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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

जॉन आस्टिन

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right|thumb|300px|जॉन ऑस्टिन जॉन आस्टिन (John Austin ; ३ मार्च सन्‌ १७९० - १८५९) एक अंग्रेज न्यायज्ञ थे। उन्होने विधि के दर्शन तथा विधिशास्त्र पर बहुत अधिक लिखा है। उन्होने विधिक प्रत्यक्षवाद के सिद्धान्त के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। परिचchaya जन्म ३ मार्च सन्‌ १७९० ई. को इंग्लैंड के इप्सविच नामक स्थान में; माता-पिता के ज्येष्ठ पुत्र। जॉन सेना में भर्ती हुए और सन्‌ १८१२ ई. तक वहाँ रहे। फिर सन्‌ १८१८ ई. में वकील हुए और नारफोक सरकिट में प्रवेश किया। जॉन ने सन्‌ १८२५ ई. में वकालत छोड़ दी। उसके बाद लंदन विश्वविद्यालय की स्थापना होने पर वह न्यायशास्त्र के शिक्षक नियुक्त हुए। विधिशिक्षा की जर्मन प्रणाली का अध्ययन करने के लिए वह जर्मन गए। वह अपने समय के बड़े-बड़े विचारकों के संपर्क में आए जिनमें सविग्नी, मिटरमायर एवं श्लेगल भी थे। आस्टिन के विख्यात शिष्यों में जॉन स्टुअर्ट मिल थे। सन्‌ १८३२ ई. में उन्होंने अपनी पुस्तक 'प्राविस ऑव जरिसप्रूडेन्स डिटरमिंड' प्रकाशित की। सन्‌ १८३४ ई. में आस्टिन ने इनर टेंपिल में न्यायशास्त्र के साधारण सिद्धान्त एवं अन्तरराष्ट्रीय विधि पर व्याख्यान दिए। दिसंबर, सन्‌ १८५९ ई. में अपने निवासस्थान बेब्रिज में मरे। ऑस्टिन ने एक ऐसे संप्रदाय की स्थापना की जो बाद में विश्लेषणीय संप्रदाय कहा जाने लगा। उनकी विधि संबंधी धारणा को कोई भी नाम दिया जाए, वह निस्संदेह विशुद्ध विधि विधान के प्रवर्तक थे। आस्टिन का मत था कि राजनीतिक सत्ता कुलीन या संपत्तिमान्‌ व्यक्तियों के हाथों में पूर्णतया सुरक्षित रहती है। उनका विचार था कि सम्पत्ति के अभाव में बुद्धि और ज्ञान अकेले राजनीतिक क्षमता नहीं दे सकते। आस्टिन के मूल प्रकाशित व्याख्यान प्राय: भूले जा चुके थे जब सर हेनरी मेन ने, इनर टेंपिल में न्यायशास्त्र पर दिए गए अपने व्याख्यानों से उनके प्रति पुन: अभिरुचि पैदा की। मेन इस विचार के पोषक थे कि आस्टिन की देन के ही फलस्वरूप विधि का दार्शनिक रूप प्रकट हुआ, क्योंकि आस्टिन ने विधि तथा नीति के भेद को पहचाना था और उन मनोभावों को समझाने का प्रयास किया था जिनपर कर्तव्य, अधिकार, स्वतंत्रता, क्षति, दंड और प्रतिकार की धारणाएं आधारित थीं। आस्टिन ने राजसत्ता के सिद्धांत को भी जन्म दिया तथा स्वत्वधिकार के अंतर को समझाया। इन्हें भी देखें जेन आस्टिन (अंग्रेजी कथासाहित्यकार) श्रेणी:विधि श्रेणी:विधि दार्शनिक