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राखालदास बनर्जी
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राखालदास बन्द्योपाध्याय Rakhaldas Bandyopadhyay.jpg 200px yes 1885 04 12 बहरामपुर, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रितानी भारतhttps://www.anandabazar.com/editorial/rakhaldas-created-history-by-his-own-1.1091882 রাখালদাস নিজেই গড়ে ফেললেন ইতিহাস Bengali Anandabazar Patrika 7 Jan 2020 20 Oct 2020Sengupta Subodhchandra Bose Anjali Samsad Bangali Charitabhidhan(Biographical dictionary) https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.458268 Bengali Sahitya Samsad 1976 Calcutta 455 yes 1930 05 23 1885 04 12 कोलकाता, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रितानी भारत इतिहासकार, पुरातत्वज्ञ कंचनमाला देबी भारतीय बंगाली हिन्दू
राखालदास बन्द्योपाध्याय (बंगला: রাখালদাস বন্দোপাধ্যায় / आर. डी. बनर्जी, 1885-1930) प्रसिद्ध पुरातत्वज्ञ एवं इतिहासकार थे। आप भारतीय पुराविदों के उस समूह में से थे जिसमें से अधिकांश ने 20वीं शती के प्रथम चरण में तत्कालीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के सहयोगी के रूप में पुरातात्विक उत्खनन, शोध तथा स्मारकों के संरक्षण में यथेष्ट ख्याति अर्जित की थी।http://timesofindia.indiatimes.com/city/kolkata/banerji-robbed-of-credit-for-indus-findings/articleshow/59101966.cms Banerji robbed of credit for Indus findings
जीवन परिचय
राखालदास का जन्म मुर्शिदाबाद में हुआ था। प्रेसिडेंसी कॉलेज (कोलकाता) में अध्ययन करते समय में महामहोपाध्याय पं॰ हरप्रसाद शास्त्री तथा बँगला लेखक रामेन्द्रसुन्दर त्रिवेदी और फिर तत्कालीन बँगाल सर्किल (मंडल) के पुरातत्व अधीक्षक डॉ॰ ब्लॉख के संपर्क में आए। इसी समय से बन्दोपाध्याय महोदय डॉ॰ ब्लॉख के अवैतनिक सहकारी के रूप में अन्वेषणों तथा उत्खननों में काम करने लगे थे।https://www.lindahall.org/r-d-banerji/ Scientist of the Day - R. D. Banerji 12 April 2017 20 Oct 2020 1907 ई. में बी. ए. (आनर्स) करने पर इनकी नियुक्ति प्रांतीय संग्रहालय, लखनऊ के सूचीपत्र बनाने के लिए हुई। इसी बीच उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण इतिहास संबंधी लेख भी लिखे। सन् 1910 में एम. ए. करने के उपरांत ये उत्खनन सहायक (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के पद पर नियुक्त हुए और लगभग एक वर्ष तक इन्होंने कलकत्ता स्थित इंडियन म्यूज़ियम में कार्य किया। 1917 में इन्होंने पूना में पुरातत्व सर्वेक्षण के पश्चिमी मंडल के अधीक्षक के रूप में कार्य किया। लगभग 6 वर्षों तक महाराष्ट्र, गुजरात, सिंध तथा राजस्थान एवं मध्यप्रदेश की देशी रियासतों में पुरातत्व विषयक जो महत्वपूर्ण काम किए उनका विवरण 'एनुअल रिपोर्ट्स ऑव द आर्क्योलॉजिकल सर्वे ऑव इंडिया' (पुरातत्व सर्वेक्षण की वार्षिक रिपोर्ट) में उपलब्ध है। भूमरा (मध्य प्रदेश) के उल्लेखनीय प्राचीन गुप्तयुगीन मंदिर तथा मध्यकालीन हैहयकलचुरी-स्मारकों संबंधी शोध राखाल बाबू द्वारा इसी कार्यकाल में किए गए; किन्तु उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य था 1922 में एक बौद्ध स्तूप की खुदाई के सिलसिले में मोहनजोदड़ो की प्राचीन सभ्यता की खोज। इसके अतिरिक्त उन्होंने पूना में पेशवाओं, के राजप्राद का उत्खनन कर पुरातत्व और इतिहास की भग्न शृंखला को भी जोड़ने का प्रयत्न किया।
1924 में राखालदास महोदय का स्थानांतरण पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्वी मंडल (कलकत्ता) में हो गया, जहाँ वे लगभग दो वर्ष रहे। इस छोटी सी अवधि में उन्होंने पहाड़पुर (जि. राजशाही, पूर्वी बंगाल) के प्राचीन मंदिर का उल्लेखयोग्य उत्खनन करवाया। 1926 में कुछ प्रशासकीय कारणों से वंद्योपाध्याय को सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण करना पड़ा।
तत्पश्चात् वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास के 'मनींद्र नंदी प्राध्यापक' पद पर अधिष्ठित हुए और 1930 में अपनी मृत्यु तक इसी पद पर रहे। जीवन के अंतिम वर्षों वे वंद्योपाध्याय महाशय की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही, यद्यपि उनका लेखन और शोध सुचारु रूप से चलता रहा। 'हिस्ट्री ऑव ओरिसा' जो उनकी मृत्यु के बाद ही पुरी छपी, राखाल बाबू के अंतिम दिनों की ही कृति है।
कृतियाँ
सफल पुराविद् तथा इतिहासकार के अतिरिक्त राखालदास श्रेष्ठ साहित्यकार भी थे। बँगला में रचित उनके ऐतिहासिक इतिवृतों का संग्रह 'पाषाणेर कथा' (पत्थर की कथा ; १९१४), 'धर्मपाल', 'करुणा', 'मयूख', 'शशांक', ध्रुवा, लुत्फुल्ला और 'असीम' आदि उपन्यास उनकी बहुमुखी प्रतिभा के द्योतक हैं। राखालदास के कुछ उल्लेखनीय ग्रंथ ये हैं-
हेमकण (१९११-१२ ; अपूर्ण)
पाषाणेर कथा' (पत्थर की कथा ; १९१४),
शशांक (१९१४)
धर्मपाल (१९१५)
मयूख (१९१६) -- इसमें शाहजहाँ के राज्यकाल के समय पुर्तगालियों द्वारा बंगाल में किए गए अत्याचारों का वर्णन है।
ध्रुव (१९१७)
करुणा (१९१७)
दि पालज ऑव बंगाल (The Palas of Bengal ; १९१५ ; मेम्वायर्स ऑव दि एशियाटिक सोसाइटी ऑव बंगाल, जि. 5, सं. 3),
बाँगलार इतिहास (बंगाल का इतिहास)
प्राचीन मुद्रा (१९१५)
द ओरिजिन ऑव बंगाली स्क्रिप्ट (कलकत्ता 1919);
शिव टेंपुल ऑव भूमरा (The Temple of Siva at Bhumara ; १९२४);
The Paleography of Hati Gumpha and Nanaghat Inscriptions (१९२४)
पक्षान्तर (१९२४)
व्यतिक्रम (१९२४)
अनुक्रम (१९३१)
दि हैहयज़ ऑव त्रिपुरी ऐंड देअर मानुमेंट्स (The Haihayas of Tripuri and their Monuments (1931) ; मैम्बायर्स ऑव दि आर्क्योलॉजिकल सर्वे ऑव इंडिया 23);
बास रिलीवस् ऑव बादामी (Bas Reliefs of Badami ; १९२८)
दि एज आव इंपीरियल गुप्तज़ (The Age of the Imperial Guptas ; बनारस 1931)
History of Orissa from the Earliest Times to the British Period (१९३०-३१)
ईस्टर्न स्कूल ऑव मेडडीवल स्कल्पचर (कलकत्ता 1933);
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
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राखालदास से जुड़ी दस बातें
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