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गुरु बालकदास
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गुरु बालकदास गुरु बालकदास Guru Balakdas.jpg 18 अगस्त 1805 गिरौदपुरी, छत्तीसगढ़, भारत 1860 03 17 1805 08 18 yes कोसा, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ जातिवादी सामंतियो द्वारा छुपकर प्राण घातक हमला राजा गुरु, सतनामी आंदोलन के महानायक व प्रमुख सेनापति लोक-समाज के भूमि -संपत्ति, स्वाभिमान और मानव अधिकार की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। गुरु घासीदास, सफुरा माता गुरु घासीदास जैतखाम नीरा, राधा साहेबदास संघर्ष स्थल - औराबाँधा, जिला - मुंगेली शहादत स्थल - कोसा (मुलमुला), जिला - बेमेतरा समाधि स्थल - नवलपुर (ढारा), जिला - बेमेतरा
गुरु बालकदास (जन्म 18 अगस्त 1805 ई. - मृत्यु 17 मार्च 1860 ई.) महान क्रांतिकारी, समाज सुधारक , युग पुरुष और मानवाधिकार के लिए सतनामी आंदोलन के प्रणेता व सतनाम धर्म के संस्थापक गुरु घासीदास जी के द्वितीय पुत्र तथा उत्तराधिकारी थे। गुरु बालकदास जी सतनामी आंदोलन के प्रमुख सेनापति थे। उनके महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण गुरु घासीदास जी के बाद सन 1850 मे सतनामियों का प्रमुख गुरु बनाया गया। गुरु बालकदास जी ने नेतृत्व संभालने के बाद सतनामी आंदोलन को पूर्व की भांति पुरे गति से आगे बढ़ाया।
जन्म
गुरु बालकदास जी का जन्म 18 अगस्त सन् 1805 ईं. को भारत के छत्तीसगढ़ मे स्थित गिरौद गांव मे गुरु घासीदास जी और सफूरा माता के पुत्र के रूप मे हुआ। कुमार [रामकुमार लहरे] 18 अगस्त 2022 गुरु बालकदास जन्म दिवस https://www.google.co.in/books/edition/Smarika_18_08_2022_Guru_Balakdas_Janm_Di/Fy0bEQAAQBAJ बुक्स क्लिनिक पब्लिशिंग 978-93-5823-818-1
गुरु बालकदास जी के बड़ी बहन सहोद्रामाता तथा बड़ा भाई गुरु अमरदास थे।
इनके ऊपर गुरु घासीदास जी के विचारों का प्रभाव बचपन से ही पड़ा था। इसलिए जब सन 1820 ईस्वी मे सतनामी आंदोलन प्रारंभ हुआ, तो गुरु बालकदास जी ने उसमे बढ़ चढ़कर अपना योगदान दिया और नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। श्रुति देव गवास्कर, डॉ रामरतन साहू स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानव-अधिकार के महानायक - गुरु बालकदास https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/wp-content/uploads/SS202206010.pdf 20 जनवरी 2026 7 दिसंबर 2024 https://web.archive.org/web/20241207014052/https://shikshansanshodhan.researchculturesociety.org/wp-content/uploads/SS202206010.pdf bot: unknown
विवाह
गुरु बालकदास जी का विवाह ढारा नवलपुर (बेमेतरा) के निवासी सुनहरदास चतुर्वेदी की सुपुत्री व साहेब भुजबल महंत जी के बहन नीरा के साथ हुआ। बाद में गुरुजी ने चितेर सिलवट के बेटी राधा संग भी विवाह किये। गुरुबालकदास और राधा से उनके पुत्र साहेबदास जी का जन्म हुआ। और नीरा से गंगा व गलारा नाम की दो पुत्री का जन्म हुआ।
सतनामी आंदोलन
सतनामी आंदोलन रामकुमार लहरे और श्रुतिदेव गवास्कर सतनाम, सतनामी धर्म व सतनामी आंदोलन और ब्रिटिशकालीन अभिलेख https://books.google.co.in/books?id=gWaxEAAAQBAJ बुक्स क्लिनिक पब्लिकेशन 2023 978-93-5535-065-7 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध (विशेषकर 1820-1830 के मध्य) में गुरु घासीदास के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की धरती पर उपजा एक बहुआयामी विद्रोह था। यह केवल एक धार्मिक सुधार आंदोलन नहीं था, बल्कि जातिवाद, सामंतवाद, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध एक सशक्त प्रजातांत्रिक क्रांति थी। संकलित सतनामी आंदोलन https://archive.org/details/satnami-movement-by-kumar-lahre सतनामी आंदोलन में गुरु बालकदास जी ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, आत्मरक्षा के लिए अखाड़ा प्रथा समाज मे शुरू करवाया और सशक्त शस्त्र धारी सतनाम सेना बनाया जिन्होंने मराठा शोषण कारियों से आम जनता को सुरक्षा दी। गाँव-गॉंव जाकर रावटी लगाकर सतनाम के प्रचार किया जिससे कई जाति के लोग सतनामी बने। गुरु बालकदास जी हाथी और घोड़े का सवारी करते थे, हाथी का नाम - दुलरवा और घोड़ा का नाम - सांवल मणि था।
अंगरक्षक
गुरु बालकदास जी के बारह प्रमुख निजी अंगरक्षकों के नाम इस प्रकार है, 1. सरहा, 2. जोधाई, 3. लल्लू, 4. जगधर, 5. अमरसिंघ, 6. गुलाली उर्फ गुल्ली, 7. शोभित, 8. पतंगा, 9. वीरसिंघ, 10. रजई, 11. चंदा और 12. बराती। इन बारह अंगरक्षकों में गुरु बालकदास जी के निजी सुरक्षा दस्ते में सरहा को प्रमुख का जिम्मेदारी प्राप्त था। गुरु बालकदास जी को अपने इन अंगरक्षकों के प्रतिभा, साहस और युद्ध कला पर इतना भरोसा था कि उन्होंने उस समय गांव-गांव और लगभग हर सतनामी परिवारों में प्रशिक्षित खड़ैत होने के बावजूद अपने सुरक्षा के लिए अधिक सावधानी और प्रयास नहीं किया।
गुरु बालकदास जी का कार्यकाल 1850 ई. के बाद
गुरू घासीदासजी के देहावसान पश्चात सतनाम आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कौन हो के प्रश्न पर सतनाम संगठन-समाज में विचार-विमर्श हुआ। चूंकि गुरूघासीदास ने व्यक्ति महत्ता के स्थान पर समाज महत्ता पर जोर दिया था। समाज में गंभीर चर्चा के बाद यह तय हुआ कि सतनाम आन्दोलन को चलाने में गुरुघासीदास के साथ समाज - संगठन के शक्ति निर्माण में उनके द्वितीय पुत्र बालकदास ने बराबर का साथ नेतृत्व प्रदान किया था। इसलिए उन्हें ही गुरू मुखिया बनाया जाय। समाज के नेतृत्व के लिए कार्य कुशलता तथा नेतृत्व क्षमता को ही आधार माना जाएगा। किसी वंश परंपरा को नहीं। यह निर्णय कार्यक्षमता के आधार पर लिया गया, किसी वंशानुक्रम के तहत नहीं।
गुरु बालकदास और वीर नारायण सिंह
गुरु बालकदास जी का प्रभाव आदिवासियों के ऊपर भी था। सोनाखान के आदिवासी नेता वीर नारायण सिंह से उनका मित्रतापूर्ण संबंध था। वीर नारायण सिंह ने अपने सशस्त्र लड़ाकों में गुरु बालकदास द्वारा स्थापित सतनाम सेना के प्रशिक्षित सेनानीयों को सम्मिलित किया था। डॉ अनिल भटपहरी गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ https://books.google.co.in/books?id=EEwqEAAAQBAJ&pg=PA150
वीर नारायण सिंह की पहली गिरफ्तारी के बाद वे रायपुर सेट्रंल जेल की दीवार फांद कर फरार होकर गुरु बालकदास के पास भंडारपुरी आए। गुरु बालकदास जी ने सतनाम सेना के द्वारा उसे सुरक्षित सोनाखान पहुंचवाया। डॉ. अनिल भटपहरी वीर नारायण सिंह जेल ब्रेक पनाह https://anilbhatpahari.blogspot.com/2019/12/blog-post_9.html?m=1 20 जनवरी 2026 26 दिसंबर 2025 https://web.archive.org/web/20251226060054/https://anilbhatpahari.blogspot.com/2019/12/blog-post_9.html?m=1 bot: unknown
मालिक मकबूजा कानून
सन 1857 मे भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सैन्य विद्रोह हुआ। जिसे इस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पुरी तरह विफल कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन कंपनी के हांथ से अपने अधिन कर लिया। सुव्यवस्थित रूप से शासन करने के लिए मालिक मकबूजा कानून लागू किया गया। जिसके तहत ऐसे काश्तकार जो अपने जमीनों पर सन 1840 से काश्तकारी कर रहे हो, उनको सर्वे के बाद मालिकाना हक देने का फैसला किया गया था। सतनामी आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ के लोगों ने पेशवाशाही मराठों के द्वारा अपने छिने हुए भूमि संपत्तियों पर दोबारा अधिकार कर लिया था। मैदानी क्षेत्र के लगभग आधे भूभाग पर अपने जनसंख्या [सतनामियों का जनसंख्या छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों मे आधा था] के अनुपात मे कब्जा था। नये कानून से उन सभी भूमि संपत्तियों पर सतनामियों का कानून अधिकार होता। साहेबश्री लखन सुबोध गुरुबालकदास बलिदान गाथा https://archive.org/details/guru-balakdas-ka-balidan-gatha-gss
राजा गुरु
मालिक मकबूजा कानून मे यह भी प्रावधान था, कि अगर कोई विवाद होता है। तो उस क्षेत्र के मान्य मुखिया के राय को महत्व देते हुए निर्णय लिया जाएगा। गुरु बालकदास को मैदानी इलाकों के आधी आबादी के लोग अपने गुरु और मुखिया मानती थी। नये कानूनी प्रावधान से उनका हैसियत किसी न्यायाधीश या राजा का तरह हो चुका था, इसलिए आमजन उन्हें राजा गुरु कहते थे।
गुरु बालकदास जी के हत्या का षड्यंत्र
मालिक मकबूजा कानून से जातिवादी सामंती ताकतों मे खलबली मच गया। क्योंकि वे जानते थे कि एक बार अगर सरकारी दस्तावेजों मे जमीनों के वास्तविक मालिकों का नाम दर्ज हो गया। तो उनको बेदखल नहीं कर सकते। वे गुरु बालकदास जी के रहते सतनामियों के विरुद्ध कुछ भी कार्यवाही नहीं कर सकते थे। छत्तीसगढ़ मे किसी का साहस नही था, की कोई उनको टेढ़ी नजर से भी देख सके। इसलिए सामंती तत्वों ने गुरु बालकदास जी के हत्या करने का राष्ट्रव्यापी षड़यंत्र किया। छत्तीसगढ़ से बाहर के अपराधी किस्म के लोगों को कहा गया कि छत्तीसगढ़ मे एक आदमी का हत्या करना है, और यहां के हजारों हजार एकड़ जमीन पर कब्जा करना है। बाहरी अपराधियों को छत्तीसगढ़ बुलाया गया उनको सैन्य प्रशिक्षण दिया गया।
गुरु बालकदास जी की हत्या
गुरु बालकदास जी बोड़सरा बाड़ा- बिलासपुर के देखरेख का जिम्मा अपने एक भरोसेमंद अंगरक्षक को सौंपकर रामत [दौरा] के लिए निकले। कुछ दिनों के बाद औराबांधा- मुंगेली मे रावटी [मीटिंग] का आयोजन किया गया। जिसमें गुरु बालकदास जी गये। गुरुबालकदास जी मध्यभारत के वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के मुंगेली जिला मुख्यालय से 8-10 किलोमीटर दूर ग्राम - औराबांधा के तारिख 16 मार्च सन् 1860 ई' की रात को रात्रि विश्राम कर रहे थे कि अचानक सैकड़ों की संख्या में हथियारबंद समूह ने उनको जान से मारने के उद्देश्य से प्राणघातक हमला कर दिया। सुरक्षा में तैनात सुरक्षा दस्ता ने हमलावरों के विरुद्ध मोर्चा संभाल लिया रात कई घण्टे तक उनके अंगरक्षकों ने हमलावरों को मुहतोड़ जवाब दिया। स्वयं गुरुबालकदास ने भी उनका डटकर मुकाबला किया। हमलावरों ने सुनियोजित व संगठित होकर गुरुबालकदासजी को लक्ष्य बनाकर हमला किया था। गुरुबालकदास के सुरक्षा दस्ते के प्रमुख सरहा और जोधाई सहित सभी अंगरक्षकों ने अपने पूरे क्षमता और युद्ध कौशल से हमलावरों से लड़ा। चूंकि दुश्मनों की संख्या बहुत ज्यादा था और उनका लक्ष्य सिर्फ गुरुबालकदास था। हमला कई बार किया गया गुरुबालकदास लड़ते-लड़ते घायल हो चुके थे। हमलावरों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। इसलिए अंत में उनको भागना पड़ा सभी संघर्षरत खड़ैत एक स्थान पर इकट्ठे हुए। उन्होंने गुरुबालकदास को सतनाम आंदोलन का प्रशासनिक मुख्यालय भंडारपुर ले जाना चाहा और वे औराबांधा से भण्डारपुर की ओर ले जाने लगे। कुछ दूर जाने के बाद गुप्तचरों ने खबर दिया कि गुरुबालकदास को भण्डारपुर ले जाना उचित नहीं होगा क्योंकि ऐसा अफवाह है, कि वहां मौजूद लोग गुरु बालकदास जी को वहां जीवित या मृत किसी भी स्थिति में नहीं देखना चाहते। सुरक्षा दस्ता के लोग आश्चर्यचकित हो गये क्योंकि औराबांधा में हुए घटनाक्रम की जानकारी इतना जल्दी भण्डारपुर पहुंचने और वहां से नकारात्मक प्रतिक्रिया आने की उम्मीद किसी को नहीं थी। इसके अलावा गुरुबालकदास जी के रहते और किसी को सतनाम आंदोलन का प्रमुख नहीं बनाया गया था, तो भण्डारपुर से किसने व किस अधिकार से गुरुबालकदासजी का भण्डारपुर प्रवेश प्रतिबंधित किया। सुरक्षा दस्ता भण्डारपुर जाने वाले रास्ते को बदलकर सतनाम आंदोलन का एक अन्य महत्वपूर्ण केन्द्र नवलपुर (वर्तमान बेमेतरा जिला मुख्यालय के 6 किलोमीटर निकट का स्थान) जाने लगा। लेकिन नवलपुर पहुंचने के 8 किलोमीटर पहले कोसा नामक गांव में 17 मार्च को गंभीर रूप से घायल गुरुबालकदासजी की मृत्यु हो गयी। अंगरक्षकों ने इतनी सूचना नवलपुर में मौजूद सतनाम आंदोलन के एक अन्य महानायक साहेब भुजबल महंत को दिया। कुमार [रामकुमार लहरे] 17 मार्च 2018 गुरु बालकदास शहादत दिवस https://archive.org/details/guru-balakdas-shahadat-divas सतनामी पुनर्जागरण मिशन [SPM] बिलासपुर,छत्तीसगढ़
साहेब भुजबल महंत स्वयं अपने खड़ैतों को लेकर कोसा पहुंचे और गुरुबालकदासजी के मृत शरीर को नवलपुर ले आये। यहां सतनाम आंदोलनकारियों ने उन्हें अंतिम सलामी दिया। उसके बाद ससम्मान उनके मृत शरीर को अंतिम कफन -दफन किया। इस तरह गुरुबालकदासजी अपने जिंदा रहते तक लोक समाज के मानवाधिकार, रोटी और सम्मान की रक्षा में जातिवादी सामन्ती तत्वों से संघर्ष करते हुए, 17 मार्च सन् 1860 ई. को शहीद महेश दत्त शर्मा छत्तीसगढ़ की महान विभूतियाँ https://books.google.co.in/books?id=MX53EAAAQBAJ&pg=PA1912 प्रभात प्रकाशन First गुरु बालकदास हिंदी 2022 978-93-87968-74-5 हो गये।
गुरु बालकदास जी के शहादत के बाद की स्थिति
गुरुबालकदास जी के हत्या के बाद भंडार से आगरदास को गुरुगद्दी पर बैठाया गया, उन्होंने गुरुबालकदास जी हत्या व समकालीन परिस्थितियों में सतनाम समाज संगठन का साथ नहीं दिया। बल्कि सतनाम-समाज संगठन की सर्वोच्च संस्था एवं उसकी संपत्ति पर अपना कब्जा करने विविध समाजघाती कार्य किये। जिससे सतनामियों को घातक परिणाम भोगना पड़ा।
कुछ वर्षों के पश्चात गुरु बालकदास जी के एकमात्र पुत्र साहेबदास जी की भी संदिग्ध मृत्यु हो गई वे निःसंतान थे, साहेबदास और आगरदास के बीच विवादित बंटवारा हुआ था।
17 मार्च सन् 1860 ई. को गुरु बालकदास जी के शहादत के बाद सतनामियों का दमन शुरु हो गया। गुरु घासीदास, गुरु बालकदास के समय जिन लोगों ने अपनी भूमि व सम्पत्ति पर दोबारा कब्जा किया था, असमानतावादी विचारधारा को त्यागकर समतावादी समाज का निर्माण किया था। उनके खिलाफ चौतरफा दमन कर सतनामियों के हाथ से हजारों-हजार एकड़ भूमि और सम्पत्ति दमनकारियों के कब्जे में आता गया। सतनामियों का सबसे बड़ा ताकत उनका भूमि पर अधिकार और व्यापक एकता धीरे-धीरे खंडित होता गया। कुमार [रामकुमार लहरे] मानवाधिकार स्वाभिमान दिवस https://archive.org/details/manvadhikar-swabhiman-divas-bhujbal-mahant सतनामी पुनर्जागरण मिशन [SPM]
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
गुरु घासीदास
सतनामी आंदोलन
मानवाधिकार स्वाभिमान दिवस
बाहरी कड़ियाँ
सतनामी इतिहास
गुरु घासीदास, संत घासीदास अउ महंत घासीदास
दस्तावेज़ - गुरु घासीदास के उत्तराधिकारी पुत्र गुरुबालकदास की ह्त्या क्यों
बोड़सरा का सच : बोड़सरा इतिहास और विवाद के परतों को कुरदते हुए सच्चाई पर आधारित गहन पड़ताल.: उत्तम कुमार : संपादक दक्षिण कौशल
17 मार्च गुरु बालकदास शहादत दिवस
दस्तावेज़ तथ्यात्मक संदर्भों में गुरुघासीदास के पूर्व पेशवा मराठों के अत्याचार
मानवाधिकार स्वाभिमान के लिए डोला यात्रा
श्रेणी:सतनामी धर्म
श्रेणी:गुरु घासीदास