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411 समाचार
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जापान का इतिहास

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जापान के प्राचीन इतिहास के संबंध में कोई निश्चयात्मक जानकारी नहीं प्राप्त है। जापानी लोककथाओं के अनुसार विश्व के निर्माता ने सूर्य देवी तथा चन्द्र देवी को भी रचा। फिर उसका पोता क्यूशू द्वीप पर आया और बाद में उनकी संतान होंशू द्वीप पर फैल गए। हँलांकि यह लोककथा है पर इसमें कुछ सच्चाई भी नजर आती है। पौराणिक मतानुसार सम्राट जिममु ९६० ई. पू. राज्यसिंहासन पर बैठा और वहीं से जापान की व्यवस्थित कहानी आरंभ हुई। अनुमानत: तीसरी या चौथी शताब्दी में 'ययातों' नामक जाति ने दक्षिणी जापान में अपना आधिपत्य स्थापित किया ५ वीं शताब्दी में चीन और कोरिया से संपर्क बढ़ने पर चीनी लिपि, चिकित्साविज्ञान और बौद्धधर्म जापान को प्राप्त हुए। जापानी नेताओं शासननीति चीन से सीखी किंतु सत्ता का हस्तांतरण परिवारों तक ही सीमित रहा। ८वीं शताब्दी में कुछ काल तक राजधानी नारा में रखने के बाद क्योटो में स्थापित की गई जो १८६८ तक रही। 'मिनामोतो' जाति के एक नेता योरितोमें ने ११९२ में कामाकुरा में सैनिक शासन स्थापित किया। इससे सामंतशाही का उदय हुआ, जो लगभग ६०० वर्ष चली। इसमें शासन सैनिक शक्ति के हाथ रहता था, राजा नाममात्र का ही होता था। १२७४ और १२८१ में मंगोल आक्रमणों से जापान के तात्कालिक संगठन को धक्का लगा, इससे धीरे धीरे गृहयुद्ध पनपा। १५४३ में कुछ पुर्तगाली और उसके बाद स्पेनिश व्यापारी जापान पहुँचे। इसी समय सेंट फ्रांसिस जैवियर ने यहॉ ईसाई धर्म का प्रचार आरंभ किया। १५९० तक हिदेयोशी तोयोतोमी के नेतृत्व में जापान में शांति और एकता स्थापित हुई। १६०३ में तोगुकावा वंश का आधिपत्य आरंभ हुआ, जो १८६८ तक स्थापित रहा। इस वंश ने अपनी राजधानी इदो (वर्तमान टोक्यो) में बनाई, बाह्य संसार से संबंध बढ़ाए और ईसाई धर्म की मान्यता समाप्त कर दी। १६३९ तक चीनी और डच व्यापारियों की संख्या जापान में अत्यंत कम हो गई। अगले २५० वर्षो तक वहाँ आंतरिक सुव्यवस्था रही। गृह उद्योगों में उन्नति हुई। १८८५ में अमरीका के कमोडोर मैथ्यू पेरो के आगमन से जापान बाह्य देशों यथा अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और नीदरलैंडस की शांतिसंधि में समिलित हुआ। लगभग १० वर्षो के बाद दक्षिणी जातियों ने सफल विद्रोह करके सम्राटतंत्र स्थापित किया, १८६८ में सम्राट मीजी ने अपनी संप्रभुता स्थापित की। १८९४-९५ में कोरिया के प्रश्न पर चीन से और १९०४-५ में रूस द्वारा मंचूरिया और कोरिया में हस्तक्षेप किए जाने से रूस के विरुद्ध जापान को युद्ध करना पड़ा। दोनों युद्धों में जापान के अधिकार में आ गए। मंचूरिया और कोरिया में उसका प्रभाव भी बढ़ गया। प्रथम विश्वयुद्ध में सम्राट ताइशो ने बहुत सीमित रूप से भाग लिया। इसके बाद जापान की अर्थव्यवस्था द्रुतगति से परिवर्तित हुई। उद्योगीकरण का विस्तार किया गया। १९३६ तक देश की राजनीति सैनिक अधिकारियों के हाथ में आ गई और दलगत सत्ता का अस्तित्व समाप्त हो गया। जापान राष्ट्रसंघ से पृथक् हो गया। जर्मनी और इटली से संधि करके उसने चीन पर आक्रमण शुरू कर दिया। १९४१ में जापान ने रूस से शांतिसंधि की। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अगस्त, १९४५ में जापान ने मित्र राष्ट्रो के सामने विना शर्त आत्मसमर्पण किया। इस घटना से सम्राट जो अब तक राजनीति में महत्वहीन थे, पुन: सक्रिय हुए। मित्र राष्ट्रों के सर्वोच्च सैनिक कमांडर डगलस मैकआर्थर के निर्देश में जापान में अनेक सुधार हुए। संसदीय सरकार का गठन, भूमिसुधार, ओर स्थानीय स्वायत्त शासन निकाय नई शासन निकाय नई शासनव्यवस्था के रूप थे। १९४७ में नया संविधान लागू रहा। १९५१ में सेनफ्रांसिस्को में अन्य ५५ राष्ट्रों के साथ शांतिसंधि में जापान ने भी भाग लिया। जापान ने संयुक्त राज्य अमरीका के साथ सुरक्षात्मक संधि की जिसमें जापान को केवल प्रतिरक्षा के हेतु सेना रखने की शर्त थी। १९५६ में रूस के साथ हुई संधि से परस्पर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई। उसी वर्ष जापान संयुक्त राष्ट्रसंघ का सदस्य हुआ।जापान केवल १४ वर्ष तक ही अंग्रेज़ो का गुलाम रहा था। प्राचीन काल right|thumb|300px|होर्यू-जी : इकारुगा का बौद्ध मन्दिर जापान का प्रथम लिखित साक्ष्य 57 ईस्वी के एक चीनी लेख से मिलता है। इसमें एक ऐसे राजनीतिज्ञ के चीन दौरे का वर्णन है जो पूरब के किसी द्वीप से आया था। धीरे-धीरे दोनो देशों के बीच राजनैतिक और सांस्कृतिक सम्बंध स्थापित हुए। उस समय जापानी एक बहुदैविक धर्म का पालन करते थे जिसमें कई देवता हुआ करते थे। छठी शताब्दी में चीन से होकर बौद्ध धर्म जापान पहुंचा। इसके बाद पुराने धर्म को शिंतो की संज्ञा दी गई जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - देवताओं का पंथ। बौद्ध धर्म ने पुरानी मान्यताओं को खत्म नहीं किया पर मुख्य धर्म बौद्ध ही बना रहा। बौद्ध धर्म के आगमान के साथ साथ लोग, लिखने की प्रणाली (लिपि) तथा मंदिरो का सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक कार्यों के लिए उपयोग भी जापान में चीन से आया। शिंतो मान्यताओं के अनुसार जब कोई राजा मरता है तो उसके बाद का शासक अपना राजधानी पहले से किसी अलग स्थान पर बनाएगा। बौद्ध धर्म के आगमन के बाद इस मान्यता को त्याग दिया गया। 710 ईस्वी में राजा ने नॉरा नामक एक शहर में अपनी स्थायी राजधानी बनाई। शताब्दी के अन्त तक इसे हाइरा नामक नगर में स्थानान्तरित कर दिया गया जिसे बाद में क्योटो का नाम दिया गया। सन् 910 में जापानी शासक फूजीवारा ने अपने आप को जापान की राजनैतिक शक्ति से अलग कर लिया। इसके बाद तक जापान की सत्ता का प्रमुख राजनैतिक रूप से जापान से अलग रहा। यह अपने समकालीन भारतीय, यूरोपी तथा इस्लामी क्षेत्रों से पूरी तरह भिन्न था जहाँ सत्ता का प्रमुख ही शक्ति का प्रमुख भी होता था। इस वंश का शासन ग्यारहवीं शताब्दी के अन्त तक रहा। कई लोगों की नजर में यह काल जापानी सभ्यता का स्वर्णकाल था। चीन से सम्पर्क क्षीण पड़ता गया और जापान ने अपना खुद की पहचान बनाई। दसवी सदी में बौद्ध धर्म का मार्ग चीन और जापान में लोकप्रिय हुआ। जापान मे कई पैगोडाओं का निर्माण हुआ। लगभग सभी जापानी पैगोडा में विषम संख्या में तल्ले थे। मध्यकाल मध्यकाल मे जापान में सामंतवाद का जन्म हुआ। जापानी सामंतों को समुराई कहते थे। जापानी सामंतो ने कोरिया पर दो बार चढ़ाई की पर उन्हें कोरिया तथा चीन के मिंग शासको ने हरा दिया। कुबलय खान तेरहवीं शताब्दी में कुबलय खान मध्य एशिया के सबसे बड़े सम्राट के रूप में उभरा जिसका साम्राज्य पश्चिम में फारस, बाल्कन तथा पूर्व में चीन तथा कोरिया तक फैला था। 1268 में उसने जापान के समुराईयों के सरगना के पास एक कूटनीतिक पत्र क्योटो भैजा जिसमें भारी धनराशि भैंट करने को कहा गया था, अन्यथा वीभत्स परिणामों की धमकी दी गई। जापानियों ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। युद्ध को रोका न जा सका। सन् 1274 में कुबलय खान ने लगभग 35,000 चीनी तथा कोरियाई सैनिकों तथा उनके मंगोल प्रधानो के साथ जापान की ओर 800 जहाजों में प्रस्थान किया। पर रास्ते में समुद्र में भीषण तूफान आने की वज़ह से उसे लौटना पड़ा। पर, 1281 में पुनः, कुबलय खान ने जापान पर चढ़ाई की। इस बार उसके पास लगभग 1,50.000 सैनिक थे और वह जापान के दक्षिणी पश्चिमी तट पर पहुंचा। दो महीनो के भीषण संघर्ष के बाद जापानियों को पीछे हटना पड़ा। धीरे धीरे कुबलय खान की सेना जापानियों को अन्दर धकेलती गई और लगभग पूरे जापान को कुबलय खान ने जीत लिया। पर, एक बार फिर मौसम ने जापानियों का साथ दिया और समुद्र में पुनः भयंकर तूफान आया। मंगोलो के तट पर खड़े पोतो को बहुत नुकसान पहुंचा और वे विचलित हो वापस भागने लगे। इसके बाद बचे मंगोल लड़कों का जापानियों ने निर्दयतापूर्वक कत्ल कर दिया। जापानियों की यह जीत निर्णायक साबित हुई और द्विताय विश्वयुद्ध से पहले किसी विदेशी सेना ने जापान की धरती पर कदम नहीं रखा। इन तूफानो ने जापानियों को इतना फायदा पहुंचाया कि इनके नाम से एक पद जापान में काफी लोकप्रिय हुआ - कामिकाजे, जिसका शाब्दिक अर्थ है - अलौकिक पवन। यूरोपीय प्रादुर्भाव सोलहवीं सदी में यूरोप के पुर्तगाली व्यापारियों तथा मिशनरियों ने जापान में पश्चिमी दुनिया के साथ व्यापारिक तथा सांस्कृतिक तालमेल की शुरूआत की। जापानी लोगों ने यूपोरीय देशों के बारूद तथा हथियारों को बहुत पसन्द किया। यूरोपीय शक्तियों ने इसाई धर्म का भी प्रचार किया। 1549 में पहली बार जापान में इसाई धर्म का आगमन हुआ। दो वर्षों के भीतर जापान में करीब तीन लाख लोग ऐसे थे जिन्होनें ईसा मसीह के शब्दों को अंगीकार कर लिया। ईसाई धर्म जापान में उसी प्रकार लोकप्रिय हुआ जिस प्रकार सातवीं सदी में बौद्ध धर्म। उस समय यह आवश्यक नहीं था कि यह नया धार्मिक सम्प्रदाय पुराने मतों से पूरी तरह अलग होगा। पर ईसाई धर्म के प्रचारकों ने यह कह कर लोगो को थोड़ा आश्चर्यचकित किया कि ईसाई धर्म को स्वीकार करने के लिए उन्हें अपने अन्य धर्म त्यागने होंगे। यद्यपि इससे जापानियों को थोड़ा अजीब लगा, फिर भी धीरे-धीरे ईसाई धर्मावलम्बियो की संख्या में वृद्धि हुई। 1615 ईस्वी तक जापान में लगभग पाँच लाख लोगो ने ईसाई धर्म को अपना लिया। 1615 में समुराई सरगना शोगुन्ते को संदेह हुआ कि यूरोपीय व्यापारी तथा मिशनरी, वास्तव में, जापान पर एक सैन्य तथा राजनैतिक अधिपत्य के अग्रगामी हैं। उसने विदेशियों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए तथा उनका व्यापार एक कृत्रिम द्वीप (नागासाकी के पास) तक सीमित कर दिया। ईसाई धर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया और लगभग 25 सालों तक ईसाईयों के खिलाफ प्रताड़ना तथा हत्या का सिलसिला जारी रहा। 1638 में, अंततः, बचे हुए 37,000 ईसाईयों को नागासाकी के समीप एक द्वीप पर घेर लिया गया जिनका बाद में नरसंहार कर दिया गया। आधुनिक काल 1854 में पुनः जापान ने पश्चिमी देशों के साथ व्यापार संबंध स्थापित किया। अपने बढ़ते औद्योगिक क्षमता के संचालन के लिए जापान को प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ी जिसके लिए उसने 1894-95 मे चीन तथा 1904-1905 में रूस पर चढ़ाई किया। जापान ने रूस-जापान युद्ध में रूस को हरा दिया। यह पहली बार हुआ जब किसी एशियाई राष्ट्र ने किसी यूरोपीय शक्ति पर विजय हासिल की थी। जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्रों का साथ दिया पर 1945 में अमेरिका द्वारा हिरोशिमा तथा नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के साथ ही जापान ने आत्म समर्पण कर दिया।( कक्षा 10 की इतिहास के अनुसार 14 अगस्त 1945 में जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया था।) इसके बाद से जापान ने अपने आप को एक आर्थिक शक्ति के रूप में सुदृढ़ किया और अभी तकनीकी क्षेत्रों में उसका नाम अग्रणी राष्ट्रों में गिना जाता है। इन्हें भी देखें जापानी साम्राज्य रूस-जापान युद्ध प्रथम चीन-जापान युद्ध द्वितीय चीन-जापान युद्ध बाहरी कड़ियाँ A SHORT HISTORY OF JAPAN A short history of Japan श्रेणी:जापान का इतिहास श्रेणी:जापान