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दुष्यंत
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दुष्यन्त
संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास की प्रसिद्ध रचना अभिज्ञान शकुंतलम् के नायक दुष्यंत चंद्रवंशी पुरुवंशी के पुत्र राजा भरत के पुत्र राजा अक्रिड के चार पुत्र हुए,, राजा पाण्डय,,राजा केलर,, राजा चौल,,
राजा कोल /राजा राम कोल (कोली) हुए ये चार भाई थे,, इसके प्रमाण महाभारत और हरिबश पुराण और बहुत जगह मिलता है,
थे। एक बार मृगया का शिकार करते हुए संयोगवश वे महर्षि कण्व के आश्रम में पहुँचे। वहाँ उनका परिचय कण्व ऋषि की पोष्य दुहिता शकुंतला से हुआ। उन्होंने शकुंतला पर आसक्त होकर गंधर्व विवाह कर लिया। ऋषिकी कुछ काल तक प्रतिक्षा कर वे अपने नगर लौट गए। उन्होंने शकुंतला को निसानी स्वरूप अपनी मुद्रिका दे दी। दुष्यंत के जाने के पश्चात शकुंतला के गर्भ से एक पुत्र पैदा हुआ। वह पुत्र को लेकर दुष्यंत के पास आई। मार्ग में असावधानीवश स्नानादि के समय अंगूठी किसी सरोवर में गिर गई। दुष्यंत ने शकुंतला को स्वीकार नहीं किया। किंतु जब आकाशवाणी हुई कि तुम इसे स्वीकार करो तो दुष्यंत ने दोनो को स्वीकार कर लिया। एक दूसरे मत से एक बार दुष्यंत की स्मृति में बेसुध शकुंतला द्वारा अपनी अवहेलना से क्रुद्ध ऋषि दुर्वासा ने उसे शाप दे दिया। शापवश राजा को सब विस्मरण हो गया था। अतः शकुंतला निराश होकर लौट आई। कुछ दिनों बाद एक मछुहारे को मछली के पेट में वह अंगूठी मिली। जब वह अंगूठी राजा के पास पहुँची तो उसे समस्त घटनाओं का स्मरण हुआ। और तब शकुंतला बुलवाई गई। उसके पुत्र का नाम भरत रखा गया जो बाद में चलकर भारतवर्ष, या भारत नाम का जनक हुआ।
सहायक पुस्तकें
हिंदी साहित्य कोष- भाग- ढजड
श्रेणी:पौराणिक/साहित्यिक चरित्र