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भाई महाराज सिंह
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सिख धर्म महाराज सिंह Painting of the Sikh warrior, Bhai Maharaj Singh, holding court in his darbar.jpg भाई महाराज सिंह का चित्र, दरबार का संचालन करते हुए भाई *भारत में अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले आरम्भिक सिख वीर
भाई दया सिंह जी सम्प्रदाय के शीर्ष नेता
सिख सन्त Dera of Bhai Bir Singh Naurangabad (Bhai Daya Singh ji Samparda) Throat cancer Outram Prison, Singapore 5 July 1856 Nihal Singh Mahant of the Naurangabad Dera 1844 – 1856 Bhagvan Singh Rabbon Uchi, Ludhiana district, Punjab Nanak Singh (son) Bhai Daya Singh Samparda Baba Bir Singh (Naurangabad) Baba Ram Singh 'Virakt' (Naurangabad)
भाई महाराज सिंह ( ठीक-ठीक जन्मतिथि अज्ञात ; लगभग १७७० ई० -- ५ जुलाई १८५६ ) पंजाब के पहले राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी और सेवा के पुंज के तौर पर जाने जाते हैं। उन्होंने ब्रितानी शासन के खिलाफ बगावत की चिंगारी पंजाब से सुलगाई थी।१८५७ से पहले के क्रांतिकारी भाई महाराज सिंह
लुधियाना जिले में जन्मे भाई महाराज सिंह अन्तिम सिख शासक महाराजा दलीप सिंह की रिहाई कराना चाहते थे, लिहाजा फिरंगी फौज कैद करके उन्हें सिंगापुर ले गई थी। बदलते दौर में धुंधले पड़े इस सुनहरे इतिहास को सामने लाने की कवायद लुधियाना से ही शुरू हुई है।
लुधियाना के मलौद क्षेत्र में स्थित गांव रब्बो में जन्मे भाई महाराज सिंह को माता-पिता ने 'निहाल सिंह' नाम दिया था। बागी तेवरों वाले निहाल सिंह बड़े होकर भाई महाराज सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुए। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत के लिए चंब घाटी में उन्होंने संगठन बनाया। फिर महाराज दलीप सिंह को लाहौर के किले से रिहा कराने की योजना बनाई। तमाम क्रांतिकारी गुटों को संगठित कर उन्होंने अंग्रेजों के खजाने और छावनियों को लूटने की योजना तैयार की। जिससे घबराई अंग्रेज सरकार 1850 में उनको बंदी बना सिंगापुर ले गई।
भाई महाराज सिंह नौरंगाबाद के प्रसिद्ध संत भाई बीर सिंह के शिष्य थे। 1845 ई० में वह भाई बीर सिंह की मृत्यु के पश्चात् गद्दी पर बैठे। वह पंजाब की स्वतंत्रता को बनाए रखने के पक्ष में थे। इस उद्देश्य के साथ उन्होंने गाँव-गाँव जाकर प्रचार करना आरंभ किया। अतः सरकार ने उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली तथा उनको बंदी करवाने वाले को दस हजार रुपए ईनाम देने की घोषणा की। इसके बावजूद भाई महाराज सिंह बिना किसी भय के अपना प्रचार करते रहे। उन्होंने मुलतान के दीवान मूलराज, हज़ारा के सरदार चतर सिंह अटारीवाला तथा उसके पुत्र शेर सिंह को अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध की सभी लड़ाइयों में भाग लिया। वह गुजरात की लड़ाई के पश्चात् सिख सैनिकों द्वारा अंग्रेज़ों के समक्ष हथियार डालने के विरुद्ध थे। ऐसा किया जाने पर वह जम्मू चले गए। उन्होंने काबुल के शासक के साथ मिलकर 3 जनवरी, 1850 ई० को अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई। इस योजना के बारे में अंग्रेज़ों को पूर्व ही सूचना मिल गई। परिणामस्वरूप भाई महाराज सिंह को 28 दिसंबर, 1849 ईं० को बंदी बना लिया गया। उनको पहले कलकत्ता तथा बाद में सिंगापुर की जेल में रखा गया। यहाँ उनकी 5 जुलाई, 1856 ईं० को मृत्यु हो गई।
बाहरी कड़ियाँ
Bhai Maharaj Singh (d. 1856)
सन्दर्भ
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सम्ग्राम
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन