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411 समाचार
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उत्पल दत्त

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Utpal Dutt Utpal Dutta Utpal Dutt 2013 stamp of India.jpg 250px Dutt on a 2013 stamp of India yes 1929 03 29 Barisal, Bengal Presidency, British India(present-day Bangladesh) yes 1993 08 19 1929 03 29 Calcutta, West Bengal, India Actor, director, playwright 1947–1993 Shobha Sen 1960 1993 Bishnupriya Dutta उत्पल दत्त (जन्म: 29 मार्च, 1929 निधन: 19 अगस्त, 1993) एक हिन्दी एवं बांगला फिल्म के प्रसिद्ध अभिनेता थे। आज अधिकांश सिनेमाई प्रशंसको को उत्पल दत्त याद नहीं होंगे। अधिकांश लोग तो उन्हें कॉमिक टाइमिंग के लिए ही जानते हैं। उत्पल केवल एक अदाकार नहीं थे, वो एक क्रांतिक रंगकर्मी भी थे। उत्पल विविधतापूर्ण अभिनय के लिए याद आते हैं। ऋषिकेश मुखर्जी की कॉमिक कालजयी फिल्म गोलमाल में उनकी हास्य अदाकारी उनका रचनात्मक, स्मारक है। उत्पल अभिनेता के साथ ही, लेखक, निर्देशक नाटककार, के साथ-साथ वामपन्थ से खासे प्रभावित थे। गोलमाल’, ‘रंग बिरंगी’, ‘शौकीन’ और ‘अंगूर’ जैसी फ़िल्मों में जबर्दस्त कॉमिक टाइमिंग का प्रदर्शन किया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी उत्पल दत्त कॉमेडी, संजीदा फ़िल्मों के साथ ही विलेन भी बन। एक इंक़लाबी रंगकर्मी के तौर पर वे उनसे शायद ही आज के दर्शक वाकिफ़ हों। जबकि एक दौर था, जब उत्पल दत्त ने अपने क्रांतिकारी रंगकर्म से सरकारों तक को हिला दिया था। अपनी क्रांतिकारी सरगर्मियों की वजह से वे आजा़द हिंदुस्तान में दो बार जे़ल भी गए। एक दौर था,जब वे देश की सबसे बड़ी थिएटर हस्तियों में से एक थे। आज़ादी के बाद उत्पल दत्त, भारतीय रंगमंच के अग्रदूतों में से एक थे। उन्होंने नाटककार, अभिनेता, थिएटर निर्देशक और थिएटर एक्टिविस्ट की भूमिका एक साथ निभाई। हालांकि उन्होंने बहुत कम फ़िल्मों में काम किया। ‘गुड्डी’, ‘गोलमाल’, ‘नरम-गरम’, ‘रंग बिरंगी’ और ‘शौकीन आदि उनकी सिग्नेचर, कालजयी फ़िल्में हैं। हिन्दी सिनेमा में उनको भरपूर प्रतिष्ठा और काम ऋषिकेश मुखर्जी की ‘गोलमाल’ से मिली, जो न आर्ट फ़िल्म बनाते थे। उत्पल दत्त ने अपना प्रमुख काम सत्यजीत रे, ऋषिकेश मुखर्जी, आदि महान फ़िल्मकारों के साथ किया। उत्पल मार्क्सवादी विचारधारा के अनुयायी थे। सत्ता चाहे जिस दौर में हो, सत्ता का स्वरुप एक जैसा ही होता है। सत्ता निरंकुश हो जाती है, अगर उत्पल दत्त जैसे कलाकार भी अपनी सृजनात्मक कला का उपयोग सरोकार में न करें! लिहाजा उत्पल दत्त ने सत्ता को चुनौती देते हुए नाटक लिखे एवं मंचन किया। इस विद्रोही आचरण के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। एक कलाकार को समाज सब कुछ देता है, वहीं जब समाज की आवाज़ बनने का मौका आता है, तो कलाकार मुखर होने की बजाय मुकर जाते हैं। उत्पल दत्त ने सत्ता के दांत खट्टे कर दिए थे। वहीं उत्पल दत्त जैसे महान अदाकार अपनी इस विद्रोही, सरोकार की इस प्रवृत्ति को लेकर कहते हैं-            ‘‘मैं तटस्थ नहीं पक्षधर हूं और मैं राजनीतिक संघर्ष में विश्वास करता हूं, सरोकार की आवाज़ बनना चाहता हूं, आम जनमानस के अधिकारों को लेकर चिंतित रहता हूं, आम तौर पर सत्ता को सही गलत के लिए न टोका गया तो सत्ता निरंकुश हो जाती है. अतः हम जैसे कलाकारों को समाज की आवाज़ को उठाते रहना चाहिए, फिर चाहे जेल जाना पड़े, या कोई भी मूल्य चुकाना पड़े। मैं जिस दिन मैं राजनीतिक संघर्ष में हिस्सा लेना बंद कर दूंगा, मैं एक कलाकार के रूप में भी मर जाऊंगा”। उत्पल ने थिएटर, नुक्कड़ नाटक, पारंपरिक लोक नाटक और सिनेमा यानी प्रदर्शनकारी कलाओं के सभी माध्यमों में काम किया। भांति – भांति तरह की भूमिकाएं की। उनके लिखे और निर्देशित कई बांग्ला नाटकों ने खूब प्रभावित किय। ख़ास तौर पर उत्पल दत्त के नाटकों में ‘अंगार’, ‘कल्लोल’ और ‘बैरिकेड’ काफ़ी चर्चित रहे। देखा जाए तो उनका नाटक ‘बैरिकेड’ जर्मनी के नाजीवाद की तरफ इशारा करता है, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर यह उन घटनाओं की ओर इशारा करता है, जो देश को इमरजेंसी लगी। अपनी बात रखने का प्रभाव भी यही होता है, कि नाम भी न लिया जाए और सन्देशा भी पहुंच जाए। ज़ाहिर है कि इस नाटक ने अपने दौर में विवादों के बावजूद खूब लोकप्रियता हासिल की। 29 मार्च, 1929 को जन्मे उत्पल दत्त के रचनात्मक जीवन की शुरुआत 1940 में हुई। उत्पल अँग्रेजी थिएटर से जुड़कर अभिनय की शुरुआत की। शेक्सपियर साहित्य से उत्पल जी का बेहद लगाव था। इस दौरान उन्होंने थिएटर कंपनी के साथ भारत और पाकिस्तान में कई नाटक मंचित किए। नाटक ‘ओथेलो’ से उन्हें काफ़ी वाहवाही मिली थी। बाद में उत्पल दत्त का रुझान अंग्रेज़ी से बंगाली नाटक की ओर गया। 1950 के बाद उन्होंने एक प्रोडक्‍शन कंपनी जॉइन कर ली, जिससे उनका बंगाली फ़िल्मों से कैरियर शुरू हो गया। बंगाली फ़िल्मों के साथ उनका थिएटर से प्रेम भी जारी रहा। इस दौरान उन्होंने कई नाटकों को निर्देशन ही नहीं बल्कि लेखन कार्य भी किया। बंगाली राजनीति पर लिखे उनके नाटकों ने कई बार विवाद को भी जन्म दिया। उत्पल दत्त को 1950 में मशहूर फ़िल्मकार मधु बोस ने अपनी फ़िल्म ‘माइकल मधुसुधन’ में लीड रोल दिया, जिसे समीक्षात्मक रूप से खूब सफलता मिली। इसके बाद उत्पल ने महान फ़िल्मकार सत्यजीत रे की फ़िल्मों में भी काम किया। हिन्दी सिनेमा में उत्पल महान् हास्य अभिनेता के रूप में जाने जाते थे। 1970 में प्रतिबंध के बावजूद भी उत्पल दत्त तीन नाटकों- ‘दुश्वापनेर नगरी’, ‘एबार राजर पाला’ और ‘बेरिकेड’ के ‌लिए दर्शकों का हुजूम उमड़ आया था। उत्पल हिन्दी सिनेमा में  नाम बनाने से पहले बंगाली थिएटर, एवं बंगाली सिनेमा में जाने – माने अदाकार, रंगकर्मी थे। उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में अधिकांश कॉमेडी फ़िल्में ही की थी। अमिताभ बच्चन की डेब्यू फ़िल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ में उत्पल भी एक हिन्दुस्तानी थे। उत्पल उस दौर में अपने चरम पर थे, अपनी अभिनय क्षमता का परिचय देते हुए उत्पल ही मुख्य भूमिका में थे। अमिताभ बच्चन समेत अन्य सभी कलाकार सहायक भूमिकाएँ निभा रहे थे, आभास होता है। सत्यजीत रे कहते थे-  “मुझे फ़िल्मों के अधिकांश नायक प्रभावित नहीं कर पाते क्योंकि मैं ज्यादातर अभिनय पसन्द करता हूँ, स्टारडम नहीं! ऐसे कुछ अदाकारो में मुझे उत्पल की अदाकारी बहुत पसन्द है। खासकर कॉमिक टाइमिंग के लिहाज से उत्पल बहुत ज्यादा प्रतिभाशाली हैं, क्योंकि कॉमिक ऐक्टिंग सबसे कठिन होती है, कई बार ऐक्टर करता है, तो नहीं कर पाता, लेकिन उत्पल ने कभी भी ऐक्टिंग नहीं की, जो भी किया सब नेचुरल था। उत्पल जैसे अदाकार बहुत बिरले होते हैं'”। सत्तर के दशक में भारतीय समांतर सिनेमा की नींव जिन फ़िल्मों से रखी गई थी, उन प्रमुख कृतियों में ‘भुवन शोम’ भी थी। उसके नायक भी उत्पल दत्त थे। इस फ़िल्म के अभिनय के लिए उत्पल को वर्ष 1970 में श्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। एक ऐसे प्रभावशाली अदाकार उत्पल दत्त , जिन्होंने हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। एक अभिनेता के रूप में उत्पल दत्त ने लगभग हर किरदार को निभाया। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी विलेन फिर भी अधिकांश सकारात्मक रोल किए। उत्पल को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। फ़िल्म ‘गोलमाल’ में ऋषिकेश मुखर्जी ने उत्पल की संजीदा शख्सियत के बरअक्स ‘भवानीशंकर’ के एक ऐसे व्यक्ति भूमिका दी, जिन्हें मूछों से अधिक लगाव था, जो बहुत रूढ़िवादी था। फिल्म में सामान्य चहरे के धनी अमोल पालेकर से लेकर दीना पाठक, देवन वर्मा, जैसे अदाकार भी अपनी छोटी – छोटी भूमिकाओं से फ़िल्मों को अमरत्व प्रदान करते थे। उस फिल्म के सभी अदाकारों का हास्य अभिनय आज भी एक सिलेबस है। उत्पल गंभीर रहकर भी इतना हंसा गए थे कि उस वर्ष ‘बेस्ट कमेडियन’ का फ़िल्मफ़ेयर एवार्ड उन्हें मिला था। फ़िल्म ‘गोलमाल’ में उत्पल जिस अंदाज़ से ‘अच्छाआ….’ बोलते थे, वो उनका अंदाज़ खूब लोकप्रिय हुआ था। हिन्दी फ़िल्मों में फिर तो उनको हल्की भूमिकाएँ मिलतीं गईं। तब ये कौन सोच सकता था कि बंगाली और हिन्दी मनोरंजन जगत के इस दिग्गज अभिनेता ने अपना रंगमंच कैरियर की शुरुआत अंग्रेज़ी में शेक्सपियर के ड्रामों से की। उत्पल ने ‘ओथेलो’ में अदाकारी के साथ-साथ उन्होंने शेक्सपियर के एक और नाटक ‘रिचर्ड तृतीय’ में राजा का किरदार किया। इस रोल की उनकी दमदार अदाकारी को देखकर, जेनिफिर केंडेल के पिता केंडेल दम्पत्ति जिऑफ्रे केंडल और लौरा केंडल ने उन्हें अपने थियेटर ग्रुप ‘शेक्सपियराना थियेटर कंपनी’ में शामिल होने का ऑफर दिया। यह उनकी जिंदगी का टर्निग पॉइंट था। शेक्सपियर के नाटकों पर उत्पल की तो रुचि थी ही, साथ ही उन्होंने बंगाली थिएटर के जरिए सामाजिक असमानता, भूख, प्यास, हिंसा, नागरिक अधिकारों, के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए नाटक करने, लिखने लगे। रंगमंच का विद्रोही अदाकार-उत्पल दत्त बहुत से लोग पैसा कमा लेते हैं, बहुत से लोग, सम्मान, कमाते हैं, और अपने – अपने योगदान के लिए याद किए जाते हैं।उत्पल (इप्टा) के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं।(इप्टा) से जुड़ने के बाद उत्पल दत्त ने जो भी नाटक किए, उनमें एक सियासी उबाल ज़रूर हुआ। जनता को जागरूक करने के इरादे से ही इन नाटकों का मंचन किया। इन्हें राजनीतिक नाटक कहें, तो ग़लत नहीं होगा। देश में जब इमरजेंसी लगी, तो उत्पल  ने इसका रचनात्मक विरोध किया। उत्पल एक सजग बुद्धिजीवी इंसान थे, समाज की अहम समस्याओं पर उनकी नज़र रहती थी। हमेशा अपनी रचनात्मकता से वो सवाल उठाते थे। उत्पल राजनीतिक षड्यंत्रों को खूब समझते थे। उत्पल ने एक बार कहा था – “भारत का पूंजीपति, जो अज्ञानता, अंधविश्वास में डूबा हुआ है, अपने फायदे के लिए ख़तरा देखता है, तो वहशी बन जाता है, और पड़ोसी देशों के साथ युद्ध करना, एक तरह से उसकी सालाना तिकड़म है, जिसका सहारा लेकर काल्पनिक दुश्मनों के ख़िलाफ़ पूरे समाज एवं जनता का ध्यान मोड़ा जाता है और अवाम के बीच हिंसक कट्टरता को जगाया जाता है। इस सब को समझने के लिए यहां बहुत जागरुकता की आवश्यकता है”। मेरे लिए उत्पल जैसे कलाकार ही प्रमुख हैं, जो समाज की आवाज़ बने। 19 अगस्त 1993 को उत्पल दत्त इस फानी दुनिया को रुख़सत कर गए। प्रमुख फिल्में वर्ष फ़िल्म चरित्र टिप्पणी1984 लाखों की बात मगन भाई 1983 रंग बिरंगी पुलिस इंस्पेक्टर धुरंधर भाटवडेकर 1982 अंगूर राज तिलक, अशोक का पिता 1979 गोल माल भवानी शंकर 1979 कर्तव्य दीवान धनपति राय 1978 जॉय बाबा फेलुनाथ मगनलाल मेघराज 1977 ईमान धर्म बलबीर सिंह, फ़ौजी1956 शुभलग्न बंगाली फ़िल्म1954 विक्रम उर्वशी बंगाली फ़िल्म1950 माइकल मधुसूदन बंगाली फ़िल्म1950 विद्यासागर बंगाली फ़िल्म बतौर निर्देशक वर्ष फ़िल्म टिप्पणी1984 इन्कलाब के बाद 1983 माँ बंगाली फ़िल्म1981 बैशाखी बंगाली फ़िल्म1979 झोर 1965 घूम भंगर गान बंगाली फ़िल्म1961 मेघ बंगाली फ़िल्म नामांकन और पुरस्कार सन्दर्भ https://finfact.co.in/uttpal-dutt/ गोलमाल’, ‘चुपके चुपके’, ‘रंग बिरंगी’, ‘शौकीन’ और ‘अंगूर’ जैसी फ़िल्मों में जबर्दस्त कॉमिक टाइमिंग बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:बॉलीवुड श्रेणी:फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार विजेता श्रेणी:हिन्दी अभिनेता श्रेणी:1929 में जन्मे लोग श्रेणी:१९९३ में निधन श्रेणी:श्रेष्ठ अभिनेता के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार विजेता