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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

विद्यारंभ संस्कार

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thumb|260x260px|नवरात्रि के अवसर पर विद्यारम्भ संस्कार आरम्भ करने के पहले एक मलयाली शिशु ब्राह्मण के गोद में बैट्ःई हुई जब बालक/ बालिका की आयु शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाय, तब उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। इसमें समारोह के माध्यम से जहाँ एक ओर बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा किया जाता है, वही अभिभावकों, शिक्षकों को भी उनके इस पवित्र और महान दायित्व के प्रति जागरूक कराया जाता है कि बालक को अक्षर ज्ञान, विषयों के ज्ञान के साथ श्रेष्ठ जीवन के सूत्रों का भी बोध और अभ्यास कराते रहें। व्याख्या संस्कार का प्रयोजन प्रत्येक अभिभावक का यह परम पुनीत धर्म र्कत्तव्य है कि बालक को जन्म देने के साथ-साथ आई हुई जिम्मेदारियों में से भोजन, वस्त्र आदि की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति होने पर उसकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध करे। जिस प्रकार कोई माता-पिता जन्म देने के बाद उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी से इंकार कर उसे कहीं झाड़ी आदि में फेंक दें, तो वे अपराधी माने जायेंगे। ठीक उसी प्रकार जो लोग बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध न करके, उन्हें मानसिक विकास एवं मानव जाति की संगृहित ज्ञान-सम्पत्ति का साझेदार बनने से वंचित रखते हैं, वे भी उसी श्रेणी के अपराधी हैं, जैसे कि बच्चों को भूखों मार डालने वाले। इस पाप एवं अपराध से मुक्ति पाने के लिए हर अभिभावक को अपने हर बच्चे की शिक्षा का चाहे वह लड़की हो या लड़का, अपनी सामर्थ्यानुसार पूरा-पूरा प्रबंध करना होता है। इस धर्म र्कत्तव्य की पूर्ति का, अनुशासन का पालन करते हुए उसे अपने उत्तरदायित्व को निभाने की घोषणा के रूप में बालक का विद्यारम्भ संस्कार करना पड़ता है। देवताओं की साक्षी में समाज को यह बताना पउ़ता है कि मैं अपने परम पवित्र र्कत्तव्य को भूला नहीं हूँ, वरन् उसकी पूतिर् के लिए समुचित उत्साह के साथ कटिबद्ध हो रहा हूँ। ऐसा ही प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए। किसी को भी अपनी सन्तान को विद्या से वंचित नहीं रहने देना चाहिए। विद्यारम्भ संस्कार द्वारा बालक-बालिका में उन मूल संस्कारों की स्थापना का प्रयास किया जाता है, जिनके आधार पर उसकी शिक्षा मात्र ज्ञान न रहकर जीवन निमार्ण करने वाली हितकारी विद्या के रूप में विकसित हो सके। समारोह द्वारा बालक के मन में ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्साह पैदा किया जाता है। उत्साह भरी मनोभूमि में देवाराधन तथा यज्ञ के संयोग से वांछित ज्ञानपरक संस्कारों का बीजारोपण भी सम्भव हो जाता है। विशेष व्यवस्था विद्यारम्भ संस्कार के लिए सामान्य तैयारी के अतिरिक्त नीचे लिखी व्यवस्थाएँ पहले से ही बना लेनी चाहिए। पूजन के लिए गणेशजी एवं माँ सरस्वती के चित्र या प्रतिमाएँ। पूजन के लिए पट्टी, दवात और लेखनी। बच्चे को लिखने में सुविधा हो, इसके लिए स्लेट, खड़िया भी रखी जा सकती है। गुरु पूजन के लिए प्रतीक रूप में नारियल रखा जा सकता है। बालक के शिक्षक प्रत्यक्ष में हों, तो उनका पूजन भी कराया जा सकता है। गणेश एवं सरस्वती पूजन शिक्षण एवं प्रेरणा गणेश को विद्या और सरस्वती को शिक्षा का प्रतीक माना गया है। विद्या और शिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अधूरी है। शिक्षा उसे कहते हैं कि जो स्कूलों में पढ़ाई जाती है। भाषा, लिपि, गणित, इतिहास, शिल्प, रसायन, चिकित्सा, कला, विज्ञान आदि विभिन्न प्रकार के भौतिक ज्ञान इसी क्षेत्र में आते हैं। शिक्षा से मस्तिष्क की क्षमता विकसित होती है और उससे लौकिक सम्पत्तियों, सुविधाओं, प्रतिष्ठाओं एवं अनुभूतियों का लाभ मिलता है। सांसारिक जीवन की सुख-सुविधा के लिए इस प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता भी है। यह सरस्वती आराधना है। विद्या के प्रतिनिधि गणेश जी हैं। विद्या का अर्थ है विवेक एवं सद्भाव की शक्ति। सद्गुण इसी वगर् में गिने जाते हैं। उचित और अनुचित का, कर्त्तव्य और अकत्तर्व्य का विवेक विद्वानों को ही होता है। आज के छोटे से लाभ-हानि की तुलना में वे दूरवर्त्ती हानि-लाभ को महत्त्व देते हैं और इतना साहस और धैर्य बनाये रहते हैं। जिसके आधार पर दूरवर्ती बड़े लाभ के लिए वतर्मान में थोड़ा कष्ट सह सकें अथवा भविष्य की अधिक हानि को कठिनाइयों का स्वरूप समझते हुए आज के छोटे-मोटे प्रलोभन या आकषर्ण का परित्याग कर सकें। विचारों और वर्णों को सुव्यवस्थित बनाने के लिए किया हुआ श्रम-गणेश की आराधना के लिए किया गया तप ही मानना चाहिए। आदर्शवादिता की उच्चस्तरीय सद्भावनाओं का समावेश जिस विचारणा में सन्निहित हो, उन्हें गणेश कहना चाहिए। गणेश के बाद सरस्वती का पूजन कराया जाता है। गणेश का स्थान प्रथम और सरस्वती का दूसरा है। भावना को प्रधान और चतुरता को गौण माना गया है। शिक्षा के, चतुरता के ऊपर विवेक एवं आदशर् को अंकुश लिए हुए देखा जा सकता है। धर्म, कर्त्तव्य एवं औचित्य का, गणेश का नियन्त्रण हमारी सारी गतिविधियों पर होना चाहिए। अन्यथा वे निरंकुश होकर उच्छृंखलता बरतेंगी और पतन के गहन गर्त में गिरा देंगी। बालक चाहे जितनी विद्या पढ़े, विद्वान् और क्रियाकुशल कितना ही अधिक क्यों न हो जाए, उसे आजीवन यह स्मरण रखना चाहिए कि सदुद्देश्य से एक कदम भी विचलित न हुआ जाए। समृद्धियों एवं विभूतियों को तनिक भी उच्छृंखल न होने दिया जाए। शिक्षा और बुद्धि का दुरुपयोग न होने पाए। उनके द्वारा जो भी प्रगति हो, वह पतन की ओर नहीं, उत्थान की ओर ही ले जाने वाली हो। मस्तिष्क पर सदैव विवेक का नियन्त्रण बना रहे, इस तथ्य को हृदय में प्रतिष्ठापित करने के लिए बालक विद्यारम्भ के समय गणेश पूजन करता है। माता का स्नेह जिस प्रकार पुत्र के लिए आजीवन आवश्यक है, उसी प्रकार विद्या का, सरस्वती का अनुग्रह भी मनुष्य पर आजीवन रहना चाहिए। सरस्वती माता हमारी प्रत्यक्ष देवी हैं-अध्ययन के द्वारा ही उनकी आराधना होती है। उपासना, आहार, स्नान, शयन आदि की तरह अध्ययन भी हमारे दैनिक जीवन में आवश्यकता का एक अंग बना रहे, तो समझना चाहिए कि सरस्वती पूजन का वास्तविक तात्पयर् समझ लिया गया। गणेश पूजन क्रिया और भावना बालक के हाथ में अक्षत, पुष्प, रोली देकर मन्त्र के साथ गणपति जी के चित्र के सामने अर्पित कराएँ। भावना करें कि इस आवाहन-पूजन के द्वारा विवेक के अधिष्ठाता से बालक की भावना का स्पर्श हो रहा है। उनके अनुग्रह से बालक मेधावी और विवेकशील बनेगा। ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे, निधीनां त्वा निधिपति हवामहे, वसोमम। आहमजानि गभर्धमात्वमजासि गभर्धम्। ॐ गणपतये नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥ -२३.१९ सरस्वती पूजन क्रिया और भावना बालक के हाथ में अक्षत, पुष्प, रोली आदि देकर मन्त्र बोलकर माँ सरस्वती के चित्र के आगे पूजा भाव से समपिर्त कराएँ। भावना करें कि यह बालक कला, ज्ञान, संवेदना की देवी माता सरस्वती के स्नेह का पात्र बन रहा है। उनकी छत्रछाया का रसास्वादन करके यह ज्ञानाजर्न में सतत रस लेता हुआ आगे बढ़ सकेगा। ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिवार्जिनीवती। यज्ञं वष्टुधियावसुः। ॐ सरस्वत्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -२०.८४ उपकरणों - माध्यमों की पवित्रता गणेश और सरस्वती पूजन के उपरान्त शिक्षा के उपकरणों- दवात, कलम और पट्टी का पूजन किया जाता है। शिक्षा प्राप्ति के लिए यह तीनों ही प्रधान उपकरण हैं। इन्हें वेदमंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है, ताकि उनका प्रारम्भिक प्रभाव कल्याणकारी हो सके। विद्या प्राप्ति में सहायता मिल सके। मन्त्रों से इन तीनों को पवित्र अभिमन्त्रित किया जाता है, ताकि इन उपकरणों में पवित्रता स्थिर रखी जा सके। उपकरणों की पवित्रता हर कार्य में आवश्यक है। साधन पवित्र होंगे, तो ही साध्य की उत्कृष्टता कायम रखी जा सकेगी। गलत उपायों से, दूषित उपकरणों से यदि कोई सफलता प्राप्त कर भी ली जाए, तो उस सफलता का लाभ उतना सुखप्रद नहीं होता, जितना कि अनुपयुक्त माध्यमों को अपनाने में बिगड़ा अपना स्वभाव अपने लिए दूरगामी अहित एवं अनिष्ट उत्पन्न करता है। जिस प्रकार स्वच्छ बर्तन में रखा हुआ दूध ही पीने योग्य होता है, मैले-गन्दे बतर्न में रखने से वह फट जाता है और पीने पर रोग विकार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अनुपयुक्त उपकरणों से जो भी कार्य किया जाता है, वह बाहर से कितना ही अच्छा क्यों न दीखता हो, कितना ही जल्दी सफल क्यों न हुआ हो, अवांछनीय है। विद्यारम्भ संस्कार का प्रयोजन यह है कि शिक्षार्थी का ध्यान विद्या की महत्ता एवं उपकरणों की पवित्रता की ओर आकर्षित किया जाए। अध्ययन तो निमित्त मात्र है, वस्तुतः उपकरणों की पवित्रता यह एक आदशर् दृष्टिकोण है, जिसे हर क्षेत्र में अपनाया जाना चाहिए। हम जो कुछ भी कार्य, व्यवहार एवं प्रयोग करें, उसमें इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखें कि किसी प्रलोभन या जल्दबाजी में अनुपयुक्त साधनों का उपयोग न किया जाए। अपना हर उपकरण पूरी तरह पवित्र रहे। शिक्षा की तीन अधिष्ठात्री देवियाँ- उपासना विज्ञान की मान्यताओं के आधार पर कलम की अधिष्ठात्री देवी 'धृति' दवात की अधिष्ठात्री देवी 'पुष्टि' और पट्टी की अधिष्ठात्री देवी 'तुष्टि' मानी गई है। षोडश मातृकाओं में धृति, पुष्टि तथा तुष्टि तीन देवियाँ उन तीन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो विद्या प्राप्ति के लिए आधारभूत हैं। विद्यारम्भ संस्कार में कलम-पूजन का मन्त्र बोलते समय धृति का आवाहन करते हैं। निधार्रित मन्त्रों में उन्हीं की वन्दना, अभ्यथर्ना की गयी है। लेखनी पूजन शिक्षण और प्रेरण ‍विद्यारम्भ करते हुए पहले कलम हाथ में लेनी पड़ती है। कलम की देवी धृति का भाव है 'अभिरुचि'। विद्या प्राप्त करने वाले के अन्तःकरण में यदि उसके लिए अभिरुचि होगी, तो प्रगति के समस्त साधन बनते चले जायेंगे। बिना रुचि जाग्रत् हुए पढ़ना ही नहीं, कोई भी काम भार रूप प्रतीत होता है, उसमें मन नहीं लगता, अधूरे मन से किये हुए काम तो अस्त-व्यस्त एवं बेतुके रहते हैं। ऐसी दशा में कोई उल्लेखनीय सफलता भी नहीं मिलती। तीव्र बुद्धि और बढ़िया मस्तिष्क भी तब कुछ विशेष उपयोगी सिद्ध नहीं होते, किन्तु यदि पढ़ने में तीव्र अभिरुचि हो, तो मन्द बुद्धि भी अपने अध्यवसाय के बल पर आश्शाजनक प्रगति कर लेते हैं। अभिभावकों को कर्त्तव्य है कि शिक्षार्थी की अभिरुचि जगाएँ, उसे विद्या प्राप्ति के लाभ बताएँ। उनके उदाहरण सुनाएं, जो पढ़े-लिखे होने के कारण ऊँची स्थिति प्राप्त करने में धन, यश एवं सुविधा-साधन उपाजिर्त कर सकने में सफल हुए। साथ ही ऐसे उदाहरण भी सुनाने चाहिए, जिनमें पारिवारिक सुख साधनों से सन्तुष्ट लड़कों ने पढ़ने में उपेक्षा की और अंत में साधन जब बिखर गये, तब उन्हें अपने अशिक्षित, अविकसित व्यक्तित्व के आधार पर जीवन-यापन के साधन जुटाने में कितनी कठिनाई उठानी पड़ी। शिक्षा मनुष्यत्व का सम्मान है और अशिक्षित होना अपमान। अशिक्षित या स्वल्प शिक्षित रहना किसी व्यक्ति के पारिवारिक या व्यक्तित्व स्तर के गिरे हुए होने का ही प्रमाण माना जाता है। इस अपमान से हर किसी को बचना व बचाया जाना चाहिए। 'धृति' की अभियोजना कलम का पूजन कराते समय इस प्रकार की जाए कि शिक्षार्थी की अभिरुचि अध्ययन में निरन्तर बढ़ती चली जाए। क्रिया और भावना पूजन सामग्री बालक के हाथ में दी जाए। पूजा की चौकी पर स्थापित कलम पर उसे मन्त्र के साथ श्रद्धापूवर्क चढ़ाया जाए। भावना की जाए कि धृति शक्ति बालक की विद्या के प्रति अभिरुचि को परिष्कृत कर रही है। ॐ पुरुदस्मो विषुरूपऽ इन्दुः अन्तमर्हिमानमानंजधीरः। एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीम्, अष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ता स्वाहा। -८.३० दवात पूजन शिक्षण और प्रेरणा कलम का उपयोग दवात के द्वारा होता है। स्याही या खड़िया के सहारे ही कलम कुछ लिख पाती है। इसलिए कलम के बाद दवात के पूजन का नम्बर आता है। दवात की अधिष्ठात्री देवी 'पुष्टि' हैं। पुष्टि का भाव है-एकाग्रता। एकाग्रता से अध्ययन की प्रक्रिया गतिशील-अग्रगामिनी होती है। कितने ही व्यक्ति तीव्र बुद्धि के होते हैं, मस्तिष्क बढ़िया काम करता है, पढ़ना भी चाहते हैं, पर मन अनेक दिशाओं में भागा फिरता है, एकाग्र नहीं होता, चंचलता भरी रहती है, प्रस्तुत विषय में चित्त जमता नहीं। ऐसे डावाँडोल मन वाले शिक्षार्थी की प्रगति संदिग्ध बनी रहती है। जब चित्त लगेगा ही नहीं, तो मस्तिष्क पकड़ेगा क्या? आरम्भ में मन्द बुद्धि समझे जाने वाले शिक्षार्थी आगे चलकर बहुत ही प्रतिभावान सिद्ध होते हुए भी देखे गये हैं। आश्चयर्जनक परिवर्तन के पीछे उनकी एकाग्रता ही प्रधान कारण होती है। दवात के कंठ में कलावा बाँधा जाता है व रोली, धूप, अक्षत, पुष्प आदि से पूजन किया जाता है। यह दवात की अधिष्ठात्री देवी 'पुष्टि' का अभिवन्दन है। इस पूजा का प्रयोजन यह है कि शिक्षार्थी को एकाग्रता का महत्त्व समझाया जाना चाहिए और इसका उसे व्यावहारिक अभ्यास भी कराया जाना चाहिए। समुचित मात्रा में अभिरुचि हो और साथ ही एकाग्रता का अभ्यास हो जाए, तो फिर विद्या लाभ की दिशा में आशाजनक सफलता सम्भव हो जाती है। क्रिया और भावना पूजा वेदी पर स्थापित दवात पर बालक के हाथ से मन्त्रोच्चार के साथ पूजन सामग्री अपिर्त कराई जाए। भावना की जाए कि पुष्टि शक्ति के सान्निध्य से बालक में बुद्धि की तीव्रता एवं एकाग्रता की उपलब्धि हो रही है । ॐ देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीवर्योधसं, पतिमिन्द्रमवद्धर्यन्। जगत्या छन्दसेन्दि्रय शूषमिन्द्रे, वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज॥ -२८.४१ पट्टी पूजन शिक्षण और प्रेरणा उपकरणों में तीसरा पूजन पट्टी का है। कलम, दवात की व्यवस्था हो जाने पर उसका उपयोग पट्टी या कापी-कागज पर ही होता है, इनकी अधिष्ठात्री 'तुष्टि' है। तुष्टि का भाव है-श्रमशीलता। अध्ययन के लिए श्रम की भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी की अभिरुचि एवं एकाग्रता की। किसी छात्र की पढ़ने में अभिरुचि भी है, चित्त भी एकाग्र कर लेता है, पर आलसी स्वभाव होने के कारण परिश्रम नहीं करता, जल्दी ऊब जाता है और पढ़ाई बन्द करके दूसरे काम में लग जाता है, तो देर तक लगातार मेहनत न करने का दुर्गुण उसकी अन्य विशेषताओं पर पानी फेर देता है। जिस प्रकार भौतिक निमार्णात्मक कार्यों की सफलता शारीरिक श्रम पर निभर्र रहती है, उसी तरह मानसिक उपलब्धियाँ, मानसिक श्रम पर अवलम्बित हैं। श्रम के बिना इस संसार में कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। साधन कितने ही प्रचुर एवं प्रखर क्यों न हों, उनका लाभ तो तभी मिलेगा, जब उनका उपयोग किया जायेगा। उपयोग में श्रम उपेक्षित है। इसलिए शिक्षार्थी को परिश्रमी भी होना चाहिए। उसे पढ़ने में जी लगाकर मेहनत करने का अभ्यास बनाना चाहिए। यह आदत जिस प्रकार पड़े, उसका उपाय अभिभावकों को करना चाहिए। पट्टी, दवात, कलम तीनों उपकरणों का पूजन करने के साथ-साथ यह तथ्य भी हृदयंगम किया जाता है कि हमारे सभी साधन पवित्र हों। विद्या भी पवित्र साधनों से पवित्र उद्देश्यों की पूतिर् के लिए प्राप्त की जाए। अभिरुचि एकाग्रता और श्रमशीलता का आधार लेकर विद्या लाभ के महत्त्वपूर्ण मार्ग पर बढ़ा जाए। क्रिया और भावना बालक द्वारा मन्त्रोच्चार के साथ पूजा स्थल पर स्थापित पट्टी पर पूजन सामग्री अपिर्त कराई जाए। भावना की जाए कि इस आराधना से बालक तुष्टि शक्ति से सम्पकर् स्थापित कर रहा है। उस शक्ति से परिश्रम, साधना करने की क्षमता का विकास होगा। ॐ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां, पतनी सुकृतं बिभर्ति। अपारसेन वरुणो न साम्नेन्द्र, श्रियै जनयन्नप्सु राजा॥ - १९.९४ ॥ गुरु पूजन शिक्षण और प्रेरणा शिक्षा प्राप्ति के लिए अध्यापक के सान्निध्य में जाना पड़ता है। जिस प्रकार गौ अपने बछड़े को दूध पिलाती है, उसी तरह गुरु अपने शिष्य को विद्या रूपी अमृत पिलाते हैं। इस प्रक्रिया में परस्पर श्रद्धा-सद्भावना को होना आवश्यक है। गाय और बछड़े के बीच प्रेम न हो, तो दूध पिलाने की प्रक्रिया कैसे चले? इसी प्रकार शिक्षार्थी के प्रति वात्सल्य न रखे, तो ऊपरी मन से रुखाई के साथ सिखाने का कार्य सारहीन ही रहेगा। जिस प्रकार गाढ़ी कमाई का पैसा ही फलता-फूलता है, उसी प्रकार गुरु के प्रति श्रद्धा, सद्भावना रखकर उसका स्नेह वात्सल्य प्राप्त करते हुए जो सीखा जाता है, वह जीवन में लाभदायक सिद्ध होता है। परस्पर उपेक्षा, उदासीनता अथवा मनोमालिन्य, तिरस्कार के भाव रखकर सिखाने से एक तो विद्या आती ही नहीं, यदि आती भी है, तो वह फलती-फूलती नहीं। माता-पिता की तरह गुरु का भी स्थान है। माता को ब्रह्मा, पिता को विष्णु और गुरु को महेश कहा गया है। वह तीनों ही देवताओं की तरह श्रद्धा, सम्मान के पात्र हैं। अतएव विद्यारम्भ संस्कार में गुरु पूजन को एक अंग माना गया है। कलम, दवात, पट्टी का पूजन करने के उपरान्त शिक्षा आरम्भ करने वाले गुरु को पुष्प, माला, कलावा, तिलक, आरती, फल आदि की श्रद्धांजलि अपिर्त करते हुए पूजन कर नमस्कार करना चहिए। इस पूजन का प्रयोजन है कि शिक्षार्थी अपने शिक्षकों के प्रति पिता जैसी श्रद्धा रखें, उन्हें समय-समय पर प्रणाम, अभिवादन करे, समुचित शिष्टाचार बरते, अनुशासन माने और जैसा वे निदेर्श करें, वैसा आचरण करे। अपने परिश्रम और शिष्टाचार से उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयतन करे। इसी प्रकार अध्यापक का भी कत्तर्व्य है कि वह शिक्षार्थी को अपने पुत्र की तरह समझें, उसे अक्षर ज्ञान ही नहीं, स्नेह, सद्भाव, वात्सल्य भी प्रदान करें। क्रिया और भावना मन्त्र के साथ बालक द्वारा गुरु के अभाव में उनके प्रतीक का पूजन कराया जाए। भावना की जाए कि इस श्रद्धा प्रक्रिया द्वारा बालक में वे शिष्योचित गुण विकसित हो रहे हैं। जिनके आधार पर शिष्य भी धन्य हो जाता है और गुरु भी। गुरु तत्त्व की कृपा भाजन बालक बना रहे। ॐ बृहस्पते अति यदयोर्ऽ, अहार्द्द्युमद्विभाति क्रतुमज्ज्ानेषु, यद्दीदयच्छवसऽ ऋतप्रजात, तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्। उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतये, त्वैष ते योनिबृर्हस्पतये त्वा॥ ॐ श्री गुरवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -२६.३, तैत्ति०सं० १.८.२२.१२। अक्षर लेखन एवं पूजन शिक्षण और प्रेरणा इसके पश्चात् पट्टी पर बालक के हाथ से 'ॐ भूभुर्वः स्वः' शब्द लिखाया जाए। खड़िया से उन अक्षरों को अध्यापक बना दें और बालक उस पर कलम फेरकर अक्षर बना दे अथवा अध्यापक और छात्र दोनों कलम पकड़ लें और उपरोक्त पंचाक्षरी गायत्री मन्त्र को पट्टी पर लिख दें। ॐ परमात्मा का सवर्श्रेष्ठ नाम है, भूः भुवः स्वः के यों अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक अर्थ हैं, पर विद्यारम्भ संस्कार में उनके गुण बोधक अर्थ ही व्याख्या योग्य हैं। भूः का तात्पर्य श्रम, भुवः का संयम और स्वः का विवेक है। शिक्षा का प्रयोजन इन तीन महान प्रवृत्तियों को जाग्रत्, समुन्नत करना ही है। शिक्षित व्यक्ति यदि परिश्रमी, संयमी और विवेकवान् है, तो समझना चाहिए कि उसका पढ़ना साथर्क हुआ, अन्यथा पढ़े गधे, तो लगभग करोड़ों गली-कूचों से भरे पड़े हैं, वे अधिक पैसा बनाने और अधिक खुराकात करने के अतिरिक्त और कुछ बड़ी बात कर नहीं पाते। विद्यारम्भ करते हुए सबसे प्रथम यह पाँच अक्षर इसलिए लिखाये जाते हैं कि बालक ॐ परमात्मा को अपनी मनोभूमि में सवोर्परि स्थान दे। आस्तिक बने, ईश्वर से डरे, सदाचारी बने, निरालस्य कमर्रत रहे, संयम और व्यवस्था का कदम-कदम पर ध्यान रखे, भ्रान्तियों से बचकर विवेक को अपनाये और हँसते-खेलते दूसरों को प्रसन्न रखते हुए जीवन व्यतीत करे। यही पंचाक्षरी प्रशिक्षण शिक्षा के उद्देश्य का सार है। विद्या उसी का नाम है, जो मनुष्य के सद्गुणों को बढ़ाए। ॐ भूभुर्वः स्वः का सवर्प्रथम लेखन विद्यारम्भ संस्कार के समय इसी दृष्टि से कराया जाता है। क्रिया और भावना अक्षर लेखन करा लेने के बाद उन पर अक्षत, पुष्प छुड़वाएँ। ज्ञान का उदय अन्तःकरण में होता है, पर यदि उसकी अभिव्यक्ति करना न आए, तो भी अनिष्ट हो जाता है। ज्ञान की प्रथम अभिव्यक्ति अक्षरों को पूजकर अभिव्यक्ति की महत्ता और साधना के प्रति उमंग पैदा की जाए '''। ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च, नमः शंकराय च मयस्कराय च, नमः शिवाय च शिवतराय च।''' - १६.४१ इसके बाद अग्नि स्थापन से लेकर गायत्री मन्त्र की आहुति तक का क्रम चले। बालक को भी उसमें सम्मिलित रखें। विशेष आहुति हवन सामग्री में कुछ मिष्टान्न मिलाकर पाँच आहुतियाँ निम्न मन्त्र से कराएँ। भावना करें, यज्ञीय ऊर्जा बालक के अन्दर संस्कार द्वारा पड़े प्रभाव को स्थिर और बलिष्ठ बना रही है। ॐ सरस्वती मनसा पेशलं, वसु नासत्याभ्यां वयति दशर्तं वपुः। रसं परिस्रुता न रोहितं, नग्नहुधीर्रस्तसरं न वेम स्वाहा। इदं सरस्वत्यै इदं न मम। -१९.८३ विशेष आहुति के बाद यज्ञ के शेष कर्म पूरे करके आशीर्वचन, विसर्जन एवं जयघोष के बाद प्रसाद वितरण करके समापन किया जाए। विद्यारम्भ के प्रमुख स्थल या क्षेत्र कॊल्लूर् मूकांबिक क्षेत्रं, कर्नाटक तुञ्चन् पऱम्प्, तिरूर पनच्चिक्काट् दक्षिण मूकांबिक क्षेत्रं, कोट्टयम् (चिङ्ङवनत्तिन् अटुत्त्) चोऱ्‌ऱानिक्कर भगवति क्षेत्रं, ऎरणाकुळम् मूकांबिक सरस्वति क्षेत्रं, वटक्कन् पऱवूर् पूजप्पुर सरस्वति क्षेत्रं, तिरुवनन्तपुरं पालक्काट् हेमांबिक देवि क्षेत्रं, कल्लेक्कुळङ्ङर ञाङाट्टिरि भगवति क्षेत्रं, पट्टाम्पि, पालक्काट् (वळ्ळुवनाटन् मूकांबिक) आऱ्‌ऱुकाल् भगवति क्षेत्रं, तिरुवनन्तपुरं ऎऴुकोण् मूकांबिक क्षेत्रं, कॊल्लं तिरुवुळ्ळक्काव् श्री धर्मशास्त क्षेत्रं, तृश्शूर् गुरुवायूर् श्रीकृष्ण क्षेत्रं, तृश्शूर् कुमारनॆल्लूर् भगवति क्षेत्रं, कोट्टयं त्रिक्काव् श्रीदुर्ग्गा क्षेत्रं, पॊन्नानि आवणंकोट् सरस्वति क्षेत्रं आलुव पॆरुम्पावूर्,अकनाट्#कुट्टनॆल्लूर्दुर्ग्गाक्षेत्रं, मृदंगशैलेश्वरि क्षेत्रं, कण्णूर् पळ्ळिक्कुन्न् मूकांबिक क्षेत्रं, कण्णूर् ऎळम्पाऱ श्री दुर्ग्ग भगवति क्षेत्रं (कण्णूर् ऎयर्पोर्ट्टिनु समीपं) तट्टारम्पलं सरस्वति क्षेत्रं, मावेलिक्कर, आलप्पुऴ जिल्ल आवणंकोट् सरस्वति क्षेत्रं, आलुव पन्तळं पाट्टुपुरक्काव् श्रीसरस्वती क्षेत्रं (कुऱुन्तोट्टयं कवलय्क्कु समीपं), पत्तनंतिट्ट कॊट्टारक्कर महागणपति क्षेत्रं, कॊल्लं जिल्ल शिवगिरि शारदामठं सरस्वति क्षेत्रं, वर्क्कल चक्कुळत्तुकाव् भगवति क्षेत्रं, नीरेऱ्‌ऱुपुरं, आलप्पुऴ काटाम्पुऴ भगवति क्षेत्रं, मलप्पुऱं वटक्कुंकूर् मूकांबिक क्षेत्रं, वैक्कं, कोट्टयं पूताटि सरस्वति क्षेत्रं, वयनाट् अन्तिक्काट् मूकांबिक क्षेत्रं, तृशूर् पॆरुम्पिळ्ळि लक्ष्मिविनायक सरस्वति क्षेत्रं, आऱाट्टुपुऴ, आलप्पुऴ पाऱश्शेरि मूकांबिक भगवति क्षेत्रं, पॆरिङ्ङोट्, पालक्काट् इन्हें भी देखें उपनयन संस्कार विजयादशमी नवरात्रि बाहरी कड़ियाँ गायत्री शांतिकुंज की ओर से श्रेणी:हिन्दू संस्कार