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खोईराओ भाषा
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खोईराओ भाषा (Khoirao), जिसे थांगल नागा (Thangal Naga) भी कहा जाता है, भारत के मणिपुर राज्य में बोली जाने वाली एक सिनो-तिब्बती भाषा है। इसे भाषावैज्ञानिक वर्गीकरण में जेमिक शाखा से संबंधित माना जाता है। इसका ISO 639-3 कोड nki तथा Glottolog कोड than1255 है।
नाम
इस भाषा को विभिन्न स्रोतों में Khoirao, Khoirao Naga, Koirao, Thangal और Thangal Naga जैसे नामों से संदर्भित किया गया है। Glottolog में Thangal Naga को भाषा का प्रमुख नाम तथा Khoirao सहित कई नामों को वैकल्पिक नामों के रूप में दर्ज किया गया है।
भाषा-परिवार
खोईराओ भाषा को सिनो-तिब्बती भाषा परिवार की जेमिक शाखा में वर्गीकृत किया जाता है। इसके भाषाई वर्गीकरण और संरचना पर विभिन्न भाषावैज्ञानिक अध्ययनों में चर्चा की गई है।
भौगोलिक वितरण
खोईराओ मुख्य रूप से मणिपुर के उत्तरी भाग में बोली जाती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसके वक्ता विशेष रूप से सेनापति जिला के पूर्वी और पश्चिमी सदर हिल्स क्षेत्र के विभिन्न गाँवों में पाए जाते हैं। इनमें मपाओ थांगल, थांगल सुरंग, मकेन्ग थांगल, तुमनौपोकपी, याइकांगपाओ, टी-खुल्लेन, निंगथौबाम, मायांगखांग और अंगकाइलोंगडी जैसे गाँवों का उल्लेख मिलता है।
कुछ स्रोतों में मणिपुर के अतिरिक्त असम में भी इसके भाषाई वितरण का उल्लेख मिलता है।
वक्ताओं की संख्या
खोईराओ भाषा के वक्ताओं की संख्या के संबंध में अलग-अलग स्रोतों और विभिन्न वर्षों के आँकड़ों में अंतर मिलता है। उपलब्ध स्रोतों में वर्ष 2001 के लिए लगभग 24,000 वक्ताओं का आँकड़ा उद्धृत किया गया है। हालांकि, यह आँकड़ा वर्तमान वक्ताओं की संख्या का प्रत्यक्ष अनुमान नहीं माना जाना चाहिए।
भारत की जनगणना के पुराने अभिलेखों में भी खोईराओ को मातृभाषा के रूप में दर्ज किया गया है। उदाहरण के लिए, 1961 की जनगणना में मणिपुर में 406 लोगों ने खोईराओ को अपनी मातृभाषा बताया था। पुराने जनगणना आँकड़ों और बाद के अनुमानों में अंतर भाषा की पहचान, वर्गीकरण और जनगणना पद्धति में हुए बदलावों से भी संबंधित हो सकता है।
भाषा की स्थिति
खोईराओ को एक संकटग्रस्त भाषा माना जाता है। Glottolog के वर्तमान वर्गीकरण में थांगल नागा को Threatened श्रेणी में रखा गया है और उपलब्ध मूल्यांकन में इसकी स्थिति Vulnerable (भेद्य) बताई गई है।
भाषा के संकटग्रस्त होने के प्रमुख संकेतों में अपेक्षाकृत सीमित भाषाई समुदाय, दूसरी भाषाओं का बढ़ता प्रभाव तथा बहुभाषिकता शामिल हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार खोईराओ भाषी लोग मैतेई भाषा का भी दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं।
लेखन प्रणाली
खोईराओ को लिखने के लिए मैतेई लिपि के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। आधुनिक संदर्भों में समुदाय और क्षेत्र के अनुसार लेखन के तरीके में अंतर हो सकता है। भाषा के संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर लिखित सामग्री, शब्दकोश, व्याकरण तथा मौखिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण महत्वपूर्ण माना जाता है।
मौखिक परंपरा और संस्कृति
खोईराओ भाषा थांगल समुदाय की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है। लोककथाएँ, पारंपरिक ज्ञान, सामाजिक रीति-रिवाज, गीत और मौखिक इतिहास भाषा के माध्यम से पीढ़ियों तक पहुँचते हैं। इसलिए भाषा का संरक्षण केवल भाषाई विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि समुदाय की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
भाषाई अध्ययन
खोईराओ भाषा की संरचना और व्याकरण पर भाषावैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं। भाषा के व्याकरण, वाक्य-विन्यास तथा रूप-रचना से संबंधित शोध कार्यों में Thangal नाम का भी प्रयोग किया गया है।
संरक्षण
खोईराओ जैसी संकटग्रस्त भाषाओं के संरक्षण के लिए भाषा का दस्तावेजीकरण, बच्चों में मातृभाषा के प्रयोग को प्रोत्साहन, स्थानीय साहित्य का विकास तथा मौखिक परंपराओं का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना महत्वपूर्ण उपाय हैं।
संदर्भ
Glottolog — Thangal Naga.
Office of the Registrar General & Census Commissioner, India — Census of India, Mother Tongue Tables.
Chelliah, Shobhana L. — Is Manipur a linguistic area?
Thokchom, Chandramani Singh — The Structural Analysis of Thangal.
McDonough, Patricia — Topics in Thangal Morphosyntax.
यह भी देखें
मणिपुर की भाषाएँ
भारत की संकटग्रस्त भाषाएँ
सिनो-तिब्बती भाषाएँ
जेमिक भाषाएँ
भौगोलिक वर्गीकरण
नामकरण
क्षेत्रविस्तार
बोलियाँ
भाषा साहित्य
इन्हें भी देखें
भारत में संकटग्रस्त भाषाओं की सूची
भारत की भाषाएँ
भारत में स्थानीय वक्ताओं की संख्यानुसार भाषाओं की सूची
सन्दर्भ
श्रेणी:भारत की संकटग्रस्त भाषाएँ