिक ख्याति प्राप्त की। पिता पुत्र का ऐसा यशस्वी कवियुग्म साहित्य के इतिहास में प्राय: दुर्लभ है। उन्होंने देश-विदेश के बहुसंख्यक नाटकों और महाकाव्यों का अनुशीलन करके अपने काव्य को गौरवान्वित किया। अपनी भाषा के अतिरिक्त वे संस्कृत, फारसी और अंगरेजी पर भी विशेष अधिकार रखते थे। जीवन परिचय नानालाल का जन्म एक स्वामी नारायणी परिवार में हुआ। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने अध्यापन की दिशा अपनाई। स्नातकोत्तर शिक्षा समाप्त करने के बाद वे सादरा के स्कॉट कालेज में प्रधानाध्यापक नियुक्त हो गए। तदनंतर १९०४ से राजकोट कालेज में प्राध्यापक पद पर काम करने लगे। १९१३ में राजकोट राज्य के प्रमुख न्यायाधीश पद पर नियुक्त हुए। १९१६ में राजकीय वृत्ति अपनाने पर सौराष्ट्र के मुख्य शिक्षणाधिकारी बनाए गए। १९२१ में गांधीजी के प्रभाव में आकर असहयोग आंदोलन में संमिलित हुए किंतु कुछ बातों में बापू से मतभेद हो जाने पर आंदोलन से विरत हो गए और अपना शेष जीवन सरस्वती की साधना में लगा दिया। उनकी यह साहित्यसाधना अंतिम समय तक चलती रही। रचनाएँ यद्यपि उन्होंने साहित्य की प्राय: सभी विधाओं में रचना की है परंतु कवि और नाटककार के रूप में उनका विशेष योग रहा है। अधूरी रचनाओं को भी मिला लेने पर उनके द्वारा लगभग ९० पुस्तकें विनिर्मित हुई। प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार है : कविता - 'कुरुक्षेत्र', 'वसंतोत्सव' और 'ओज अने अगर' (२ खंडकाव्य), 'गीतमंजरी' (२ भाग) 'दांपत्य स्तोत्रो' प्हानान्हाना रास (भाग ३), 'प्रेमभक्ति भजनावली'। नाटक - 'जयाजयत', 'संघमित्रा', 'शाहनशाह अकबर', 'विश्वगीता', 'श्री हर्षदेव', 'राजर्षि भरत'। कथा साहित्य - 'उषा'। विवेचन और चिंतन - 'माँ सरस्वतीचंद्रनु स्थान', कविश्वर दलपतराय (३ भाग), मणिमहोत्सवना साहित्य बोल, (२ भाग)। 'उद्बोधन' 'संबोधन, संसारमंथन'। अनुवाद - 'शाकुंतल', 'मेघदूत', 'गीता', 'शिक्षापत्री' तथा पाँच उपनिषदों का गुजराती भाषांतर। कविता में प्रेमभक्ति उनका उपनाम था। उन्होंने जीवन के अंतिम क्षणों में ईश्वरभक्ति काव्य की रचना की परंतु उनका शेष महाकाव्य उर्मिमय प्रेमभावना और यौवन गीतों की रचना में व्यतीत हुआ। श्री मनसुखलाल झवेरी के मत से 'प्रेमविवाह' या 'विवाहप्रेम' के आस पास नानालाल की समस्त साहित्यिक निधि घूमती जान पड़ती है। अपने 'जया जयंत' नामक काल्पनिक नाटक में उन्होंने गोबर्धनराम के 'सरस्वती चंद' में प्रदर्शित देशसेवा और त्याग की भावना से आदर्श प्रेम को और भी पराकाष्ठा तक पहुचाने का यत्न किया है। ऐतिहासिक तथा तत्वज्ञानप्रधान प्रेम की समस्या को उन्होंने प्रधान रूप से चिचित्र किया है। उन्होंने एक ओर रास, गरबी, आदि लोकरूपों का व्यवहार किया, दूसरी ओर वृत्तबद्ध उर्मिकाव्य लिखा और तीसरी ओर छंद के बंधनों से ऊपर उठकर उस 'डोलनशैली' का अविष्कार किया जिसमें 'लय' अथवा 'डोलन' की ही प्रधानता रहती है। यद्यपि उनके अनंतर इस शैली का प्रयोग व्यापक नहीं हो सका तथापि उनकी सर्ग शक्ति का इससे निश्चित परिचय प्राप्त होता है। छांदस-अछांदस, प्रचलित-अप्रचलित सभी काव्यरूपों में उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया तथा अपने समय के ईश्वरप्रेम, राजभक्ति, वीरपूजा, राष्ट्रसेवा आदि सभी भावप्रवाहों को आत्मसात् करने को चेष्टा की है। सन्दर्भ श्रेणी:गुजराती साहित्यकार श्रेणी:गुजराती साहित्य