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411 REFERENCE · Wikipedia

व्युत्पत्ति (काव्यशास्त्र)

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काव्यशास्त्र के सन्दर्भ में व्युत्पत्ति , काव्य के तीन हेतुओं में से एक है। काव्य हेतु किसी कवि की वह शक्ति है जिससे वह काव्य रचना में समर्थ होता है। इसके अंतर्गत काव्य-सृजन की विविध प्रक्रियाओं का विवेचन किया जाता है। काव्य हेतु में 'हेतु' का अर्थ 'कारण' होता है, अतः इसे काव्य रचना का कारण भी कह सकते हैं। काव्य हेतु को 'काव्य कारण' कहने की भी परंपरा रही है। आचार्य वामन ने काव्य हेतु की जगह 'काव्यांग' शब्द का प्रयोग किया है। काव्य के मुख्यतः तीन हेतु माने गए हैं - प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास। कवि की नवोन्मेषशालिनी बुद्धि (innovative mind) को प्रतिभा कहते हैं — प्रज्ञा नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता। अभिनवगुप्त के अनुसार अपूर्व वस्तु के निर्माण में सक्षम बुद्धि ही प्रतिभा है — 'प्रतिभा अपूर्व वस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा'। इसके कारण कवि नवीन अर्थ से युक्त प्रसन्न पदावली की रचना करता है। व्युत्पत्ति, बहुज्ञता अथवा निपुणता को कहते हैं। शास्त्र तथा काव्य के साथ लोकव्यवहार का गहन पर्यालोचन करने के पश्चात कवि में यह गुण समाहित होता है। काव्य रचना की बारंबार आवृत्ति ही अभ्यास है। इसके कारण कवि की रचना परिपक्व और ऊर्जस्वित होती जाती है। संस्कृत आचार्यों ने व्युत्पत्ति को काव्य हेतु में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। इसके द्वारा कविताओं में उचित शब्दों का चुनाव की क्षमता उत्पन्न होती है। उत्पत्ति दो प्रकार की होती है- (१) शास्त्रीय (२) लौकिक रुद्रट ने अपने काव्यालंकार में व्युत्पत्ति के विषय में कहा है- छन्दोव्याकरणकलालोकस्थितिपदपदार्थविज्ञानात् । युक्तायुक्तविवेको व्युत्पत्तिरियं समासेन ॥ १८ ॥ अर्थात, छंद, व्याकरण, कला, लोकस्थिति, पद, और पदार्थ के विशिष्ट ज्ञान से उत्पन्न उचित विवेक ही व्युत्पत्ति है। सन्दर्भ इन्हें भी देखें काव्यशास्त्र काव्य हेतु व्युत्पत्ति (शब्दों की उत्पत्ति) श्रेणी:भारतीय काव्यशास्त्र