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411 समाचार
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सतपाल (पहलवान)

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जुलाई 2014 सतपाल भारत के प्रसिद्ध कुश्ती पहलवान हैं। वे १९८२ के एशियाई खेलों के स्वर्ण विजेता हैं। आजकल वे दिल्ली में पहलवानों के प्रशिक्षण में संलग्न हैं। ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार भी उनके शिष्य रहे हैं। सतपाल पहलवान को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। सतपाल आजकल दिल्ली के शिक्षा विभाग में उप शिक्षा निदेशक पद पर कार्य कर रहे हॅ। जन्म एवं शिक्षा thumb|right|300px सतपाल पहलवान का जन्म दिल्ली के बवाना गाँव में १९५५ ई० में हुआ। उनके पिता हुकम सिंह भी पहलवान थे। वो स्वयं गुरु हनुमान के शिष्य रह चुके थे। इनके पिता ने गाँव से बहार पहलवानी नहीं की। जब ये पांचवी कक्षा में पढ़ते थे, तो चार पांच बच्चों ने मिलकर इनको पीट दिया। बालक ने सतपाल ने घर आकर सारी घटना सुनाई। सतपाल के पिता उस समय नियमित अखाड़ा जाया करते थे। अगले दिन से वो बालक सतपाल को भी अखाड़ा ले जाने लगे। बस यहीं से सतपाल के कुश्ती के करियर की शुरुआत हो गयी। कुश्ती का प्रशिक्षण thumb|right|300px सतपाल के पिता ने देखा की बच्चे में अच्छी प्रतिभा है, तो उन्होंने छठी कक्षा में ही सतपाल को गुरु हनुमान की शरण में भेज दिया। धीरे-धीरे सतपाल कुश्ती और पढ़ाई में राम गए। पदकों और सम्मान का सिलसिला उन्होंने अपने स्कूल में ३५ किलो। भर वर्ग में पहला स्थान प्राप्त किया। गुरु हनुमान का विशेष आशीर्वाद उन्हें मिलना शुरू हो गया। इसके अगले वर्ष उन्होंने ४६ किलो। भारवर्ग में स्वर्ण पदक जीता। उसके बाद उनको पदकों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। १९७२ ई० में उनका चयन ओल्य्म्पिक गेम में हो गया। फिर उनका १९७४ के एशियाई खेलो में चयन हुआ। thumb|right|300px उन्होंने कांस्य पदक जीता जिसके परिणाम स्वरूप इनको भारत सरकार ने अर्जुन पुरुस्कार दिया। १९७५ में ही इन्होने मात्र १९ वर्ष की उम्र में भारत केसरी का ख़िताब जीता जो उस समय भारत का सबसे बड़ा ख़िताब मन जाता था। १९८२ के दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों में इन्होने विश्व चम्पिओं को हराकर स्वर्ण पदक जीता। इनकी वो कुश्ती स्वर्गीय इंदिरा गाँधी (तत्कालीन प्रधानमंत्री) ने भी देखी थी और विजय उपरत अपने गले लगा लिया था। इन्होंने एक दिन में २१ कुश्तियां जीतकर एक रिकॉर्ड कायम किया था। १९८३ में इनको पद्मश्री से सम्मानित किया गया। पुरस्कार और उपलब्धियां: १. एशियाई खेल १९७४, तेहरान : कांस्य पदक २. अर्जुन पुरस्कार (कुश्ती) १९७४ ३. राष्ट्रमण्डल खेल १९७४, ऑकलैंड : रजत पदक ४. एशियाई खेल १९७८, बैंकॉक : रजत पदक ५. राष्ट्रमण्डल खेल १९७८, अदमोंटों : रजत पदक ६. एशियाई खेल १९८२, दिल्ली : स्वर्ण पदक ७. राष्ट्रमण्डल खेल, १९८२, ब्रिस्बेन : रजत पदक कुश्ती प्रतियोगिता: १. एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता १९७९, रजत पदक २. एशियाई कुश्ती प्रतियोगिता १९८१, रजत पदक ३. विश्व कुश्ती प्रतियोगिता तेहरान, चौथा स्थान ४. विश्व कुश्ती प्रतियोगिता मंगोलिया, पांचवा स्थान ५. विश्व कुश्ती प्रतियोगिता अमेस्तार्दम, छठा स्थान शाकाहारी यह स्वयम शाकाहारी है और अपने पहलवानों को भी शाकाहारी होने की प्रेरणा देते है। पहलवानी के दिनों में ये रोजाना ८ से १० लीटर दूध, करीब आधा किलो घी, बादाम इत्यादि लेते थे। कुश्ती के प्रति योगदान इनके सुशील कुमार समेत ५२ अन्तरराष्ट्रीय शिष्य है। ये तक़रीबन ३०० शिष्यों को अपने अखाड़े में प्रशिक्षित करते है। कुश्ती के प्रति इनके योगदान के लिए सं २००९ में इनको द्रोणाचार्य पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। इनके शिष्य देश का नाम रोशन कर रहे है। श्रेणी:भारतीय पहलवान श्रेणी:कुश्ती श्रेणी:पहलवान श्रेणी:द्रोणाचार्य पुरस्कार के प्राप्तकर्ता श्रेणी:पद्मश्री प्राप्तकर्ता श्रेणी:एशियाई खेलों में भारतीय स्वर्ण पदक विजेता श्रेणी:अर्जुन पुरस्कार के प्राप्तकर्ता