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समाज
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कड़ी=https://en.wikipedia.org/wiki/File:Detail_of_Les_tres_riches_heures_-_March.jpg|अंगूठाकार|१५वीं सदी में बैलों से खेत जुताई।
समाज एक से अधिक लोगों के समुदायों से मिल कर बने एक बृहद् समूह को कहते हैं जिस में सभी व्यक्ति मानवीय क्रियाकलाप करते हैं। मानवीय क्रियाकलाप में आचरण, सामाजिक सुरक्षा और निर्वाह आदि की क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।https://newstrack.com/india/hindi-article-on-environment-nature-important-role-in-preserving-the-beauty-of-society-734746.html समाज की खूबसूरती को बरकरार रखने में प्रकृति की अहम भूमिका, ऐसे रखें ध्यान News Track in Hindi Newstrack 2020-12-21 newstrack.com hi 2021-11-17 समाज लोगों का ऐसा समूह होता है जो अपने अंदर के लोगों के मुकाबले अन्य समूहों से काफी कम मेल जोल रखता है। किसी समाज के आने वाले व्यक्ति एक दूसरे के प्रति परस्पर स्नेह तथा सहृदयता का भाव रखते हैं। दुनिया के सभी समाज अपनी एक अलग पहचान बनाते हुए अलग अलग रस्मों - रिवाज़ों का पालन करते हैं।
परिचय
व्यक्ति का व्यवहार कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास की अभिव्यक्ति है। उस की कुछ नैसर्गिक तथा अर्जित आवश्यकताएँ होती हैं। जैसे काम, क्षुधा, सुरक्षा आदि। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में व्यक्ति में कुंठा और मानसिक तनाव से ग्रसित हो जाता है। वह इन की पूर्ति स्वयं करने में सक्षम नहीं होता है। अत: इन आवश्यकताओं की सम्यक् संतुष्टि के लिए अपने दीर्घ विकास क्रम में मनुष्य ने एक समष्टिगत व्यवस्था को विकसित किया है। इस व्यवस्था को ही हम समाज के नाम से सम्बोधित करते हैं। यह व्यक्तियों का ऐसा संकलन है जिस में वे निश्चित संबंध और विशिष्ट व्यवहार द्वारा एक दूसरे से बँधे होते हैं। व्यक्तियों की वह संगठित व्यवस्था विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न मानदंडों को विकसित करती है, जिन के कुछ व्यवहार अनुमन्य और कुछ निषिद्ध होते हैं।
समाज में विभिन्न कर्ताओं का समावेश होता है, जिन में अंत:क्रिया होती है। इस अंत:क्रिया का भौतिक और पर्यावरणात्मक आधार होता है। प्रत्येक कर्ता अधिकतम संतुष्टि की ओर उन्मुख होता है। सार्वभौमिक आवश्यकताओं की पूर्ति समाज के अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। तादात्म्य जनित आवश्यकताएँ संरचनात्मक तत्वों के सह अस्तित्व के क्षेत्र का नियमन करती हैं। क्रिया के उन्मेष की प्रणाली तथा स्थितिजन्य तत्व, जिन की ओर क्रिया उन्मुख है, समाज की संरचना का निर्धारण करते हैं। संयोजक तत्व अंत:क्रिया की प्रक्रिया को संतुलित करते हैं। वियोजक तत्व सामाजिक संतुलन में व्यवधान उपस्थित करते हैं। वियोजक तत्वों के नियंत्रण हेतु संस्थाकरण द्वारा कर्ताओं के संबंधों तथा क्रियाओं का समायोजन होता है। इससे पारस्परिक सहयोग की वृद्धि होती है और अंतर्विरोधों का शमन होता है। सामाजिक प्रणाली में व्यक्ति को कार्य और पद, दंड और पुरस्कर, योग्यता तथा गुणों से संबंधित सामान्य नियमों और स्वीकृत मानदंडों के आधार पर प्रदान किए जाते हैं। इन अवधारणाओं की विसंगति की स्थिति में व्यक्ति समाज की मान्यताओं और विधाओं के अनुसार अपना व्यवस्थापन नहीं कर पाता और उस का सामाजिक व्यवहार विफल हो जाता है। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर उसके लक्ष्य की सिद्धि नहीं हो पाती है। कारण यह कि उसे समाज के अन्य सदस्यों का सहयोग नहीं प्राप्त होता। सामाजिक दंड के इसी भय से सामान्यतः व्यक्ति समाज में प्रचलित मान्य परंपराओं की उपेक्षा नहीं कर पाता है। वह उनसे समायोजन का हर संभव प्रयास करता है।
चूँकि समाज व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों की एक व्यवस्था है इसलिए इस का कोई मूर्त स्वरूप नहीं होता। इस की अवधारणा अनुभूतिमूलक है। पर इस के सदस्यों में एक दूसरे की सत्ता और अस्तित्व की प्रतीति होती है। ज्ञान और प्रतीति के अभाव में सामाजिक संबंधों का विकास संभव नहीं है। पारस्परिक सहयोग एवं संबंध का आधार समान स्वार्थ होता है। समान स्वार्थ की सिद्धि समान आचरण से ही संभव होती है। इस प्रकार का सामूहिक आचरण समाज द्वारा निर्धारित और निर्देशित होता है। वर्तमान सामाजिक मान्यताओं की समान लक्ष्यों से संगति के संबंध में सहमति अनिवार्य होती है। यह सहमति पारस्परिक विमर्श तथा सामाजिक प्रतीकों के आत्मीकरण पर आधारित होती है। इस के अतिरिक्त प्रत्येक सदस्य को यह विश्वास रहता है कि वह जिन सामाजिक विधाओं को उचित मानता और उन का पालन करता है, उन का पालन दूसरे भी करते हैं। इस प्रकार की सहमति, विश्वास एवं तदनुरूप आचरण सामाजिक व्यवस्था को स्थिर रखते हैं। व्यक्तियों द्वारा सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्थापित विभिन्न संस्थाएँ इस प्रकार कार्य करती हैं, जिस से एक समवेत इकाई के रूप में समाज का संगठन अप्रभावित रहता है। असहमति की स्थिति अंतर्वैयक्तिक एवं अंत:संस्थात्मक संघर्षों को जन्म देती है जो समाज के विघटन के कारण बनते हैं। यह असहमति उस स्थिति में पैदा होती है जब व्यक्ति सामूहिकता के साथ आत्मीकरण में असफल रहता है। आत्मीकरण और नियमों को स्वीकार करने में विफलता कुलगति अधिकारों एवं सीमित सदस्यों के प्रभुत्व के प्रति मूलभूत अभिवृत्तियों से संबद्ध की जा सकती है। इसके अतिरिक्त ध्येय निश्चित हो जाने के पश्चात् अवसर इस विफलता का कारण बनता है। सामाजिक संगठन का स्वरूप कभी शाश्वत नहीं रहता। समाज व्यक्तियों का समुच्चय है। यह विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न समूहों में विभक्त है। अत: मानव मन और समूह मन की गतिशीलता उसे निरंतर प्रभावित करती रहती है। परिणामस्वरूप समाज परिवर्तनशील होता है। उसकी यह गतिशीलता ही उसके विकास का मूल है। सामाजिक विकास परिवर्तन की एक चिरंतन प्रक्रिया है जो सदस्यों की आकांक्षाओं और पुनर्निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में उन्मुख रहती है। संक्रमण की निरंतरता में सदस्यों का उपक्रम, उनकी सहमति और नूतनता से अनुकूलन की प्रवृत्ति क्रियाशील रहती है।समाज म होने वाले क्रियाकलाप ही समाज को बाँध कर रखती ह
परिभाषा
विभिन्न विद्वानों ने समाज की भिन्न भिन्न परिभाषा की है -
ग्रीन ने समाज की अवधारणा की जो व्याख्या की है उस के अनुसार समाज एक बहुत बड़ा समूह है जिस का कोई भी व्यक्ति सदस्य हो सकता है। समाज जनसंख्या, संगठन, समय, स्थान और स्वार्थों से बना होता है।
एडम स्मिथ - मनुष्य ने पारस्परिक लाभ के निमित्त जो कृत्रिम उपाय किया है वह समाज है।
डॉ0 जेम्स - मनुष्य के शान्तिपूर्ण सम्बन्धों की अवस्था का नाम समाज है।
प्रो0 गिडिंग्स - समाज स्वयं एक संघ है, यह एक संगठन है और व्यवहारों का योग है, जिस में सहयोग देने वाले व्यक्ति एक दूसरे से सम्बंधित है।
प्रो0 मैकाइवर - ''समाज का अर्थ मानव द्वारा स्थापित ऐसे सम्बंधों से है, जिन्हें स्थापित करने के लिये उसे विवश होना पड़ता है।
मैकाइवर के अनुसार समाज की कुछ मुख्य तत्व निम्नलिखित है -
1. रीतियाँ
2. अधिकार
3. स्वतंत्रता
4. कार्यप्रणाली
5. पारस्परिक सहयोग
6. समूह और उप समूह
7. मानव व्यवहार पर नियंत्रण
संक्षेप में यह कहा जा सकता है, समाज एक उद्देश्यपूर्ण समूह होता है, जो किसी एक क्षेत्र में बनता है, उस के सदस्य एकत्व एवं अपनत्व में बंधे होते हैं।
समाज की विशेषताएँ
समाज की कतिपय विशेषताएँ निम्नलिखित हैं जिन्हें सामान्यतया सभी समाजशास्त्री स्वीकार करते हैं -
एक से अधिक सदस्य
वृहद संस्कृति
क्षेत्रीयता
सामाजिक संबंधों का दायरा
श्रम विभाजन जिला में समाज सेवा हेतु प्रमाण चाहिए किसी की सहायता के ख़ातिर
सामजिक आपसी सहयोग
सामुहिक कार्य
समाज के विभिन्न रूप
समाज के कुछ रूप निम्नलिखित हैं-
(1) पूर्वी समाज तथा पश्चिमी समाज
(2) पूर्व-औद्योगिक समाज (शिकारी समाज, पशुपालक समाज, उद्यान-समाज, कृषि समाज, सामन्तवादी समाज), औद्योगिक समाज, तथा उत्तर-औद्योगिक समाज
(3) सूचना समाज तथा ज्ञान समाज
(4) कुछ शैक्षणिक, व्यावसायिक, और वैज्ञानिक संघ अपने आप को 'समाज' (सोसायटी) कहते हैं, जैसे अमेरिकी गणितीय समाज (American Mathematical Society), रॉयल सोसायटी आदि
(5) कुछ देशों में, कभी-कभी व्यापारिक इकाइयों को भी 'समाज ' कहा जाता है, जैसे कॉ-ऑपरेटिव सोसायटी
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