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पश्चिमबंग बांग्ला अकादेमी
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बांग्ला ऐकाडेमी
पश्चिमबंग बांग्ला अकादेमी bn পশ্চিমবঙ্গ বাংলা আকাদেমি bn 300px प्रतीक-चिह्न 300px पश्चिमबंग बांग्ला अकादेमी का मुख्य भवन, कोलकाता, भारत पी.बी.ए. bn pɔʃtʃimbɔŋɡo baŋla akad̪emi अकादेमी फ़्राँसैज़बांग्ला ऐकाडेमी 1986 05 20 yes स्वायत्त सरकारी निकाय आधिकारिक भाषा विनियामक बंगाली वर्तनी एवं व्याकरण का सुधार, कोशों, विश्वकोशों तथा शब्दावलियों का संकलन, एवं पश्चिम बंगाल तथा भारत में बांग्ला भाषा और संस्कृति का संवर्धन रवींद्र सदन तथा रवींद्र-ओकाकुरा भवन कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, बराक घाटी बांग्ला अध्यक्ष ब्रात्य बसु सूचना एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग (पश्चिम बंगाल) पश्चिम बंगाल सरकार https://pbba.wbicad.in/
पश्चिमबंग बांग्ला अकादेमी (बांग्ला: পশ্চিমবঙ্গ বাংলা আকাদেমি, उच्चारण: पोश्चिम्बॉङ्गो बाङ्ला आकादेमि) भारत में बांग्ला भाषा का आधिकारिक विनियामक निकाय है। 20 मई 1986 को कोलकाता में स्थापित इस संस्थान का उद्देश्य भाषा के आधिकारिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करना है, और इसे पश्चिम बंगाल में बंगाली वर्तनी एवं व्याकरण का परिष्कार करने, कोशों, विश्वकोशों तथा शब्दावलियों का संकलन करने और बांग्ला भाषा एवं संस्कृति का संवर्धन करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। वे पश्चिम बंगाल तथा त्रिपुरा की सरकारों के साथ-साथ ऑक्स्फ़र्ड यूनिवर्सिटी प्रेस एवं रामकृष्ण मिशन जैसी अत्यधिक संख्या में निजी प्रकाशन संस्थाओं तथा संस्थानों द्वारा व्यापक रूप से स्वीकृत हैं।
मुख्य संस्थान दो पृथक भवनों में स्थित है, जिनमें से एक दक्षिण कोलकाता का नंदन-रवींद्र सदन परिसर है तथा दूसरा बिधाननगर स्थित रवींद्र-ओकाकुरा परिसर है। अन्नदाशंकर राय अकादेमी के प्रथम अध्यक्ष एवं सनत् कुमार चट्टोपाध्याय इसके प्रथम सचिव बने। पश्चिमबंग बांग्ला अकादेमी अपने क्रियाकलापों एवं कार्यक्रमों को पश्चिम बंगाल के विभिन्न ज़िलों तथा भारत के अन्य राज्यों तक विस्तारित करने में सफल रही है। कोलकाता में यह संस्था बंगीय साहित्य परिषद एवं साहित्य अकादमी जैसे निकायों के सहयोग से विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती है।
इतिहास
thumb|200px|बंगीय साहित्य परिषद - कोलकाता
उत्पत्ति
बंगीय साहित्य परिषद बांग्ला ऐकाडेमी
बांग्ला भाषा तथा साहित्य के नियमन एवं संवर्धन हेतु स्थापित प्रथम अकादमिक संस्था 'बेंगॉल अकाडमी ऑफ़ लिट्रचर' की स्थापना 1893 में बिनॉयकृष्ण देव की अध्यक्षता में कोलकाता में की गई थी। अप्रैल 1894 में, इस अकादेमी का पुनर्गठन कर इसका नाम बदलकर बंगीय साहित्य परिषद कर दिया गया, तथा रमेश चंद्र दत्त इसके प्रथम अध्यक्ष बने। चंद्रनाथ बोस, द्विजेंद्रनाथ टैगोर, जगदीश चंद्र बोस, प्रफुल्ल चंद्र राय, सत्येंद्रनाथ टैगोर, हरप्रसाद शास्त्री एवं रामेंद्र सुंदर त्रिवेदी जैसे विद्वानों ने पश्चात्वर्ती समय में परिषद के अध्यक्ष के रूप में सेवाएँ दीं। रवींद्रनाथ टैगोर (उपाध्यक्ष: 1894–96, 1901, 1905–1909, 1917; विशेष प्रतिनिधि: 1910) स्वयं इसकी स्थापना के समय से ही इस संस्था से घनिष्ठ रूप से संबद्ध थे।
बंगीय साहित्य परिषद बांग्ला भाषा से संबंधित विषयों पर कार्य करने वाली प्रथम अकादमिक संस्था है। इसने मानक बांग्ला शब्दकोश, व्याकरण एवं दार्शनिक व वैज्ञानिक शब्दावलियों के संकलन, प्राचीन तथा मध्यकालीन बांग्ला पांडुलिपियों के संग्रह एवं प्रकाशन, और अन्य भाषाओं से बांग्ला में अनुवाद तथा इतिहास, दर्शन एवं विज्ञान पर अनुसंधान करने का प्रयास किया। 20वीं शताब्दी के दौरान, बांग्ला भाषा के संवर्धन से संबंधित कार्य केवल बंगीय साहित्य परिषद का ही एकमात्र उत्तरदायित्व नहीं रहा। जैसे-जैसे भाषा समृद्ध हुई और साहित्य का विकास हुआ, तत्कालीन विद्वानों द्वारा भाषाई परिष्कार के साथ-साथ इन सुधारों को लागू करने हेतु एक प्राधिकरण की आवश्यकता अनुभव की गई। 1930 के दशक के उत्तरार्ध में, रवींद्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बांग्ला वर्तनी के नियम निर्धारित करने का अनुरोध किया, जिसके पश्चात् विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नवंबर 1935 में इस विषय के अवलोकन हेतु एक समिति का गठन किया। मई 1936 में, बांग्ला वर्तनी के लिए प्रथम मानक नियम लागू किया गया। इन नियमों को बाद में रवींद्रनाथ टैगोर तथा अन्य विद्वानों द्वारा संशोधित किया गया और आगामी 70 वर्षों तक समग्र बंगाल में शैक्षणिक स्तर पर इनका पालन किया गया। 1947 में बंगाल के विभाजन के पश्चात्, 1955 में ढाका में पूर्वी पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर ए. के. फ़ज़लुल हक़ द्वारा बांग्ला ऐकाडेमी की स्थापना की गई। 1990 के दशक में, पश्चिमबंग बांग्ला अकादेमी ने बांग्ला वर्तनी हेतु मानकीकृत नियम लागू किए। पश्चिम बंगाल में, विभिन्न प्रमुख संस्थानों ने भाषा के विकास की प्रक्रिया का समर्थन किया, किंतु इसके परिणामस्वरूप इसमें असमानताएँ उत्पन्न हुईं। उदाहरणस्वरूप, राजशेखर बसु एवं आनंदबाज़ार पत्रिका ने बांग्ला वर्तनी को सरल बनाने का प्रयास किया; परंतु वर्तनी प्रणाली को तर्कसंगत बनाने के स्थान पर, इससे ऐसे निकायों के अधिकार क्षेत्र पर विवाद उत्पन्न हो गया। यहाँ तक कि विश्वभारती विश्वविद्यालय जैसे संस्थान भी इस कार्य में सफल न हो सके। 1962 में, पश्चिम बंगाल सरकार ने समस्त शासकीय प्रयोजनों के लिए बांग्ला का प्रयोग प्रारंभ किया। तब से ही, भाषा के एक आधिकारिक विनियामक की आवश्यकता निरंतर अनुभव की जा रही थी। 1986 में, तत्कालीन बंगाली बुद्धिजीवियों की सर्वसम्मति से, पश्चिम बंगाल सरकार ने सूचना एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग के एक अंग के रूप में पश्चिमबंग बांग्ला अकादेमी का शुभारंभ किया। तत्पश्चात् इसे एक सोसाइटी के रूप में परिवर्तित कर 'सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट' के अंतर्गत पंजीकृत किया गया। 8 दिसंबर 1994 को इसे एक स्वायत्त शासकीय निकाय घोषित कर दिया गया।