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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

ईसुरी

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ईसुरी का जन्म चैत्र शुक्ल १० संवत १८९५ विक्रमी को उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के मऊरानीपुर के गांव मेंढ़की में हुआ था। उनका पूरा नाम हरताल ईसुरी था। इनके पिता का नाम भोलेराम अरजरिया था। वे कारिन्दा स्वरुप चतुर्भुज जमींदार के पास कार्य करते थे। उन्हें बगौरा बहुत प्रिय था। उनका निधन अगहन शुक्ल ६ संवत १९६६ विक्रमी सन १९०९ में हुआ था। भारतेन्दु युग के लोककवि ईसुरी पं गंगाधर व्यास के समकालीन थे और आज भी बुंदेलखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं। ईसुरी की रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति एवं सौंदर्य का वास्तविक चित्रण मिलता है। उनकी ख्‍याति फाग के रूप में लिखी गई उन रचनाओं के लिए हैं, जो विशेष रूप से युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुईं। ईश्वरी की रचनाओं के माध्यम से उनकी योग्यता, व्यावहारिक ज्ञान का बोध होता है। ईश्वरी की रचनाओं में निहित बुन्देली लोक जीवन की सरसता, मादकता और सरलता और रागयुक्त संस्कृति की रसीली रागिनी से मदमस्त करने की क्षमता है। ईश्वरी की रचनाएँ प्रगति वर्द्धक जीवन श्रंगार, सामाजिक परिवेश, राजनीति, भक्तियोग, संयोग, वियोग, लौकिकता, शिक्षा चेतावनी, काया, माया पर आधारित हैं।लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति, सम्पादक- डा॰ राजकुमार सिंह, संस्करण-प्रथम २०१२, प्रकाशक- आशीष प्रकाशन, कानपुर, पृष्ठ- २०५, ISBN : 978-81-89457-57-0 गौरी शंकर द्विवेदी ने उनकी फागों का प्रथम संकलन तैयार किया था। ईसुरी को बुंदेलखंड में जितनी ख्याति प्राप्त हुई उतनी किसी कवि की नहीं है। ग्राम्य संस्कृति का पूरा इतिहास केवल ईसुरी की फागों में मिलता है। उनकी फागों में प्रेम, शृंगार , करुणा, सहानुभूति, हृदय की कसक एवं मार्मिक अनुभूतियों का सजीव चित्रण है। ईसुरी की फागों में दिल को छूने और गुदगुदाने की अद्भुत क्षमता है। अपनी काल्‍पनिक प्रेमिका रजऊ को संबोधित करके लिखी गई रचनाओं के लिए ईसुरी को आलोचना और लोकनिंदा का सामना भी करना पड़ा। ईसुरी की फागों के अंश- ऐंगर बैठ लेओ कछु काने, काम जनम भर राने सबखौं लागौ रातु जिअत भर, जा नईं कभऊँ बड़ाने करियौ काम घरी भर रै के, बिगर कछू नइँ जाने ई धंधे के बीच ईसुरी, करत-करत मर जाने * * * * जो तुम छैल छला बन जाते, परे अँगुरियन राते मों पोंछत गालन के ऊपर, कजरा देत दिखाते घरी घरी घूघट खोलत में, नज़र सामने आते ईसुर दूर दरस के लाने, ऐसे काए ललाते सन्दर्भ ऐंगर बैठ लेओ कछु काने, काम जनम भर राने सबखौं लागौ रातु जिअत भर, जा नईं कभऊँ बड़ाने करियौ काम घरी भर रै के, बिगर कछू नइँ जाने ई धंधे के बीच ईसुरी, करत-करत मर जाने श्रेणी:बुंदेलखंडी कवि श्रेणी:लोक साहित्य श्रेणी:लोक जीवन श्रेणी:लोक संस्कृति श्रेणी:भारतीय संस्कृति