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जयन्त
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right|thumb|300px|काकासुर को घास के वाण से मारते हुए राम
जयन्त, देवराज इन्द्र के पुत्र थे। वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के महाराज दशरथ के कूटनीतिक मंत्रियों में से एक थे। उनके अन्य मंत्रियों के नाम इस प्रकार थे – धृष्टि, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल तथा सुमन्त्र http://www.valmikiramayan.net/bala/sarga7/bala_7_frame.htm दशरथ के मंत्री 2012-05-08 https://web.archive.org/web/20111120174459/http://valmikiramayan.net/bala/sarga7/bala_7_frame.htm 20 नवंबर 2011 dead
कथा
देवराज इन्द्र के पुत्र जयन्त की कथा बहुत रोचक है। वह कौवे का रूप धारण कर श्री राम का बल देखना चाहता था। तुलसीदास लिखते हैं कि जैसे मंदबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहती हो उसी प्रकार से उसका अहंकार बढ़ गया था और इस अहंकार के कारण वह-
सीता चरण चोंच हतिभागा। मूढ़ मंद मति कारन कागा॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना॥
वह मूढ़ मन्द बुद्धि जयन्त कौवे के रूप में सीता जी के चरणों में चोंच मारकर भाग गया। जब रक्त बह चला तो रघुनाथ जी ने जाना और धनुष पर तीर चढ़ाकर संधान किया। अब तो जयन्त जान बचाने के लिए भागने लगा। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया। पर इन्द्र ने भी उसे श्रीराम का विरोधी जानकर अपने पास नहीं रखा। तब उसके हृदय में निराशा से भय उत्पन्न हो गया और शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा तो किसी ने उसे बैठने तक को नहीं कहा, क्योंकि रामजी के द्रोही को कौन हाथ लगाए। जब नारद ने जयन्त को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गई, क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे समझाकर तुरंत श्रीराम जी के पास भेजा और तब जयन्त ने पुकार कर कहा -
''हे शरणागत के हितकारी, मेरी रक्षा कीजिए। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता (सामर्थ्य) को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था। अपने कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु ! मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपकी शरण तक कर आया हूँ। (शिवजी कहते हैं -) हे पार्वती ! कृपालु श्री रघुनाथजी ने उसकी अत्यंत आर्त्त (दुःख भरी) वाणी सुनकर उसे एक आंख का काना करके छोड़ दिया।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
जयंत की कुटिलता और फल प्राप्ति (वेबदुनिया)
श्रेणी:पौराणिक पात्र