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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

अल्लूरी सीताराम राजू

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right|thumb|300px|अल्लूरि सीताराम राजु अल्लूरि सीताराम राजु (అల్లూరి సీతారామ రాజు; 4 जुलाई 1897 – 7 म‌ई 1924) भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के एक क्रांतिकारी थे। परिचय आदिवासी स्वातंत्र्य प्रिय हैं, उन्हें किसी बंधन में अथवा पराधीनता में नहीं जक़डा जा सकता है, इसीलिये उन्होंने सबसे पहले जंगलों से ही विदेशी आक्रांताओं एवं दमनकारियों के विरुद्ध उनका यह संघर्ष देश के स्वतंत्र होने तक निरंतर चलता रहा। आज हम कह सकते हैं कि जंगलों के टीलों से ही स्वाधीनता की योजना का आरंभ हुआ। यह प्रकृति पुत्र हैं, इसीलिए जंगलों से ही स्वतंत्रता का अलख जगाया। ऐसे प्रकृति प्रेमी आदिवासी क्रांतिकारियों की लंबी शृंखला हैं। कई परिदृश्य में छाऐ रहे और कई अनाम रहे। जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन स्वतंत्रता के संघर्ष में गुजारा। ऐसे ही महान क्रांतिकारी अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म ४ जुलाई १८९७ को विशाखापट्टणम जिले के पांड्रिक गांव में हुआ। क्रांतिकारी, वीर राजू ने स्कूली शिक्षा के साथसाथ निजी रुचि के तौर पर वैद्यक और ज्योतिष का भी अध्ययन किया और यह अध्ययन उनके व्यावहारिक अभ्यास में भी लगा रहा। इसके कारण ही जब उसने युवावस्था में आदिवासी समाज को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित करना शुरू किया तो इन विधाओं की जानकारियों ने उसे अभूतपूर्व सहायता प्रदान की। राजू का पालनपोषण उसके चाचा अल्लूरी रामकृष्ण के परिवार में हुआ। इनके पिता अल्लूरी वेंकट रामराजू गोदावरी के माग्गूल ग्राम में रहते थे। उन्होंने बाल अवस्था में ही सीताराम राजू को यह बताकर क्रांतिकारी संस्कार दिए कि अंग्रेज ही तो हमें गुलाम बनाए हैं, जो देश को लूट रहे हैं। इन शब्दों की सीख के साथ ही पिता का साथ तो छूट गया, लेकिन विप्लव पथ के बीज लग चुके थे। युवावस्था में आदिवासीयों को अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध संगठित करना शुरू किया, जिसका आरंभ आदिवासीयों का उपचार व भविष्य की जानकारी देने से होता था। यही नहीं इस महान क्रांतिकारी ने महर्षि की तरह दो वर्ष तक सीतामाई नामक पह़ाडी की गुफा में अध्यात्म साधना व योग क्रियाओं से चिंतन तथा ताप विकसित किया। यही वह समय था, जब राजू ने आदिवासीयों और गिरिजनों की प़ीडा को करीब से जाना। उन्हें उठ ख़डा होने के लिए प्रेरित किया। राजू के क्रांतिकारी साथियों में बीरैयादौरा का नाम विख्यात है। बीरैयादौरा का प्रारंभ में अपना अलग संगठन था। वह भी आदिवासीयों का ही एक संगठन था, जिन्होंने अंग्रेजों से युद्ध छ़ेड रखा था। यह बात सन्‌ १९१८ की है। अनंतर अंग्रेजों ने बीरैयादौरा को एक मुठभ़ेड में गिरफ्तार कर लिया, उसे जेल में रखा, लेकिन वह जेल की दीवार कूदकर जंगलों में भाग गया। उसके बाद बीरैयादौरा ने दल से संपर्क ज़ोडकर ब्रिटिश सत्ता से संग्राम जारी रखा। जिसमें वो दोबारा जेल भेज दिए गए। अंग्रेज बीरैयादौरा को फांसी पर लटका देते, परंतु उस समय सीताराम राजू का संगठन बहुत प्रबल हो चुका था। पुलिस राजू से थरथर कांपती थी। वह ब्रिटिश सत्ता को खुलेआम चुनौती देता था। कैदी बीरैयादौरा के लिए भी उसने अंग्रेज सत्ता को पहले से सूचना भिजवा दी थी कि ‘मैं बीरैया को रिहा करवाकर रहूंगा। दम हो तो रोक लेना।’ वही हुआ। एक दिन पुलिस दल जब बीरैया को हथक़डीब़ेडी से कसे अदालत ले जा रहा था, सीताराम राजू ने पुलिस टुक़डी पर धावा बोला दिया। दोनों तरफ से गोलियां चलीं, लेकिन गोलियों की बौछार में भी पुलिस दस्ता राजू का बाल बांका न कर सका और वह दिनदह़ाडे खुलेआम ल़डकर बीरैयादौरा को छ़ुडा ले गया। अंग्रेजी सत्ता के लिए राजू तथा बीरैया की खोज एक समस्या बनी रही। पुलिस छापे विफल होते रहे। अंग्रेजों ने उसे पक़डवाने के लिए अखबारों व इश्तहारों में दस हजार रु नगद इनाम का एलान। सन्‌ १९२२-२४ में यह धनराशि एक ब़डा प्रलोभन था। गांधीजी ने राजू के लिए ठीक ही कहा था कि ‘उस वीरात्मा का त्यागबलिदान, मुसीबतोंभरा जीवन, सच्चाई, सेवाभावना, लगन, निष्ठा और अदम्य हिम्मत हमारे लिए प्रेरणाप्रद है’। सुभाषचंद्र बोस ने कहा था ‘देशवासी उस अप्रतिम योद्धा के सम्मान में विनत हों। उसकी समर्पणभावना देशानुराग, असीम धीरज और पराक्रम गौरव गरिमा मंडित है’। सीताराम राजू के संघर्ष और क्रांति की सफलता का एक कारण यह भी था कि आदिवासी अपने नेता को धोखा देना, उनके साथ विश्वासघात करना नहीं जानते थे। कोई भी सामान्य व्यक्ति मुखबिर या गद्दार नहीं बना। आंध्र के रम्पा क्षेत्र के सभी आदिवासी राजू को भरसक आश्रय, आत्मसमर्थक देते रहते थे। स्वतंत्रता संग्राम की उस बेला में उन भोलेभाले गृहहीन, वस्त्रहीन व सर्वहारा समुदाय का कितना ब़डा योगदान है कि अंग्रेजों के क़ोडे खाकर, लातघूंसे खाकर भी राजू को पक़डवा देना उन्हें स्वीकार नहीं हुआ। यही कारण है कि आज भी गोदावरी पार रम्पा क्षेत्र में कोई आदमी विश्वास नहीं करता कि राजू कभी पक़डा गया था और उसे ईस्ट कोस्ट स्पेशल पुलिस के चीफ कुंचू मेनन ने गोली मार दी। क्रांतिकारी बीरैया को ब्रिटिश कैद से रिहा करा लेने पर दोनों क्रांतिकारी राजू और बीरैया एकजुट हो गए, एक साथ काम करने लगे। अब राजू की शक्ति दुगुनी हो गई। दो अन्य क्रांतिकारी गाम मल्लू दौरा और गाम गन्टन दौरा भी राजू के दल में आ मिले। चारों ने संयुक्त छापेमारी के सिलसिले ऐसे चले कि अंग्रेज दमनकारी त्रस्त हो उठे। वे राजू का एक भी आदमी न तो मार सके न गिरफ्तार कर सके और राजू अनेक वषा] तक अंग्रेज सत्ता को नाकों चने चबाता रहा। क्रांतिकारी सीताराम राजू ने आंध्र क्षेत्र के सैक़डों नौजवानों में क्रांति की अलख जगाई थी। राजू के कहने पर नौजवान साथ ख़डे हो जाते थे, जिसके ऐतिहासिक प्रमाण १९२८ और १९२९ के आंध्र में तेलुगु में प्रकाशित साप्ताहिक अखबार कांग्रेस में मौजूद हैं। संपादक पदूरि अन्नपूर्णय्या ने लिखा है कि आंध्र के नौजवानों ने अगर किसी व्यक्ति के निर्देशन में अंग्रेजों से ल़डाई जारी रखी तो वह सीताराम राजू ही था और आंध्र के इतिहास में वह प्रथम संग्राम था। विप्लव पथ का पथिक बनकर क्रांतिकारी राजू ने अपना संगठन ख़डा करने के साथ उत्तराखंड के क्रांतिकारियों से सम्पर्क किया। यही नहीं गदर पार्टी के नेता बाबा पृथ्वी सिंह को दक्षिण भारत की राज महेन्द्री जेल से छ़ुडाने का भरसक प्रयास किया। सीताराम राजू गुरिल्ला पद्धति से युद्ध करते और नल्लईमल्लई पहा़डयों में अन्तर्धान हो जाते। गोदावरी नदी के पास फैली यह पहा़डयां राजू व उसके साथियों की आश्रयदात्री व प्रशिक्षण केन्द्र दोनों थी। यहीं वे युद्ध के गुर सीखते, अभ्यास करते व आक्रमण की रणनीति बनाते। इसी जगह को रम्पा कहा जाता था। राजू द्वारा चकमा देकर पहा़डयों में विलुप्त हो जाने की वजह से अंग्रेज उन्हें रम्पा फितूरी कहते थे। ब्रिटिश अफसर राजू से लगातार मात खाते रहे। आंध्र की पुलिस राजू के सामने व्यर्थ साबित हो चुकी थी। अंत में केरल की मलाबार पुलिस के दस्ते राजू पर लगाए गए, क्योंकि उन्हें पर्वतीय इलाकों में छापे मारने का अनुभव था। १२ अक्टूबर १९२२ को नल्लईमल्लई की पहा़डयों की घाटी में ये दस्ते रवाना किए गए। मलाबार पुलिस फोर्स से राजू की कई मुठभ़ेडें हुईं। इनमें मलाबार दस्तों को मुंह की खानी प़डी। उसके बाद भी पुलिस राजू को गिरफ्तार नहीं कर सकी। ६ मई १९२४ को राजू के दल का मुकाबला सुसज्जित असम राइफल्स से हुआ, जिसमें उसके साथी शहीद हो गए, पर राजू बचा रहा। अब ईस्ट कोस्ट स्पेशल पुलिस उसे पहा़डयों के चप्पेचप्पे में खोज रही थी। ७ मई १९२४ को जब वह अकेला जंगल में भटक रहा था, तो सहसा उसकी खोज में वन पर्वतों को छानते फिर रहे फोर्स के अफसर की नज़र राजू पर प़ड गई। उसने राजू का छिपकर पीछा किया। यद्यपि वह राजू को पहचान नहीं सका था, क्योंकि उस समय राजू ने लंबी द़ाढी ब़ढा ली थी। पुलिस दल ने राजू पर पीछे से गोली चलाई। राजू जख्मी होकर वहीं गिर प़डे। तब राजू ने स्वयं अपना परिचय देते हुए कहा कि ‘मैं ही सीताराम राजू हूं’ गिरफ्तारी के साथ ही यातनाएं शुरू हुई। अंततः उस महान क्रांतिकारी को नदी किनारे ही एक वृक्ष से बांधकर भून दिया गया। एक क्रांतिकारी की इससे श्रेष्ठ शहादत और क्या हो सकती थी। इस बलिदान के साक्ष्य थे गोदावरी नदी और नल्लईमल्लई की पहा़डयां, जहां आज भी अल्लूरी सीताराम राजू जिंदा है। आदिवासीयों की आत्मा में देवता स्वरूप। लोकगीतों में लोकनायक के रूप में। बाहरी कड़ियाँ अल्लूरि सीताराम राजु अल्लूरी सीताराम राजू, स्वतंत्रता संग्राम का गुमनाम नायक Mystery of Alluri Seetha Rama Raju Death https://web.archive.org/web/20140109055440/http://apwebtv.com/mystery-of-alluri-seetha-rama-raju-death/ 9 जनवरी 2014 श्रेणी:भारतीय क्रांतिकारी श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता का सशस्त्र संग्राम श्रेणी:1897 में जन्मे लोग श्रेणी:१९२४ में निधन श्रेणी:आंध्र प्रदेश के लोग