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411 समाचार
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कंबोज

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thumb|right|200px कंबोज प्राचीन भारत के १६ महाजनपदों में से एक था। इसका उल्लेख पाणिनी के अष्टाध्यायी में १५ शक्तिशाली जनपदों में से एक के रूप में भी मिलता है। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय, महावस्तु मे १६ महाजनपदों में भी कम्बोज का कई बार उल्लेख हुआ है - ये गंधारों के समीपवर्ती थे। इनमें कभी निकट संबंध भी रहा होगा, क्योंकि अनेक स्थानों पर गंधार और कांबोज का नाम साथ साथ आता है। इसका क्षेत्र आधुनुक उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मिलता है, राजपुर, द्वारका तथा कपिशीFor Kapishi being a city of Kamboja, see: A Comparative Study of Thirty City-state Cultures: An Investigation, 2000, p 388, Dr Hansen, Mogens Herman (ed(d). इनके प्रमुख नगर थे। इसका उल्लेख इरानी प्राचीन लेखों में भी मिलता है जिसमें इसे राजा कम्बीजेस के प्रदेश से जोड़ा जाता है।नाहर डॉ रतिभानु सिंह प्राचीन भारत का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास १९७४ किताबमहल इलाहाबाद, भारत 112 editor: 19 मार्च 2008 प्राचीन बौद्ध साहित्य में कंबोज देश या यहाँ के निवासी कांबोजों के विषय में कई उल्लेख हैं जिनसे ज्ञात होता है कि कंबोज देश का विस्तार उत्तर में कश्मीर से हिंदूकुश तक था। शाक्य वंश में कंबोज के औपमन्यव नामक आचार्य का उल्लेख है। शतपथ शाक्य के एक स्थल से ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तरी लोगों अर्थात उत्तरी कुरुओं की तथा कुरु-पांचालों की बोली समान और शुद्ध मानी जाती थी। मौर्य काल के पूर्व में कंबोज, वाल्हीक और वनायु देशों को श्रेष्ठ घोड़ों के लिये उत्तम देश बताया है, जो इस प्रकार है: अपनी शिलालेखों में सम्राट अशोक ने कई समुदायों का ज़िक्र भी किया जो उनके राज्य की सीमाओं के अन्दर रहते थे, जिनमे कंबोज शामिल है : thumb|right|200px|कंबोज , मौर्य साम्राज्य में। 9. हिदा लाजविशवषि योनकंबोजेषु नाभकनाभपंतिषु भोजपितिनिक्येषु 10. अधपालदेषु षवता देवानंपियषा धंमानुषथि अनुवतंति यत पि दुता — सम्राट अशोक का प्रमुख शिलालेख 13, कालसी चट्टान, दक्षिणी भागhttps://archive.org/details/InscriptionsOfAsoka.NewEditionByE.Hultzsch/page/n186/mode/1up?view=theater Inscriptions of Asoka. New Edition by E. Hultzsch 48 Eugene Hultzsch 1925 English अनुवाद : यहाँ राजा (अशोक) के क्षेत्र में, यवन और कम्बोज में, नभक और नभपांकित में, भोज और पितिनिक में, आंध्र और पुलिंद में, (साम्राज्य में) हर जगह (लोग) देवताओं-के-प्रिय (अशोक) के बताएं नैतिकता में निर्देशों का पालन कर रहे हैं। “ 'काम्बोज विषये जातैर्बाल्हीकैश्च हयोत्तमै: वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णाहरिहयोत्तमै:वाल्मीकि-रामायण बाल0 6,22 „ महाभारत के अनुसार अर्जुन ने अपनी उत्तर दिशा की दिग्विजय-यात्रा के प्रसंग में दर्दरों या दर्दिस्तान के निवासियों के साथ ही कांबोजों को भी परास्त किया था- 'गृहीत्वा तु बलं सारं फाल्गुन: पांडुनन्दन: दरदान् सह काम्बोजैरजयत् पाकशासनि:'महाभारत सभा0 27,23। महाभारत शांति0 207,43; महाभारतमहाभारत/ शांति0 207,43 और राजतरंगिणीराजतरंगिणी4,163-165 में कंबोज की स्थिति उत्तरापथ में बताई गई है। महाभारत में कहा गया है कि कर्ण ने राजपुर पहुंचकर कांबोजों को जीता, जिससे राजपुर कंबोज का एक नगर सिद्ध होता है- 'कर्ण राजपुरं गत्वा काम्बोजानिर्जितास्त्वया'।महाभारत द्रोण0 4,5 कालिदास ने रघुवंश में रघु के द्वारा कांबोजों की पराजय का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार है कि : “ काम्बोजा: समरे सोढुं तस्य वीर्यमनीश्वरा:, गजालान् परिक्लिष्टैरक्षोटै: सार्धमानता:वाल्मीकि-रामायण बाल0 6,22 „ इस उद्धरण में कालिदास ने कंबोज देश में अखरोट वृक्षों का जो वर्णन किया है वह बहुत समीचीन है। इससे भी इस देश की स्थिति कश्मीर के आस पास प्रतीत होती हैं। महाभारत में कहा गया है कि कर्ण ने राजपुर पहुंचकर कांबोजों को जीता, जिससे राजपुर कंबोज का एक नगर सिद्ध होता है- 'कर्ण राजपुरं गत्वा काम्बोजानिर्जितास्त्वया'। चीनी यात्री हुएन-सांग ने भी अपनी भारत यात्रा के दोरान कंबोज में किसी राजपुर नगर का उल्लेख किया था।युवानच्वांग, भाग 1, पृ0 284) कंबोज के 'वार्ताशस्त्रोपजीवी' (खेती और शस्त्रों से जीविका चलाने वाले) संघ का उल्लेख है जिससे ज्ञात होता है कि मौर्यकाल से पूर्व यहां गणराज्य स्थापित था। मौर्यकाल में चंद्रगुप्त के साम्राज्य में यह गणराज्य विलीन हो गया होगा। परिचय कंबोज उत्तरापथ के गंधार के निकट स्थित प्राचीन भारतीय जनपद था जिसकी ठीक-ठाक स्थिति दक्षिण पश्चिम के पुँछ के इलाके के अंतर्गत मानी जा सकती है। प्राचीन संस्कृत एवं पाली साहित्य में कंबोज और गंधार का नाम प्राय: साथ-साथ आता है। जिस प्रकार गंधार के उत्कृष्ट ऊन का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है (१,१२६) उसी प्रकार कंबोज के कंबलों का उल्लेख यास्क के निरुक्त में हुआ है (२, २)। वास्तव में यास्क ने 'कंबोज' शब्द की व्युत्पत्ति ही 'सुंदर कंबलों का उपभोग करनेवाले' या विकल्प में सुंदर भोजन करनेवाले लोग-इस प्रकार की है। गंधार और कंबोज इन दोनों जनपदों के अभिन्न संबंध की परंपरा से ही इनका सान्निध्य सिद्ध हुआ है। गंधार अफगानिस्तान (कंदहार) का संवर्ती प्रदेश था और इसी के पड़ोस में पूर्व की ओर कंबोज की स्थिति थी। वाल्मीकि रामायण में कंबोज का वातहीक और वनायु जनपदों के साथ वर्णन है और इन देशों में उत्पन्न श्रेष्ठ काले घोड़ों से अयोध्या नगरी को भरी पूरी बताया गया है (बाल. ६, २२)। महाभारत में अर्जुन की दिग्विजय के प्रसंग में परमकांबोज का लोह और ऋषिक जनपदों के साथ उल्लेख है (सभा. २७, २५)। (ऋषिक यूची का रूपांतरण जान पड़ता है। यूची जाति का निवासस्थन दक्षिण-पश्चिम चीन या चीनी तुर्किस्तान के अंतर्गत था। प्रसिद्ध बौद्ध सम्राट् कनिष्क का रक्तसंबंध इसी जाति के कुशान नामक कबीले से था।) द्रोणपर्व में सात्यकि द्वारा कांबोजों, यवनों, शकों, किरातों और बर्बरों आदि की दुर्मद सेना को हराने और उनके मुंडित मस्तकों और लंबी दाढ़ियों का चित्रमय उल्लेख (१९९, ४५-४८)-हे राजन्, सात्यकि ने आपकी (धृतराष्ट्र की) सेना का संहार करते हुए हजारों कांबोजों, शकों, शबरों, किरातों और बर्बरों के शवों से रणभूमि को पाठकर वहाँ मांस और रुधिर की नदी बहा दी थी। उन दस्युओं के, शिरस्त्राणों से युक्त मुँडित और लंबी दाढ़ियोंवाले सिरों से रणभूमि पंखहीन पक्षियों से भरी हुई सी दिखाई दे रही थी। महाभारत के युद्ध में काबोजों ने कौरवों का साथ दिया था। यह द्रष्टव्य है कि कांबोजादि को आकृति संबंधी जिन विशेषताओं का वर्णनमहाभारत के इस प्रसंग में हैं वे आज भी इस प्रदेश के निवासियों में विद्यमान हैं। महाभारत में कांबोजों के राजपुर नामक नगर का भी उल्लेख है जिसे कर्ण ने जीता था (द्रोण. ४, ५)। कनिंघम ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'एंशेंट जियोग्राफी ऑफ इंडिया' (पृ. १४२) में राजपुर का अभिज्ञान दक्षिण-पश्चिम कश्मीर के राजौरी नामक नगर (जिला पुँछ, कश्मीर) के साथ किया है। इस प्रकार कंबोज देश की स्थिति का ज्ञान हमें प्राय:निश्चित रूप से हो जाता है। राइस डेविड्स ने इस प्रदेश की पूर्व बौद्धकालीन द्वारका नामक नगरी का उल्लेख किया है। लूडर्स के अभिलेखों (संख्या १७६, ४१२) में कंबोज जनपद के एक दूसरे स्थान नंदिनगर का भी उल्लेख है जिसकी स्थिति का ठीक पता नहीं। प्रसिद्ध व्याकरण लेखक पाणिनि ने, जो स्वयं कंबोज के सहवर्ती प्रदेश के निवासी थे 'कंबोजाल्लुक' सूत्र से (अष्टाध्यायी ४, १, १७३) इस जनपद के बारे में अपनी जानकारी प्रकट की है। पतंजलि ने भी महाभाष्य में कंबोज का उल्लेख किया है। सिकंदर के आक्रमण के समय (३२७ ई.पू.) कंबोज प्रदेश की सीमा के अंतर्गत उरशा (जिला हाजारा) और अभिसार (जिला पुँछ) नामक छोटे-छोटे राज्य बसे हुए थे। पालि ग्रंथ अंगुत्तरनिकाय में भारत के १६ महाजनपदों में कंबोज की भी गणना की गई है (१,२१३; ४,२५२-२५६-२६१)। अशोक के अभिलेखों में कांबोजों का उल्लेख, सीमावर्ती यवनों, नाभकों, नाभपंक्तियों, भोजपितिनकों और गंधारों आदि के साथ किया गया है (शिलालेख १३)। इस धर्मलिपि से ज्ञात होता है कि यद्यपि कंबोज जनपद अशोक का सीमावर्ती पांत था तथापि वहाँ भी उसके शासन का पूर्ण रूप से प्रचलन था। विद्वानों का मत है कि शाहबाजगढ़ी (जिला पेशावर) और मानसेहरा (जिला हजारा) में प्राप्त अभिलेखों से, अशोक के समय में (मश्य तृतीय शताब्दी ई.पू.), क्रमश: गंधार और कंबोज जनपदों की स्थिति का ज्ञान होता है। महाभारत के वर्णन में कंबोज देश के अनार्य रीति रिवाजों का आभास मिलता है। भीष्म. ९,६५ में कांबोजों को म्लेच्छजातीय बताया गया है। मनु ने भी कांबोजों को दस्यु नाम से अभिहित किया है तथा उन्हें म्लेच्छ भाषा बोलने वाला बताया है (मनुस्मृति १०, ४४-४५)। मनु की ही भाँति निरुक्तकार यास्क ने भी कांबोजों की बोली को आर्य भाषा से भिन्न कहा है और इस तथ्य के प्रमाण में उन्होंने उदाहरण भी दिया है (११-२)। इसी प्रकार भूरिदत्त जातक में भी कांबोजों के अनार्याचरण तथा अनार्य धर्म का उल्लेख है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने (मध्य ७वीं सदी ई.) भी राजपुर के समवर्ती प्रदेश के निवासियों को भारत के आर्यजनों की सांस्कृतिक परंपरा के बहिर्गत माना है और उन्हें उत्तर-पश्चिम की सीमावर्ती असभ्य जातियों के अंतर्गत बताया है। ह्वेनसांग ने राजपुर को चीनी भाषा में 'होलोशिपुलो' लिखा है। किंतु इसके साथ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि कंबोज में बहुत प्राचीन काल से ही आर्यों की बस्तियाँ बिद्यमान थीं। इसका स्पष्ट निर्देश वंशब्राह्मण के उस उल्लेख से होता है जिसमें कांबोज औपमन्यव नामक आचार्य का प्रसंग है। यह आचार्य उपमन्यु गोत्र में उत्पन्न, मद्रगार के शष्य और कंबोज देश के निवासी थे। कीथ का अनुमान है कि इस प्रसंग में वर्णित औपमन्यव कांबोज और उनके गुरु मद्रगार के नामों से उत्तरमद्र और कंबोज देशों के सन्निकट संबंध का आभास मिलता है। पालि ग्रंथ मज्झिमनिकाय से भी कंबोज में आर्य संस्कृति की विद्यमानता के बारे में सूचना मिलती है। महाभारत में कंबोज देश के कमठ और सुदक्षिण नामक राजाओं के नाम मिलते हैं-(सभा. ४, २२-उद्योग. १६६, १)। किंतु कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि चतुर्थ शताब्दी ई.पू. में कांबोज में संघ या गणराज्य की स्थापना भी की गई थी। अर्थशास्त्र (पृ. ३१८) में कांबोजों को वार्ताशस्त्रोपजीवी संघ अर्थात् कृषि और शस्त्रों से जीविका अर्जन करनेवाले संघ की संज्ञा दी गई है। महा. ७, ८९, ३८ में भी 'कबोजानां च ये गणा:', ऐसा वर्णन मिलता है। संस्कृत के काव्य ग्रंथों में भी कंबोज के विषय में अनेक उल्लेख मिलते हैं; उदाहरणार्थ, कालिदास ने रघुवंश में रघु की दिग्विजययात्रा के प्रसंग में कांबोजों पर उनकी विजय का सुंदर वर्णन इस प्रकार किया है-(रघु. ४, ६९)-'रघु के प्रभाव को सहने में असमर्थ कंबोज-निवासियों को अपने देश के अखरोट के वृक्षों, जिनसे रघु की सेना के मदमत्त हाथियों की शृंखलाएँ बाँधी गई थीं, की भाँति ही विनत होना पड़ा।' यह द्रष्टव्य है कि कालिदास के समय में भी आज ही की तरह भारत के इस प्रदेश के अखरोट प्रसिद्ध थे। इतिहासकार कल्हण के अनुसार कश्मीर नरेश ललितादित्य ने उत्तरापथ के अन्य कई देशों के साथ कंबोज को भी जीता था। उसके वर्णन में भी कंबोज की परंपरा से प्रसिद्ध घोड़ों का उल्लेख (४, १६३)। इस वर्णन से यह भी प्रमाणित होता है कि भारतीय इतिहास के प्राय: मध्यकाल (११वीं-१२वीं सदी ई.) तक कंबोज देश के नाम का प्रचलन था तथा इसकी सीमाएँ भी प्राय: पूर्ववत् ही थीं, किंतु यह जान पड़ता है कि तत्पश्चात् धीरे-धीरे इस जनपद का विलय कश्मीर राज्य में हो जाने से इसकी पृथक सत्ता का अंत हो गया और इसके साथ ही इसका नाम भी विस्मृति के गर्त में जा पड़ा। फिर भी अभी तक कंबोज के नाम की स्मृति काफिरिस्तान के निकटवर्ती प्रदेश के कुछ कबीलों के नामों, जैसे कंबोजी, कमोज और कामोजे आदि में सुरक्षित है। नेपाली परम्परा में कम्बोज नेपाली परंपरा में कंबोज देश के नाम से तिब्बत का अभिधान किया जाता रहा है (देखिए, फ़ूशे : इकोनोग्राफ़ीक बुद्धीक, पृ. १३४), किंतु उपर्युक्त तथ्यों से यह भली भाँति प्रमाणित होता है कि इस जनपद की स्थिति प्राचीन भारत की उत्तरी पश्चिमी सीमा के निकट ही रही होगी। यह तथ्य उनकी बोली से भी, जो ईरानी भाषा की ही एक शाखा थी, सिद्ध है सन्दर्भ इन्हें भी देखें महाजनपद कम्बोडिया, जिसका प्राचीन नाम 'कम्बोज' था। भारतीय साहित्य में कम्बोज श्रेणी:महाजनपद