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411 समाचार
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यम द्वितीया

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भ्रातृ द्वितीया (भाई दूज) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला हिन्दू धर्म का पर्व है जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं। यह दीपावली के दो दिन बाद आने वाला ऐसा पर्व है, जो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं। यम द्वितीया Celebration of Kijapuja in Nepal by Newar people.jpg भाई दूज नेपालके नेवार समुदाय द्वारा मनाते हुए यम द्वितीया हिन्दू, भारतीय, नेपाली भाई की आयु-वृद्धि तथा सर्वकामना पूर्ति कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया hindu पौराणिक मान्यता thumb|300px|किजापूजा के बारे में नेवारी पारंपरिक चित्र कार्तिक शुक्ल द्वितीया को पूर्व काल में यमुना ने यमराज को अपने घर पर सत्कारपूर्वक भोजन कराया था। उस दिन नारकी जीवों को यातना से छुटकारा मिला और उन्हें तृप्त किया गया। वे पाप-मुक्त होकर सब बंधनों से छुटकारा पा गये और सब के सब यहां अपनी इच्छा के अनुसार सन्तोषपूर्वक रहे। उन सब ने मिलकर एक महान् उत्सव मनाया जो यमलोक के राज्य को सुख पहुँचाने वाला था। इसीलिए यह तिथि तीनों लोकों में यम द्वितीया के नाम से विख्यात हुई।पद्मपुराणम्, उत्तरखण्डम्-122-93से95, चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-2015, खंड-4, पृष्ठ-402; (ख)भविष्य महापुराणम् (उत्तर-पर्व)-14-18से20, हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद, संस्करण-2003, खंड-3, पृष्ठ 77. जिस तिथि को यमुना ने यम को अपने घर भोजन कराया था, उस तिथि के दिन जो भाई अपनी बहन के हाथ का उत्तम भोजन करता है उसे उत्तम भोजन समेत धन की प्राप्ति भी होती रहती है।पद्मपुराणम्, उत्तरखण्डम्-122-97, चौखंबा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, संस्करण-2015, खंड-4, पृष्ठ-402; (ख)भविष्य महापुराणम् (उत्तर-पर्व)-14-22, हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद, संस्करण-2003, खंड-3, पृष्ठ 77. । यह पर्व भाई-बहन के स्नेह का द्योतक है। कोई बहन नहीं चाहती कि उसका भाई दीन-हीन, तुच्छ हो, सामान्य जीवन जीने वाला हो, ज्ञानरहित, प्रभावरहित हो। इस दिन भाई को अपने घर पाकर बहन अत्यन्त प्रसन्न होती है अथवा किसी कारण से भाई नहीं आ पाता तो स्वयं उसके घर चली जाती है। विधि एवं निर्देश समझदार लोगों को इस तिथि को अपने घर मुख्य भोजन नहीं करना चाहिए। उन्हें अपनी बहन के घर जाकर उन्हीं के हाथ से बने हुए पुष्टिवर्धक भोजन को स्नेह पूर्वक ग्रहण करना चाहिए तथा जितनी बहनें हों उन सबको पूजा और सत्कार के साथ विधिपूर्वक वस्त्र, आभूषण आदि देना चाहिए। बहन के हाथ का भोजन उत्तम माना गया है। सगी बहन के अभाव में अन्य बहनें के हाथ का भोजन करना चाहिए जैसे अपने चाचा, मामा, मौसी की पुत्री को या भविष्य महापुराणम् (उत्तर-पर्व)-14-23,24; हिंदी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद, संस्करण-2003, खंड-3, पृष्ठ 77. या अच्छे मित्र की बहन को भी ऐसा करना चाहिए।महामहोपाध्याय भारत रत्न डॉ० पी० वी० काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग-4, उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, संस्करण-1996, पृष्ठ-78. बहन को चाहिए कि वह भाई को शुभ आसन पर बिठाकर उसके हाथ-पैर धुलाये, स्वयं स्पर्श नहीं करे। गंधादि से उसका सम्मान करे और दाल-भात, फुलके, कढ़ी, सीरा, पूरी, चूरमा अथवा लड्डू, जलेबी, घेवर, पायसम (दूध की खीर) या जो भी उपलब्ध हो यथा सामर्थ्य उत्तम पदार्थों का भोजन कराये। भाई बहन को अन्न, वस्त्र आदि देकर उसके चरण स्पर्श कर शुभाशीष प्राप्त करे।व्रत परिचय, गीता प्रेस गोरखपुर, पृष्ठ-143. लोक प्रचलित विधि एक उच्चासन (मोढ़ा, पीढ़ी) पर चावल के घोल से पांच शंक्वाकार आकृति बनाई जाती है। उसके बीच में सिंदूर लगा दिया जाता है। आगे में स्वच्छ जल, 6 कुम्हरे का फूल, सिंदूर, 6 पान के पत्ते, 6 सुपारी, बड़ी इलायची, छोटी इलाइची, हर्रे, जायफल इत्यादि रहते हैं। कुम्हरे का फूल नहीं होने पर गेंदा का फूल भी रह सकता है। बहन भाई के पैर धुलाती है। इसके बाद उच्चासन (मोढ़े, पीढ़ी) पर बैठाती है और अंजलि-बद्ध होकर भाई के दोनों हाथों में चावल का घोल एवं सिंदूर लगा देती है। हाथ में मधु, गाय का घी, चंदन लगा देती है। इसके बाद भाई की अंजलि में पान का पत्ता, सुपारी, कुम्हरे का फूल, जायफल इत्यादि देकर कहती है - "यमुना ने निमंत्रण दिया यम को, मैं निमंत्रण दे रही हूं अपने भाई को; जितनी बड़ी यमुना जी की धारा, उतनी बड़ी मेरे भाई की आयु।" यह कहकर अंजलि में जल डाल देती है। इस तरह तीन बार करती है, तब जल से हाथ-पैर धो देती है और कपड़े से पोंछ देती है। टीका लगा देती है। इसके बाद भुना हुआ मखान खिलाती है। भाई बहन को अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार देता है।मिथिलाक पाबनि-तिहार, श्रीमती मोहिनी झा, कालिंदी प्रकाशन, सरिसवपाही, तृतीय संस्करण-2005, पृष्ठ-99-100. इसके बाद उत्तम पदार्थों का भोजन कराया जाता है। स्पष्ट है कि इस व्रत में बहन को अन्न-वस्त्र, आभूषण आदि इच्छानुसार भेंट देना तथा बहन के द्वारा भाई को उत्तम भोजन कराना ही मुख्य क्रिया है। यह मुख्यतः भाई-बहन के पवित्र स्नेह को अधिकाधिक सुदृढ़ रखने के उद्देश्य से परिचालित व्रत है। भारत रत्न महामहोपाध्याय डॉ० पी० वी० काणे के अनुसार भ्रातृ द्वितीया का उत्सव एक स्वतंत्र कृत्य है, किंतु यह दिवाली के तीन दिनों में संभवतः इसीलिए मिला लिया गया कि इसमें बड़ी प्रसन्नता एवं आह्लाद का अवसर मिलता है जो दीवाली की घड़ियों को बढ़ा देता है। ।महामहोपाध्याय भारत रत्न डॉ० पी० वी० काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग-4, उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, संस्करण-1996, पृष्ठ-78. चित्रगुप्त जयन्ती चित्रगुप्त जयंती इसके अलावा कायस्थ समाज में इसी दिन अपने आराध्य देव चित्रगुप्त की पूजा की जाती है। कायस्थ लोग स्वर्ग में श्री धर्मराज का लेखा-जोखा रखने वाले श्री चित्रगुप्त जी का पूजन सामूहिक रूप से तस्वीरों अथवा मूर्तियों के माध्यम से करते हैं। वे इस दिन कारोबारी बहीखातों की पूजा भी करते हैं।https://www.jagran.com/spiritual/puja-path-chitragupta-jayanti-2020-date-ganga-saptami-katha-history-importance-and-significance-20232974.html Chitragupta Jayanti 2020: आज है चित्रगुप्त जयंती और गंगा जयंती, जीवन-मृत्यु का लेखा-जोखा रखते हैं भगवान चित्रगुप्त Dainik Jagran hi 2020-11-15 तारीख कार्तिक मास द्वितीया तिथि का आरंभ 2 नवंबर को रात में 8 बजकर 22 मिनट पर हो जाएगा और कार्तिक द्वितीया तिथि 3 नवंबर को रात में 10 बजकर 6 मिनट तर रहेगी। उदया तिथि में द्वितीया तिथि 3 नवंबर को होने के कारण भाई दूज का पर्व 3 तारीख को मनाया जाएगा। दरअसल, 3 तारीख को सुबह में 11 बजकर 39 मिनट तक सौभाग्य योग रहेगा। इसके बाद शोभन योग लग जाएगा। इसलिए भाई दूज के दिन पूजा के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त 11 बजकर 45 मिनट तक रहेगा।https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/religion-rituals/festivals-and-fasts/bhai-dooj-2024-date-significance-and-puja-shubh-muhurat-kab-hai-bhai-dooj/articleshow/114423775.cms भाई दूज कब है 2 या 3 नवंबर? इस बार भाई दूज पर बनें कई शुभ योग, जानें तारीख और महत्व Navbharat Times hi 2024-10-23 बाहरी कड़ियाँ सन्दर्भ श्रेणी:संस्कृति श्रेणी:हिन्दू त्यौहार श्रेणी:धार्मिक त्यौहार श्रेणी:दीपावली श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना