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411 समाचार
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वैश्विक न्याय

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राजनीतिक दर्शन में वैश्विक न्याय (Global justice) का मुद्दा इस धारणा से जन्मा है कि मोटे तौर पर संसार अन्यायपूर्ण है। परिचय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लागू किये जा सकने वाले वैश्विक न्याय की संकल्पना जॉन रॉल्स की रचना 1999 में प्रकाशित 'द लॉ ऑफ़ पीपुल्स' से निकली है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना 'अ थियरी ऑफ़ जस्टिस' में एक बेहतर उदारतावादी समाज के संचालन के संदर्भ में भेदमूलक सिद्धांत के ज़रिये रेखांकित किया था कि आर्थिक और सामाजिक असमानताओं को कुछ इस तरह समायोजित किया जाना चाहिए कि हीनतम स्थिति वाले व्यक्ति को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हो। यहाँ रॉल्स का इरादा न्याय संबंधी इस युक्ति को राष्ट्र की सीमाओं में लागू करने का है। पर चार्ल्स बिज और फिर थॉमस पोगे का आग्रह था कि रॉल्स द्वारा प्रस्तुत इन सिद्धांतों को अंतर्राष्ट्रीय पैमाने लागू किया जाना चाहिए। उनकी दलील थी कि जिन कारणों से रॉल्स इन्हें एक राष्ट्र-राज्य के भीतर लागू करना चाहते हैं, वे वैश्विक स्तर पर भी मौजूद हैं। इन लोगों को उस वक्त निराशा हुई जब रॉल्स ने स्पष्ट किया कि उनके द्वारा दिया गया सिद्धांत वैश्विक न्याय से संबंधित नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न्याय की अपनी संकल्पना व्यक्त करने के लिए रॉल्स ने द लॉ ऑफ़ पीपुल्स (1999) की रचना करके उन कानूनों को स्पष्ट किया जिनके बारे में उनका मत है कि उनसे ‘सुव्यवस्थित लोग’ सहमत होंगे। रॉल्स ने सुव्यवस्थित लोगों की श्रेणी में उदारतावादी लोगों (पीपुल्स) और ‘शालीन ग़ैर- उदारतावादी लोगों’ को शामिल किया है। रॉल्स ने 'द लॉ ऑफ़ पीपुल' में यथार्थवादी यूटोपिया अपनाया है। रॉल्स के अनुसार यह यथार्थवादी इसलिए है कि इसमें कई वास्तविक स्थितियों पर ध्यान दिया गया है। मसलन, वास्तविक दुनिया में विविधता बहुत ज़्यादा है और दुनिया के सभी लोग न उदारतावादी मूल्यों को अपनाते हैं और न ही उनसे इन मूल्यों को अपनाने की उम्मीद भी की जा सकती है। अपने सिद्धांत का निर्माण कई स्तरों पर करते हुए सबसे पहले केवल उन लोगों पर ध्यान दिया है जो उदारतावादी हैं। उसके लिए उन्होंने दो मूल स्थितियों का प्रयोग किया है जिनमें पहली संवैधानिक लोकतांत्रिक शासन की उदारतावादी संकल्पना के लिए सामाजिक समझौते से संबंधित है। दूसरी मूल स्थिति उदारतावादी लोगों के प्रतिनिधियों के लिए है। पहली मूल स्थिति में लोग इस बात पर फ़ैसला करते हैं कि समाज की बुनियादी संरचना नियंत्रित करने की निष्पक्ष शर्तें क्या होंगी। उदारतावादी समाज के संचालक सिद्धांतों को सुनिश्चित करने के बाद रॉल्स अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तरफ़ मुड़ते हुए तय करते हैं कि उदारतावादी लोग किस तरह की विदेश नीति का चुनाव करेंगे। रॉल्स के मुताबिक इस मुकाम पर उदारतावादी लोगों के प्रतिनिधियों की आँखों पर एक विशिष्ट ‘अज्ञान का पर्दा’ पड़ा होता है। मसलन उन्हें यह जानकारी नहीं है कि वे किस भौगोलिक क्षेत्र से हैं और उसकी शक्तियाँ क्या हैं, आदि। रॉल्स स्पष्ट करते हैं कि उदारतावादी लोग आठ सिद्धांतों और तीन संस्थाओं का चुनाव करते हैं। इस मूल स्थिति में ग्रहण किये गये आठ सिद्धांतों में लोगों के समान होने, उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करने, उनके द्वारा समझौतों और किये गये वायदों का पालन करने, अ-हस्तक्षेप की नीति पर चलने और आत्मरक्षा पर ध्यान देने की बात की गयी है। साथ ही स्पष्ट किया गया है कि इन उसूलों के मुताबिक आत्मरक्षा के अलावा किसी भी अन्य कारण से युद्ध का सहारा नहीं ले सकते हैं। इसके अलावा इन आठ सिद्धांतों में इस बात पर जोर दिया गया है कि लोग मानवाधिकारों का समर्थन करेंगे, युद्ध के समय भी कुछ आचरण संबंधी पाबंदियों का पालन करेंगे और उनका कर्त्तव्य होगा कि वे ऐसे लोगों की मदद करें जो प्रतिकूल स्थितियों के कारण न्यायपूर्ण या मर्यादित या शालीन राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था हासिल नहीं कर पा रहे हैं। रॉल्स के अनुसार उदारतावादी लोगों द्वारा चुनी गयी तीन संस्थाओं में से एक संस्था लोगों के बीच न्यायपूर्ण व्यापार सुनिश्चित करेगी, दूसरी लोगों को कोऑपरेटिव बैंकिग संस्था से उधार लेने में समर्थ बनायेगी और तीसरी संस्था वही भूमिका निभायेगी जो संयुक्त-राष्ट्र द्वारा निभायी जाती है। रॉल्स के मुताबिक यह स्थिति कांफेडेरेशंस ऑफ़ पीपुल (राज्य नहीं बल्कि लोगों का परिसंघ) की है। उदारतावादियों के बाद रॉल्स का ध्यान उन लोगों पर जाता है कि किस तरह शालीन या मर्यादित ऊँच-नीच वाले लोग भी इस तरह के सिद्धांतों और संगठनों का चुनाव करेंगे। रॉल्स के अनुसार इस तरह के शालीन लोगों की श्रेणी में आने के लिए चार कसौटियों पर ख़रा उतरना आवश्यक है। ये चार कसौटियाँ हैं। पहली, समाज को आक्रामक नहीं होना चाहिए। उसे अपना काम इस तरह से करना चाहिए जो दूसरे समाजों के लिए शांतिपूर्ण और सम्मानजनक हो। दूसरी, इसकी कानूनी व्यवस्था और न्याय के विचार को समाज के सभी सदस्यों के बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा करनी चाहिए। इसे कम-से-कम हर किसी के जीवन के अधिकार यानी जीविका और सुरक्षा के अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार अर्थात् दासता से मुक्ति, व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार और औपचारिक समानता के अधिकार को मान्यता देनी चाहिए। रॉल्स मानते हैं कि उदारतावादियों और ग़ैर-उदारतावादियों की तरफ़ से इस तरह के अधिकारों के अधिकारों को मान्यता मिलना चाहिए। तीसरी, शालीन लोगों को ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए जिसमें कानूनी व्यवस्था का प्रशासन करने वाले लोगों को यह विश्वास हो कि कानून में सामान्य शुभ शामिल है। चौथी, शालीन लोगों के पास विचार-विमर्श की एक मर्यादित पदसोपानीय प्रक्रिया होनी चाहिए जिसमें समाज के सभी सदस्यों के अहम हितों को स्थान मिल सके। रॉल्स शालीन पदसोपानीय व्यक्तियों के उदाहरण के रूप में एक काल्पनिक स्थान कैज़ानिस्तान की कल्पना करते हैं। उनके अनुसार कैज़ानिस्तान को सुव्यवस्थित लोगों के एक समाज के रूप में देखा जा सकता है। उनका आग्रह है कि उदारतावादी समाज अपनी विदेश नीति में कैज़ानिस्तान जैसे राज्यों को सहन करने की क्षमता विकसित करें। रॉल्स के मुताबिक यथार्थवादी रूप से ज़्यादा-से-ज़्यादा कैज़ानिस्तान जैसी किसी व्यवस्था की ही उम्मीद की जा सकती है। वे इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि उदारतावादियों द्वारा शालीन ग़ैर- उदारतावादियों को प्रोत्साहित करते हुए इस बात पर ज़ोर नहीं देना चाहिए कि हर समाज उदारतावादी ही हो। ऐसे आग्रह से इन शालीन लोगों की जीवंतता ख़त्म हो सकती है। रॉल्स मानते हैं कि लोग उदारतावादी हों या ग़ैर-उदारतावादी, उनके बीच पारस्परिक सम्मान का कायम रहना सबसे ज़रूरी है। ग़रीब देशों को मदद करने के संदर्भ में भी सार्वदेशिकता के समर्थकों और रॉल्स के विचारों में अंतर है। रॉल्स मानते हैं कि कुछ समाजों में सुव्यवस्थित बनने के लिए आवश्यक राजनीतिक और सांस्कृतिक परम्पराओं, मानवीय पँूजी, ज्ञान, भौतिक तथा तकनीकी संसाधनों का अभाव होता है। सुव्यवस्थित लोगों का कर्त्तव्य है कि वे ऐसे समाजों को सुव्यवस्थित लोगों जैसा बनने में मदद करें। अर्थात् यहाँ न्यायपूर्ण (या शालीन) संस्थाओं की स्थापना करना ही उनका प्रमुख काम है। अतीत के बोझ से दबे या पिछड़े समाजों की मदद करने का यही लक्ष्य है। रॉल्स के अनुसार एक बार यह लक्ष्य हासिल हो जाने पर आगे किसी मदद की ज़रूरत नहीं रहती, भले ही यह समाज तुलनात्मक रूप से ग़रीब बनारहे। रॉल्स के अनुसार किन्हीं ख़ास समाजों की सम्पन्नता में उस समाज की राजनीतिक संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। सम्पत्ति जमा संसाधनों से नहीं बल्कि किसी ख़ास समाज की राजनीतिक संस्कृ ति से उत्पन्न होती है। इसमें उस समाज की राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं की बुनियादी संरचना को पुष्ट करने वाली धार्मिक, दार्शनिक और नैतिक परम्पराएँ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अलावा अध्यवसाय और सहयोग की प्रवृत्ति की भी बड़ी भूमिका होती है। दरअसल ये सभी पहलू मिल कर किसी समाज की सम्पन्नता बढ़ाते हैं। रॉल्स इन्हीं कारणों के आधार पर अ थियरी ऑफ़ जस्टिस में पेश किये गये न्याय के सिद्धांत को राज्यों के बीच अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का विरोध करते है। रॉल्स की स्पष्ट मान्यता है कि एक बार लोगों को आत्म-निर्धारण में और ‘तार्किक रूप से’ अपने मामलों के बारे में समर्थ बना देने के बाद मदद करने का कर्तव्य ख़त्म हो जाता है। कई आलोचकों का विचार है कि रॉल्स ‘पीपुल’ (या लोगों) से संबंधित विचार पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं है। रॉल्स का यह मानना ग़लत है कि राज्य एक-दूसरे से इतने स्वतंत्र होते हैं कि उन्हें अपने नागरिक की स्थिति के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। दरअसल, एक भेदभाव- आधारित अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था की मौजूदगी भी ख़ास राज्यों की ग़रीबी और कुछ सम्पन्नता के लिए ज़िम्मेदार होती है। थॉमस पोगे ने स्पष्ट किया है कि दो अंतर्राष्ट्रीय अधिकार ख़ासतौर पर भूमिका निभाते हैं : पहला अंतर्राष्ट्रीय उधार विशेषाधिकार और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन विशेषाधिकार। कोई सरकार अपने राज्य में अपनी शक्तियों का किस तरह प्रयोग कर रही है, इसकी चिंता अंतर्राष्ट्रीय समुदाय नहीं करता। उसे इस बात से भी बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता है कि यह समूह सत्ता में कैसे आया या यह अपनी सत्ता का इस्तेमाल कैसे कर रहा है। दमनकारी सरकारें अपने देश की ओर से उधार ले सकती हैं— यह उनका अंतर्राष्ट्रीय संसाधन विशेषाधिकार होता है, या वे अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों को बेच सकती हैं— यह इनका अंतर्राष्ट्रीय संसाधन विशेषाधिकार होता है। पोगे के अनुसार चूँकि इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमीर देशों को फ़ायदा होता है, इसलिए वे भी इस स्थिति को स्वीकार कर लेते हैं। इसलिए हमें आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए। पोगे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सम्पन्न विकसित समाजों में रहने वाले लोगों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे अन्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था को ख़त्म करें और ग़रीब लोगों को इससे होने वाले नुकसानों से बचाएँ। पोगे यह सुझाव देते हैं कि लगभग एक प्रतिशत का वैश्विक संसाधन टैक्स लगना चाहिए जिसका इस्तेमाल विकासशील समाजों के सबसे ग़रीब लोगों की भलाई के लिए हो। विकसित समाज के लोगों का यह दायित्व है कि ग़रीब समाज के लोगों की मदद करें। रॉल्स ने आर्थिक रूप से दुनिया के ग़रीबों की मदद करने के किसी स्पष्ट दायित्व को रेखांकित नहीं किया है, जबकि थॉमस पोगे ने रॉल्स से आगे जाते हुए इस पर ज़ोर दिया कि अमीर लोगों का दायित्व है कि वे ग़रीब लोगों की मदद करें। लेकिन पोगे ने जिस रूप में वैश्विक न्याय की कल्पना की उसकी मुख्य सीमा यह है कि यह सिर्फ़ सम्पन्न देशों के लोगों की नैतिक एजेंसी का ही आह्वान करती है। लेकिन ग़रीब लोगों की एजेंसी पर कोई ध्यान नहीं दिया है। अर्थात् इस सिद्धांत में इस बात की पूरी तरह से उपेक्षा की जाती है कि ग़रीब लोग वैश्विक अन्याय या न्याय को किस रूप में देखते हैं। कुल मिला कर रॉल्स, बिज या पोगे के बीच का सिद्धांतीकरण अमीर देशों के लोगों के बीच में चलने वाला विमर्श लगता है। सन्दर्भ 1. थॉमस पोगे (2002), वर्ल्ड पॉवर्टी ऐंड ह्यूमन राइट्स, पॉलिटी प्रेस, केम्ब्रिज. 2. जॉन रॉल्स (1999), द लॉ ऑफ़ पीपुल्स, हार्वर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, केम्ब्रिज, मेसाचुसेट्स. 3. जॉन रॉल्स (1971), अ थियरी ऑफ़ जस्टिस, द बेलनैप प्रेस, हार्वर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, केम्ब्रिज.