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आयुष चिकित्सा पद्धति
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आयुष चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा और होमियोपैथी शामिल हैं। इसे 'भारतीय चिकित्सा पद्धति' नाम से भी जाना जाता है। आयुष में वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की 80 प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी तरह से पारम्परिक चिकित्सा का उपयोग करती है। जिसमें प्रत्येक पद्धति का अपना प्राचीन दर्शन,औषधीय ज्ञान, धारणाएं और प्रथाएँ हैं जो क्षेत्रीय संस्कृति, परम्परा और विश्वास के साथ जुड़ी होती हैं।
परिभाषा एवं व्याख्या
आयुष का अर्थ (अंग्रेजी: Ayush; A- आयुर्वेद, Y- योग और प्राकृतिक चिकित्सा, U- यूनानी, S- सिद्धा, H- होम्योपैथी ) है। लगभग 1000 ईसा पूर्व आयुर्वेद के ज्ञान का व्यापक दस्तावेज चरक द्वारा चरक संहिता में और सुश्रुत द्वारा सुश्रुत संहिता में किया गया था। आयुर्वेद का सिद्धांत पांच मूल तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) और त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) की अवधारणा पर आधारित है।
आयुर्वेद में उपचार:- आयुर्वेद में उपचार व्यक्तिगत होता है। आयुर्वेद में उपचार के प्रकार इस प्रकार हैं: 1 शोधन चिकित्सा; 2. शमन चिकित्सा; 3. पथ्य व्यवस्था; 4. निदान परिवर्जन; 5. सत्वजय; 6. रसायन सेवा चिकित्सा है।आयुर्वेद में सोलह विशेष शाखाएँ हैं। योग का प्रतिपादन पतंजलि ने लगभग 2500 वर्ष पूर्व किया था। योग शब्द की उत्पत्ति 'यजुर योग' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है 'इकाई' या 'बांधना'। याज्ञवल्क्य के अनुसार, योग का अर्थ है 'संघ' अर्थात् व्यक्तिगत आत्मा (जीवात्मा) का सार्वभौमिक आत्मा (परमात्मा) से मिलन। यह तनाव कम करने के लिए बहुत लोकप्रिय है। विभिन्न योगों ने आधुनिक हिंदू धर्म की अवधारणा को जन्म दिया है, ये कर्म योग हैं , भक्ति योग, राज योग, ज्ञान योग, हठ और अष्टांक योग आदि। योग चिकित्सा के पांच सिद्धांत हैं उचित व्यायाम, उचित श्वास, उचित विश्राम, उचित आहार, सकारात्मक सोच और ध्यान। प्राकृतिक चिकित्सा प्रकृति के सरल नियमों के अनुप्रयोग पर आधारित है। आयुर्वेद से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।
प्राकृतिक चिकित्सा के पांच तत्व:- वायु, जल, मिट्टी, ताप, आकाश। यूनानी प्रणाली की उत्पत्ति यूनान में हुई। अरब और पेरिस के विक्रेताओं द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में भारत में पेश किया गया(460-377 ईसा पूर्व)। यूनानी चिकित्सा पद्धति हिप्पोक्रेट्स और गैलेन के सिद्धांत पर आधारित है। यूनानी चिकित्सा के सात सिद्धांत तत्त्व, स्वभाव, हास्य, अंग, बल/शक्ति, क्रिया/कार्य, आत्माएं हैं। सिद्ध प्रणाली तमिलनाडु में विकसित हुई थी। यह तमिल संस्कृति और सभ्यता से जुड़ा हुआ है। यह पहली तमिल संगम अवधि (छठी और सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व) के दौरान तोलाकापियम और थिरुमंदिरम में फला-फूला। सिद्ध प्रणाली का सिद्धांत," ब्रह्मांड दो आवश्यक तत्वों पदार्थ और ऊर्जा से मिलकर बना है, सिद्ध उन्हें शिव (पुरुष) और शक्ति (स्त्री) सृष्टि कहते हैं"। वे आदिम तत्त्व भूत हैं। भूतों में पांच तत्त्व होते हैं जो ठोस, द्रव, चमक, गैस, ईथर हैं। ये पांच तत्त्व हर पदार्थ में मौजूद हैं, लेकिन अलग-अलग अनुपात में। शरीर में शारीरिक क्रिया तीन पदार्थों द्वारा मध्यस्थ होती है जो वाथम, कर्पम और पीथम हैं। शरीर की प्रत्येक कोशिका में ये तीन दोष सह-अस्तित्व में रहते हैं और सामंजस्यपूर्ण रूप से कार्य करते हैं। जब संतुलन बिगड़ जाता है तो बीमारी शुरू हो जाती है। होम्योपैथी की खोज जर्मनी में 200 साल पहले (18वीं शताब्दी के अंत में) डॉ. सैमुअल हैनिमैन। हीलिंग के सिद्धांत पर आधारित "सिमिलिया सिमिलिबस क्यूरेंटिस" जिसका अर्थ है 'पसंद पसंद से ठीक हो जाती है'। इस प्रकार की दवाईयों में कोई रसायन इस्तेमाल नहीं किया जाता जिससे शरीर पर गलत प्रभाव पड़े। होम्योपैथी में पशु, मानव और पौधों के भागो का इस्तेमाल दवाइयों के निर्माण में किया जाता है।
शिक्षा और अनुसंधान कार्य
स्नातक कार्यक्रम के तहत: - बी.ए.एम.एस. (बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी), स्नातकोत्तर कार्यक्रम: - एम.ए.एम.एस (आयुर्वेद एमडी-आयुर्वेद में मास्टर डिग्री), आयुर्वेद में पीएचडी।
योग में डिप्लोमा, योग में बी.एस.सी. और योग चिकित्सा में और योग में एम. एस. सी.,योग में पीएच.डी.।
संस्थान:- मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान, नई दिल्ली। राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान, पुणे।
स्नातक कार्यक्रम के तहत- यूनानी चिकित्सा और शल्य चिकित्सा स्नातक। स्नातकोत्तर कार्यक्रम- यूनानी चिकित्सा में स्नातकोत्तर डिग्री, यूनानी चिकित्सा में पीएचडी।
यूनानी चिकित्सा पद्धति के सभी पहलुओं में प्रशिक्षण और अनुसंधान के उच्च मानकों को विकसित करने के लिए 1984 में बैंगलोर में भारत सरकार और कर्नाटक सरकार द्वारा संयुक्त रूप से यूनानी चिकित्सा संस्थान की स्थापना की गई थी।
अभ्यास और दवा मानक: - यूनानी फार्माकोपिया समिति की स्थापना वर्ष 1964 में हुई। यूनानी चिकित्सा में अनुसंधान के लिए केंद्रीय परिषद, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय - आयुष विभाग, नई दिल्ली।
बैचलर ऑफ सिद्ध मेडिसिन एंड सर्जरी। सिद्ध चिकित्सा में मास्टर डिग्री। सिद्ध चिकित्सा में पीएचडी। केंद्रीय सरकार द्वारा भारतीय चिकित्सा की केंद्रीय परिषद द्वारा एकरूपता और मानकों को बनाए रखा जाता है। राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान (एनआईएस), चेन्नई, सिद्ध चिकित्सा में शिक्षा और अनुसंधान का मानकीकरण करता है।
आवश्यकता और महत्व
चिकित्सा की आयुष प्रणाली विभिन्न रोगों के इलाज और व्यक्ति के स्वास्थ्य और भलाई को बनाए रखने के लिए असंख्य औषधि उपचारों का उपयोग करती है। दवाएं प्राकृतिक अणु हैं जो सीधे प्रकृति के विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती हैं।
आयुष दवाओं को मानव शरीर द्वारा बिना किसी प्रतिकूल प्रतिक्रिया के रिकवरी प्रभाव पैदा करने के लिए बेहतर अवशोषित करने के लिए जाना जाता है।
न केवल रोकथाम, बल्कि आयुष चिकित्सा उच्च रक्तचाप और कैंसर जैसे जीवन शैली संबंधी विकारों के प्रबंधन में मदद करती है।
उदाहरण के लिए, प्राकृतिक स्वास्थ्य संवर्धन पेय जैसे छाछ, नींबू पानी, मेथी पानी, शहद पानी आदि का चुनाव करना बहुत फायदेमंद साबित होता है।
अनुपचारित रोगों पर अंकुश:- आधुनिक चिकित्सा में आयुष चिकित्सा के उपयोग से तंत्रिका संबंधी विकार, असाध्य दर्द, पुरानी स्थिति, हड्डी और जोड़ों की जटिलताओं जैसे असाध्य रोगों पर अंकुश लगाना सिद्ध हुआ है।
सन्दर्भ
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https://ayushnext.ayush.gov.in/detail/current/ayush-system-of-medicine-become-popular-in-many-countries Ayush System of Medicine Become Popular in many Countries Ayush Next ayushnext.ayush.gov.in 2023-03-10 https://ayushnext.ayush.gov.in/detail/current/ayush-system-of-medicine-become-popular-in-many-countries
http://tripuranrhm.gov.in/AYUSH.html Welcome to NHM Tripura Website tripuranrhm.gov.in 2023-03-10 http://tripuranrhm.gov.in/AYUSH.html
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