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जुर्गन हैबरमास
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जुर्गन हैबरमासJürgen Habermas Habermas10 (14298469242).jpg Habermas in 2014 y 1929 6 18 Düsseldorf, Rhine Province, Prussia, Germany Western philosophy Contemporary philosophy Continental philosophy Critical theory Neopragmatismhttps://www.iep.utm.edu/pragmati/ Pragmatism iep.utm.edu Internet Encyclopedia of Philosophy University of Bonn (PhD)University of Marburg (Dr. phil. hab.) Epistemology सामाजिक सिद्धान्त राजनीतिक दर्शन विधि दर्शन Rationalization व्यावहारिकतावाद Pragmatism Brave New World argument
Communicative action
Communicative rationality
Constitutional patriotism
Criticism of structuralism
Criticism of subject-centered reason
Deliberative democracy
Discourse ethics
The Enlightenment as an unfinished project
Instrumental and value-rational action
Monological-dialogical ethics distinctionAnders Bordum, "Immanuel Kant, Jürgen Habermas and the categorical imperative", Philosophy & Social Criticism 31(7), 2005.
Performative contradiction
Postsecularism
Post-metaphysical philosophy
Rational reconstruction
System–lifeworld distinction
Structural transformation of the public sphere
Universal pragmatics Jürgen Habermas signature.jpg Weber Durkheim Mead Freud Marx Dilthey Parsons Kant Schelling Hegel Kierkegaard Apel Heidegger Piaget Horkheimer Adorno Marcuse Wittgenstein Peirce Austin Abendroth Dewey Rawls Rorty BühlerChristian Damböck (ed.), Influences on the Aufbau, Springer, 2015, p. 258. Offe Honneth Forst Gould McCarthy Hoppe Benhabib Fraser Friedman Kompridis Wilber Lafont Ute Wesselhöft
श्रेणी:हस्ताक्षरित जीवनी
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जुरगेन हैबरमास ( जन्म 18 जून 1929) आलोचनात्मक सिद्धांत और व्यावहारिकता (प्रैग्मटिज्म) की परम्परा में एक जर्मन दार्शनिक और समाजशास्त्री हैं। उनकी कृतियाँ संचार तर्कसंगतता और सार्वजनिक क्षेत्र से सम्बन्धित हैं।
हैबरमास के विचार
हैबरमास फ्रैंकफर्ट स्कूल की दूसरी पीढ़ी के विचारक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनका लेखन बहुत समृद्ध था। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जन आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी करते हैं। हैबरमास का सिद्धान्त है कि आज के प्रजातान्त्रिक, दफ्तरशाही तथा वैज्ञानिक संस्कृति प्रधान समाज में स्वतन्त्र संवाद की बहुत बड़ी आवश्यकता है तथा वे आग्रह करते हैं कि इस संवाद का आधार बुद्धिसंगत, होना चाहिए। वह व्यवहार या आचरण के सिद्धान्त के साथ जोड़ना चाहते हैं परम्परा वास्तव में मार्क्सवादी ही है। जीवन विश्व एवं व्यवस्था पर अपने विचार स्पष्ट करते समय हैबरमास ने एक नई मानवतावादी परम्परा का विकास करने का प्रयास किया है। उनकी मानवतावादी परम्परा में हीगल और मार्क्स के कार्यों पर पर्याप्त जोर दिया गया है।
हैबरमास का कहना है कि उन्नत औद्योगिक समाज के मौलिक अन्तर्विरोधों को पूजीवाद से सम्बन्धित कट्टर मार्क्सवादी सिद्धान्त के आधार पर समझ पाना कठिन है। इसी कारण उन्होंने अपने सिद्धान्त में पँजीवादी समाजो का तीन प्रकारों में बाँटा है।
(१) उदार पंजीवाद (Liberal Capitalism), जो उन्नीसवीं शताब्दी का पूँजावाद है और जिसके बारे में स्वयं मार्क्स ने भी अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है।
(२) संगठित पूंजीवाद (Syndicate Capitalism), जिसे हैबरमास ने पश्चिमी औद्योगीकृत समाजों की विशेषता कहा है।
(३) उत्तर पूँजीवाद (Post Capitalism), जिसे उसने समाजवादी राज्यों समाजों को उत्तर पूँजीवादी समाज कहा है।
हैबरमास ने कार्ल मार्क्स के समान ही स्वीकार किया है कि इन तीनों प्रकार की पूँजीवादी सामाजिक व्यवस्थाओं में जो अन्तर्विरोध निहित है, वे ही उनको विघटन तथा परिवर्तन की दिशा में ले जायेंगे। ऐसे परिवर्तनों को लाने में व्यक्तियों के विचार जागरूकता तथा उनकी सामाजिक भूमिका महत्वपूर्ण घटक सिद्ध होंगे।
हैबरमास का सिद्धान्त निर्माण का अधिगम/उपागम
हैबरमास के सिद्धान्त की रणनीति का आधार ज्ञान है। मनुष्य के विकास के लिए ज्ञान की प्राप्ति सर्वप्रथम आवश्यकता है। इस दृष्टि से समाज विज्ञानों में तीन प्रकार के सिद्धान्त हैं। तीनों प्रकार के सिद्धान्त संज्ञान के हेतुओं पर आधारित हैं। संज्ञान एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से अपने समाज के बारे में बोध ग्रहण करते हैं। उदाहरणार्थ, यदि हम अपने सामान पर ध्यान न रखें, तो कोई भी उसे उठाकर रफूचक्कर हो सकता है। यह हमारा इन्द्रियों द्वारा किया गया बोध है। इसी बोध के द्वारा हम अपना निर्णय लेते हैं। हैबरमास ने इसे ‘संज्ञान हेतु’ कहा है, जिसे ज्ञान सिद्धान्त के इन तीनों प्रकारों में देखा जाता है। यह ज्ञान तीन प्रकार का है –
उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम ज्ञान को विकसित करते हैं, जिसे ‘आनुभविक विश्लेषणात्मक सिद्धान्त’ (Empica-analytic Theories) कहते हैं। यह ज्ञान प्रत्यक्षवादी है, जो संचार के माध्यम से सम्पूर्ण समाज में आ जाता है। यह मनुष्य के विकास में बड़ा लाभकारी होता है।
ज्ञान हमारे व्यावहारिक हितों की पूर्ति करता है। यह ज्ञान दैनिक जीवन की आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है। तकनीकी भाषा में हैबरमास ने इसे ‘भाष्य विज्ञान (Hermenatic) कहा है। यह हमारी अन्तक्रियाओं में काम आता है। हम अन्तक्रियाओं को भाषा के माध्यम से समझते हैं। प्रतीकात्मक अन्तक्रियाएँ, एथनोमेथडोलॉजी, उत्तर-संरचनावाद, आदि भाष्य विज्ञान के ही उदाहरण हैं।
ज्ञान उद्धारक होता है। हैबरमास के अनुसार, व्यावहारिक ज्ञान एक तीसरे हेतु से जन्म देता है, जिसे उद्धारक ज्ञान (Emancipatory knowledge) कहते है। इसका सम्बन्ध भी अन्तर्क्रिया और संचार से होता है। यही ज्ञान विवेचनात्मक (Critical) सिद्धान्तों को जन्म देता है। इसमें हम अन्तर्क्रियाओं का लाभ प्राप्त करके समाज का अहित करते है। यह ज्ञान अपने स्वरूप में भ्रष्ट होता है। अहित का हेतु शक्ति के माध्यम से पूरा होता है। इसीलिए शक्ति की प्राप्ति के लिए समाज में संघर्ष होता है।
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