411 REFERENCE · Wikipedia
निम्बार्क कोट
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
अंगूठाकार|300px|निम्बार्क कोट का मुख्य द्वार
निम्बार्क कोट उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में स्थित निम्बार्क सम्प्रदाय का एक प्रमुख मंदिर है। यद्यपि आकार में यह एक सामान्य इमारत जैसा है, लेकिन वृन्दावन की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में इसका एक विशिष्ट स्थान है। 'निम्बार्क कोट' शब्द में 'निम्बार्क' संप्रदाय के मुख्य आचार्य को दर्शाता है, जबकि 'कोट' का अर्थ किला या वह स्थान है जहाँ आचार्य विराजमान हों।
यह मंदिर विशेष रूप से 'निम्बार्क जयन्ती' के अवसर पर आयोजित होने वाले एक मासीय समारोह के लिए जाना जाता है, जो यहाँ सन् 1924 से मनाया जा रहा है।https://archive.org/details/shri-nimbarka-vratotsav-nirnaya-2080/page/n9/mode/1up निम्बार्क पीठ के व्रतोत्सव निर्णय में कार्तिक-मार्गशीष मास Archive.org hihttps://www.nimbarksocialwelfare.com/index.php/saints/ संत सेक्शन में निम्बार्क कोट का उल्लेख Nimbark Social Welfare 17 मार्च 2026 27 मई 2025 https://web.archive.org/web/20250527163451/https://www.nimbarksocialwelfare.com/index.php/saints/ dead सन् 1923 तक यह उत्सव प्रेम गली स्थित 'उत्सव कुंज' में मनाया जाता था। वर्ष 2025 में इस उत्सव का 182वाँ आयोजन किया गया। इस उत्सव का एक प्रमुख आकर्षण वैष्णव संगीत शैली का 'समाज गायन' है।
निम्बार्क सम्प्रदाय, वैष्णव धर्म के चार प्रमुख सम्प्रदायों में से एक है, जिसे 'सनकादिक' या 'कुमार सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। वैष्णव वे हैं जो विष्णु या उनके अवतारों (विशेषकर राम और कृष्ण) की अपने इष्ट के रूप में उपासना करते हैं। (अन्य तीन प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय हैं: श्री सम्प्रदाय, ब्रह्म या गौड़ीय सम्प्रदाय, और रुद्र या विष्णुस्वामी सम्प्रदाय)।
ब्रज की परंपरा में निम्बार्क संप्रदाय के तीन प्रमुख आचार्य माने जाते हैं: आद्याचार्य (हंस एवं सनकादिक), प्रवर्तकाचार्य (निम्बार्क) और रसिकोपासनाचार्य (हरिव्यास देवाचार्य)। निम्बार्क संप्रदाय में 12 'द्वारे' (शाखाएँ) हैं, जिनमें से निम्बार्क कोट मंदिर 'स्वयंभूराम देवाचार्य द्वारे' की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। हरिव्यास देवाचार्य के 12 प्रमुख शिष्यों में स्वयंभूराम देवाचार्य सबसे वरिष्ठ माने जाते हैं। संप्रदाय की मुख्य पीठ राजस्थान के किशनगढ़ स्थित सलेमाबाद (निम्बार्क तीर्थ) में है।
स्वयं निम्बार्काचार्य राधा सर्वेश्वर शरण देवाचार्य (श्रीजी महाराज) निम्बार्क कोट तीन बार आए थे। अपने एक प्रवास के दौरान उन्होंने उल्लेख किया था कि उन्होंने पुराना बजाजा के ऋषि बाल्मीकि स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी और वे अक्सर निम्बार्क कोट के प्रांगण में खेला करते थे। सुदामा कुटी की स्थापना करने वाले बाबा सुदामा दास जब रामानंदाचार्य जयंती के लिए मधुकरी (भिक्षा) लेने आते थे, तो वे विश्राम के लिए निम्बार्क कोट के जगमोहन में ही रुकते थे।
गीता के मर्मज्ञ संत स्वामी रामसुखदास अपने प्रवचनों में उल्लेख किया करते थे कि यदि वे एकादशी के दिन वृंदावन में होते, तो मधुकरी के लिए निम्बार्क कोट ही जाते क्योंकि वहाँ फलाहारी मधुकरी उपलब्ध होती थी। मंदिर प्रशासन के अनुसार, यहाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा उपयोग किया गया एक ऐतिहासिक लोटा भी संरक्षित है, जिसमें संतों का चरणामृत रखा जाता है, जिसकी श्रद्धालुओं में अपार महिमा है।https://www.facebook.com/groups/surshyamofficial/posts/2281732275629854/ बाबा राजेंद्र दास जी महाराज निम्बार्क कोट में मौजूद तुलसीदास जी के लोटे का प्रसंग Video Facebook वर्तमान निम्बार्काचार्य श्यामा शरण देवाचार्य भी निम्बार्क कोट पधार चुके हैं।
2025 की अक्षय तृतीया (29 अप्रैल) से 2026 की अक्षय तृतीया (20 अप्रैल) तक निम्बार्क कोट में एक वर्ष का शताब्दी वर्ष महोत्सव मनाया गया। हर महीने एक भागवत कथा हुई, वर्ष भर के दौरान भागवत के 100 मूल पाठ हुए, 50 दिन समाज गायन हुआ, रासलीला हुई, 21 भंडारे हुए, शोभायात्रा निकली, फूल बंगला बना, भगवान के श्रीविग्रह का सर्वांग अभिषेक दर्शन हुआ जिसमें वृंदावन के संतों, महंतों व ब्रजवासियों ने हिस्सा लिया। निम्बार्क कोट शताब्दी वर्ष समारोह संपन्न:अक्षय तृतीया पर सर्वांग अभिषेक हुआ, फूलबंगले में विराजे राधारमण लाल,एक वर्ष से चल रहा था शताब्दी वर्ष महोत्सव, 20 अप्रैल, 2026 को दैनिक भास्कर न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित https://www.bhaskar.com/local/uttar-pradesh/mathura/news/vrindavan-nimbark-kot-shatabdi-mahotsav-sampann-akshay-tritiya-utsav-137745038.html
नोट: निम्बार्क कोट नाम का एक अन्य मंदिर अजमेर (राजस्थान) में पृथ्वीराज रोड पर भी स्थित है। वृंदावन के इतिहास में 'हरि' नाम वाले तीन प्रमुख आचार्य हुए हैं, जिन्हें 'हरित्रयी' कहा जाता है—स्वामी हरिदास (बांके बिहारी के प्राकट्यकर्ता), हित हरिवंश (राधाबल्लभ के प्राकट्यकर्ता) और हरिराम व्यास (जुगल किशोर के प्राकट्यकर्ता)।
दशश्लोकी की प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपि
निम्बार्क संप्रदाय के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक दशश्लोकी की प्राचीन हस्तलिखित प्रति निम्बार्क कोट का पांडुलिपि संग्रह में उपलब्ध है। वृंदावन शोध संस्थान से प्रकाशित कमलेश पारीक की पुस्तक दशश्लोकी के पेज-4 पर इसका उल्लेख है कि दशश्लोकी की विक्रम संवत् 1917 की प्रति श्रीजी मंदिर के संग्रहालय में है, पडरौना वाली कुंज और निम्बार्क कोट में भी इसकी प्रतियां मौजूद है। https://www.nimbarksocialwelfare.com/nimbark-books/Dashashloki-DR-Shimati-Kamlesh-Parik3.pdf दशश्लोकी कमलेश पारीक Vrindavan Research Institute, Vrindavan
ब्रज के साहित्य में निम्बार्क कोट
सन् 1968 में प्रकाशित प्रभुदयाल मीतल की पुस्तक ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास (पृष्ठ 550) में निम्बार्क कोट का उल्लेख करते हुए लिखा गया है: "निम्बार्क कोट—यह देवस्थल वृंदावन की छीपी गली में है। इसका निर्माण आचार्य स्वयंभूराम जी की शिष्य परंपरा के बालगोविंद दास जी ने कराया था। उन्होंने सर्वप्रथम आचार्य पंचायतन की स्थापना वृंदावन में की थी। यहाँ निम्बार्कोत्सव बड़े समारोह पूर्वक होता है।"ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास प्रभुदायल मीतल 1968 550 https://ia601509.us.archive.org/13/items/in.ernet.dli.2015.401809/2015.401809.Brij-Ke.pdfब्रजमंडल परिक्रमा अनुरागी महाराज 2009 278-279
इसी पुस्तक के पृष्ठ 539 व 540 पर गोपाल दास, हंसदास और बालगोविंद दास का परिचय दिया गया है:
गोपालदास ‘उत्सवी’: इनका जन्म संवत 1872 (कुछ स्रोतों में 1868) के आसपास एक गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। चार धाम की यात्रा के बाद वे कामवन के गोपाल मंदिर में रहे और बाद में वृंदावन आ गए। उन्होंने निम्बार्क संप्रदाय के आचार्यों की जयंती मनाना और बड़े स्तर पर रास और भागवत-कथा का आयोजन प्रारंभ किया। उनके शिष्यों में हंसदास और ब्रह्मचारी राधेश्याम प्रमुख थे। संवत 1952 में उनका निधन हुआ। गोपालदास भक्तमाल की कथा अत्यंत सरसता से करते थे। भक्तमाल की कथा की जो वर्तमान शैली है, उसका सूत्रपात इन्होंने ही किया था।
हंसदास: संवत 1916 में लखनऊ के काकोरी में जन्मे हंसदास, महात्मा गोपालदास के शिष्य थे। वे भागवत के प्रसिद्ध वक्ता थे। सन् 1937 में वृंदावन के निम्बार्क कोट परिसर में उनका देहावसान हुआ।श्री हंसदास जी एवं गोपाली बाई जी का चरित्र - भक्तमाल कथा https://www.youtube.com/watch?v=gmBMH3140kw&t=5s YouTube उन्होंने 'सिद्धांत रत्नांजलि', 'कृष्ण सिद्धांत सार', 'राधा रहस्य प्रकाशिका',राधा रहस्य प्रकाशिका बाबा हंसदास https://archive.org/details/ShriRadhaRahashyaPrakashika 'निम्बार्क प्रभा',निम्बार्क प्रभा बाबा हंसदास https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.343527/page/n1/mode/2up और 'गोदनावारी लीला' जैसे ग्रंथ लिखे। 'गोदनावारी लीला' निम्बार्क कोट के सालाना महोत्सव में अनिवार्य रूप से प्रदर्शित होती है। उन्होंने केशव काश्मीरी भट्ट देवाचार्य का उत्सव भी शुरू किया।
बालगोविंददास: ये हंसदास के विरक्त शिष्य थे। उन्होंने ही वृंदावन की नाज मंडी में मंदिर बनवाकर आचार्य पंचायतन की प्रतिष्ठा की और निम्बार्क कोट का निर्माण कराया था।निम्बार्क संप्रदाय और उसके कृष्ण भक्त हिंदी कवि नारायण दत्त शर्मा 1964 उनके द्वारा कथा-कीर्तन और उत्सव नियमित रूप से किए जाते थे।
सन् 1940 में प्रकाशित पुस्तक निम्बार्क माधुरी में बाबा गोपालदास जी और बाबा हंसदास जी महाराज के बारे में कथाएं वर्णित हैं । http://archive.org/details/shri-nimbarka-madhuri Shree Nimbarka Madhuri Nimbarka Sampradaya
सन् 1981 में अवध बिहारी लाल कपूर द्वारा लिखित पुस्तक ब्रज के भक्त (भाग-2, पृष्ठ 13 व 86) में भी इन संतों का विस्तृत वर्णन मिलता है।ब्रज के भक्त (भाग-2) अवध बिहारी लाल कपूर https://dn790006.ca.archive.org/0/items/HindiBook-brijKeBhaktaByA.b.l.kapoorpart-2/HindiBook-brijKeBhaktaByA.b.l.kapoorpart-2.pdf
सन् 1986 में श्रीजी मंदिर की पत्रिका श्रीसर्वेश्वर के वृंदावनांक (ब्रजबल्लभ शरण और प्रो. गोविंद शर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित) के पेज-349-350 पर गोपालदास जी, हंसदास जी और बालगोविंद दास जी की कथा है, फिर पेज-401 पर निम्बार्क कोट मंदिर और पेज-414 पर निम्बार्क जयंती उत्सव का उल्लेख है।
1992 में दिल्ली के अभिनव प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘कृष्ण द लिविंग गॉड ऑफ ब्रज’ (लेखक- डी. आनंद) में पेज-108-109 पर ब्रॉडस्प्रेड में मंदिर के गर्भगृह का चित्र विवरण के साथ प्रकाशित हुआ। https://books.google.co.in/books?id=EsvSwdUgQYcC&printsec=frontcover&source=gbs_ge_summary_r&cad=0#v=onepage&q&f=false Krishna: The Living God of Braj Anand D. 1992 Abhinav Publications 978-81-7017-280-2 en
2011 में वृंदावन के हरिनाम प्रेस से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका श्री हरिनाम का 465वां अंक जो जनवरी, 2011 में प्रकाशित हुआ, इसमें निम्बार्क कोट को कवर स्टोरी के रूप में शामिल किया गया और कवर पेज पर मंदिर में विराजमान ठाकुर श्री राधारमण लालजी की तस्वीर प्रकाशित हुई।
इस मंदिर की परंपराओं पर अमर उजाला (2014), दैनिक जागरण (2014) और इंडिया टुडे (2015) में भी लेख प्रकाशित हो चुके हैं।निम्बार्क संप्रदाय का मूक साक्षी है वृंदावन का निम्बार्क कोट मंदिर http://nimbarkkoat.blogspot.com/2016/05/blog-post.html Blogspot Archives 2016 की नोटबंदी के दौरान इस उत्सव पर पड़े प्रभाव को 'इंडियन एक्सप्रेस' ने भी कवर किया था।Demonetisation: Donations dry up at temples, dargahs https://indianexpress.com/article/india/india-news-india/demonetisation-uttar-pradesh-donations-dry-up-at-temples-dargahs-anger-over-media-lies-4397392/ The Indian Express 2016
मंदिर का विवरण
अंगूठाकार|राधारमण लालजी
मंदिर के गर्भगृह के मध्य सिंहासन पर श्रीराधारमणलालजी का विग्रह विराजमान है। युगल सरकार के दोनों ओर निम्बार्क आचार्य पंचायतन स्थित हैं। दाहिनी ओर आद्य आचार्य हंस भगवान, उनके मानस पुत्र (सनक, सनंदन, सनातन व सनतकुमार) और शिष्य नारद जी की प्रतिमाएँ हैं। बाईं ओर निम्बार्क भगवान व उनके शिष्य निवासाचार्य प्रतिष्ठित हैं।
अंगूठाकार|निम्बार्क कोट मंदिर का आंगन
गर्भगृह के आगे जगमोहन और एक खुला प्रांगण है, जिनका फर्श काले-सफेद संगमरमर का बना है। जगमोहन में मंदिर के संस्थापक बाल गोविंद दास व उनके छोटे भाई हरिदास श्रृंगारी के चित्रपट स्थापित हैं। गर्भगृह के बाहर चरणपादुकाएं बनी हैं, जहाँ गोपालदास और हंसदास के चित्र हैं। मंदिर में कई प्राचीन चित्र भी मौजूद हैं, जिनमें निम्बार्क भगवान का सर्वेश्वर भगवान की आराधना करते हुए रंगीन चित्र विशेष है। गर्भगृह में राधारमण लाल जी के ठीक पीछे दो सौ साल पुरानी चित्र श्रृंखलाएं हैं, जिनमें निम्बार्क भगवान के विभिन्न रूपों का चित्रण है।
अंगूठाकार|निम्बार्क कोट का आंगन
वास्तुशिल्प की दृष्टि से गर्भगृह में सिंहासन, दीवारें व फर्श संगमरमर के हैं। जगमोहन में इटेलियन टाइल्स का प्रयोग हुआ है। प्रांगण के तीनों ओर बरामदे हैं और राजस्थानी पत्थर के नक्काशीदार खंभे लगे हैं। पश्चिमी ओर एक अतिरिक्त प्रांगण है जहाँ मंदिर का रसोईघर स्थित है।
विशेष: वृंदावन के तीन प्रमुख मंदिरों में राधारमण लालजी विराजमान हैं—सप्तदेवालयों में से एक राधारमण मंदिर, शाहजी मंदिर, और निम्बार्क कोट।
मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख उत्सव
श्री निम्बार्क आचार्य वृंद जयंती महोत्सव
यह मंदिर का सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव है, जो कार्तिक कृष्ण पंचमी से मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण पंचमी तक पूरे एक महीने चलता है। इस दौरान संप्रदाय के कई प्रमुख आचार्यों की जयंती मनाई जाती है: बालगोविंद दास की जयंती (कार्तिक कृष्ण पंचमी), महावाणीकार हरिव्यास देवाचार्य जयंती (कार्तिक कृष्ण द्वादशी), स्वयंभूराम देवाचार्य जयंती (कार्तिक शुक्ल अष्टमी), हंस भगवान व सनकादिक भगवान जयंती (अक्षय नवमी), माधव भट्टाचार्य जयंती (देवउठनी एकादशी), और निम्बार्क भगवान की जयंती (पूर्णिमा)।
इस उत्सव में दीपावली, अन्नकूट और गोपाष्टमी जैसे पर्व भी शामिल होते हैं। प्रतिदिन शाम को आचार्यों की चरित्र कथा होती है, समाज गायन किया जाता है और नित्य रासलीलाएं आयोजित होती हैं। पूर्णिमा के दिन निम्बार्क भगवान का पंचामृत अभिषेक होता है और एक विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है।
हर दिन मंदिर के जगमोहन में एक सिंहासन पर गोपालदास के सेव्य गोपालजी (जिन्हें महंतजी पुकारा जाता है) और निम्बार्क भगवान के चित्रपट विराजमान होते हैं。https://vrindavantoday.in/nimbark-temples-of-chhipi-gali-nimbark-kot-ajab-manohar-lal/ छीपी गली का निम्बार्क कोट मंदिर Vrindavan Today समाज गायन में 'चलसखी', 'सहज सुख सजनी', 'हेली' जैसे पद गाए जाते हैं और अंत में "सेवों श्री राधारमण उदार" तथा "जय जय श्री राधारमण विराजैं" का गायन होता है। रासलीला में सबसे विशेष 'गोदनावारी लीला' है। भंडारे में द्वादशी को बूंदी, नवमी को मोहनथार, एकादशी को समा की खीर और निम्बार्क भगवान के छठी उत्सव में लड्डू का भोग लगता है। भंडारे की विशेष 'गड्ड सब्जी' (मिली-जुली) और लड्डू स्थानीय स्तर पर काफी प्रसिद्ध हैं।IAVRI Bulletin, Issue 1-12 International Association of the Vrindavan Research Institute 1975
कार्तिक उत्सव की रासलीलाओं का क्रम
कार्तिक कृष्ण द्वादशी (धनतेरस): वंशी चोरी लीला
कार्तिक कृष्ण चौदस: केवट लीला
कार्तिक अमावस (दीपावली): चौसर लीलानिम्बार्क कोट में दीपावली को होने वाली चौसर लीला https://www.youtube.com/watch?v=ZOQ3fmJZlBE YouTube
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा: मूदरी चोरी लीला
कार्तिक शुक्ल द्वितीया: पनघट लीला
कार्तिक शुक्ल तृतीया: ब्रह्मचारी लीला
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी: विदुषी लीला
कार्तिक शुक्ल पंचमी: शंकर लीला
कार्तिक शुक्ल छठी: पांडे लीला
कार्तिक शुक्ल सप्तमी: राधा प्राकटय लीला
कार्तिक शुक्ल अष्टमी (गोपाष्टमी): गोचारण लीला
कार्तिक शुक्ल नवमी (अक्षय नवमी): जोगन लीला
कार्तिक शुक्ल दशमी: श्याम सगाई लीला
कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी): वरुण लीला
कार्तिक शुक्ल द्वादशी: मान लीला
कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी: माखन चोरी लीला
कार्तिक शुक्ल चर्तुदशी: गोदनावारी लीला
कार्तिक पूर्णिमा: सहज सुख के साथ केवल स्वरूप दर्शन
अग्रहायण कृष्ण प्रतिपदा: शोभायात्रा
अग्रहायण कृष्ण द्वितीया: राजदान लीला
किसी वर्ष तिथि बढ़ने पर चंद खिलौना, मणि खंभ और सुदामा लीला भी की जाती हैं। पिछले 30 वर्ष से स्वामी अमीचंद शर्मा की मंडली रासलीला करती है। अतीत में दामोदरजी, उदय राम, कन्हैयालाल, शिवदयाल-गिर्राज की मंडलियों ने भी यहाँ रासलीलाएं की हैं।Nimbarka Acharya-Vrinda Jayanti Mahotsava https://a108.net/blogs/entry/1690-nimbarka-acharya-vrinda-jayanti-mahotsava-to-commence-from-monday/ A108.net International Vaishnavas Portal 17 मार्च 2026 14 अप्रैल 2021 https://web.archive.org/web/20210414040304/https://www.a108.net/blogs/entry/1690-nimbarka-acharya-vrinda-jayanti-mahotsava-to-commence-from-monday/ dead
भंडारे में कीर्तन व जयकारे
बड़े भंडारे के दिन जब ठाकुरजी को भोग लगता है तब समाजी मंदिर में भोग के पद गाते हैं (जैसे 'भोजन कुंज में आए दोउ')। पंगत बैठने और परोसगारी के दौरान साधु-संतों द्वारा निम्नलिखित कीर्तन किए जाते हैं:
सीता राम सीता राम सीता राम जय सियावर राम। राधे श्याम राधे श्याम राधे श्याम जय श्यामा श्याम।
सिया हरिनारायण गोविंदे, भज रामा कृष्ण गोविंदे। बोलो संतो हरि हरि, मुख पर मुरली अधर धरी।
गोविंद गोविंद गाओगे, प्रेम पदारथ पाओगे। गोविंद नाम बिसारोगे, जीती बाजी हारोगे।
राम राम भज बारंबारा, चक्र सुदर्शन है रखवारा।
जय जय गोपी जय जय ग्वाल, जय जय सदा बिहारी लाल। गले में तुलसी, मुख में राम, हृदय विराजत शालिगराम।
जब पंगत पर पूर्ण भोजन आ जाता है, तब एक विस्तृत जयकारा लगाया जाता है:
राम कृष्णदेव की जय, राधासर्वेश्वर की जय, राधामाधव की जय, राधा रमण लालजी की जय, आनंद मनोहर की जय, रूप मनोहर की जय, वृंदावनचंद्र की जय, गोवर्धन चंद्र की जय, गोविंद देव की जय, मदनमोहन की जय, गोपीनाथ की जय, गोकुल चंद्रमा की जय, बांके बिहारी लाल की जय, वृंदावन बिहारी लाल की जय, राधाबल्लभ लाल की जय, जुगल किशोर की जय, रसिक बिहारी की जय, बिहारी बिहारिन की जय, कुंज बिहारी लाल की जय, गिरिराज धरण की जय, राधा श्याम सुंदर की जय, राधा दामोदर की जय, लाड़ली लाल की जय, रास बिहारी लाल की जय, यशोदा नंदन की जय, नंद नंदन की जय, नंदगांव बरसाना की जय, विलासगढ़ की जय, नीम गांव की जय, मानसी गंगा की जय, वृंदावन धाम की जय, मधुपुरी अवधपुरी की जय, काशी प्रयाग की जय, गंगा-जमुना की जय, चारों धाम की जय, चार संप्रदाय की जय, हंस भगवान की जय, सनकादिक भगवान की जय, नारद भगवान की जय, निम्बार्क भगवान की जय, निवासाचार्य की जय, द्वादश आचार्यन की जय (विश्वाचार्य, पुरुषोत्तामाचार्य, विलासाचार्य, स्वरूपाचार्य, माधवाचार्य, बलभद्राचार्य, पद्माचार्य, श्यामाचार्य, गोपालाचार्य, कृपाचार्य, देवाचार्य), अष्टादश भट्ट आचार्यन की जय (सुंदर भट्ट, पद्मनाभ भट्ट, उपेंद्र भट्ट, रामचंद्र भट्ट, वामन भट्ट, कृष्णभट्ट, पद्माकर भट्ट, वाण भट्ट, भूरि भट्ट, माधव भट्ट, श्याम भट्ट, गोपाल भट्ट, बलभद्र भट्ट, गोपीनाथ भट्ट, केशव भट्ट, गांगल भट्ट, केशव कश्मीरी भट्ट, श्रीभट्ट, हरिव्यास देवाचार्य, स्वयंभूराम देवाचार्य, कर्णहर देव, नारायण देव, हरिदेव, श्याम देव, श्याम दामोदर देव, श्रुति देव, सहजराम देव, रामदेव, ज्ञानदेव, वृंदावन देव, रामशरण देव, धर्म देव, सेवादास जी), महंत गोपाल दास जी की जय, बाबा हंसदास जी की जय, बाबा बालगोविंद दास जी की जय, श्रृंगारी जी की जय, मैया जी श्यामप्यारी की जय, भैया बांके बिहारी की जय, अनंत कोटि वैष्णवन की जय, स्थान पुरुष की जय, रसोइया पुजारी की जय, कोठारी भंडारी की जय, सब सती सेवकन की जय, उनके माता पिता की जय, उनके बाल गोपाल की जय, उनके समस्त परिकर की जय, अपने-अपने गुरु गोविंद की जय।
अंत में सभी एक साथ दोहा पढ़ते हैं:
बोलना हरे...राम कहें सुख ऊपजे, कृष्ण कहें दुःख जाय। महिमा महाप्रसाद की, पावो प्रीति लगाय।
पंगत के मध्य और अंत में "जय जय श्री राधे श्याम" का जयकारा लगाया जाता है।पंगत की धुन सुनाते बाबा राजेंद्र दास https://www.youtube.com/watch?v=8lwyyGVEd8I YouTube
शोभायात्रा
निम्बार्क कोट की शोभायात्रा विगत 180 वर्षों से निकलने वाली वृंदावन की सबसे पुरानी शोभायात्राओं में से एक है। इसमें मुख्यरूप से दो डोले होते हैं: एक रासबिहारी के स्वरूप का और दूसरा गोपालजी व निम्बार्क भगवान के चित्रपट का। शोभायात्रा में वृंदावन के सभी अखाड़ों के निशान, कीर्तन मंडली, बैंडबाजे और ताशे शामिल होते हैं। यह छीपी गली से शुरू होकर किशोरपुरा, बिहारीजी, अठखंभा, लोई बाजार, निधिवन, केशीघाट, वंशीवट होते हुए सुदामाकुटी पहुँचती है और फिर ज्ञानगूदड़ी, गोपीनाथ बाजार, चुंगी चौराहा और बाजाजा होते हुए वापस मंदिर लौटती है। इस यात्रा में करीब 6 घंटे लगते हैं।
अन्य उत्सव
मंदिर में नारद जयंती, निवासाचार्य जयंती (बसंत पंचमी), केशवकाश्मीरी भट्टदेवाचार्य जयंती, हंसदास जी जयंती, होली, रामनवमी, जन्माष्टमी, राधाष्टमी, हरिदास श्रृंगारी जी जयंती, गुरु पूर्णिमा, सावन झूला उत्सव, शरदोत्सव और अक्षय तृतीया का पाटोत्सव भी विशेष रूप से मनाया जाता है। मंदिर में नियमित रूप से गोपाल सहस्रनाम, विष्णु सहस्रनाम, महावाणी, युगल शतक, रामचरित मानस व वाल्मीकि रामायण का पाठ तथा श्रीमद्भागवत व भक्तमाल की कथाएँ आयोजित होती हैं।
वार्षिक उत्सव कलैंडर
तिथि उत्सव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत्सर (नव वर्ष) चैत्र शुक्ल नवमी रामनवमी वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया (श्री राधारमणलालजी का पाटोत्सव) वैशाख शुक्ल चतुर्दशी नृसिंह जयंती चतुर्दशी उत्सव ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी श्रीकेशव काश्मीरी भट्टाचार्य पाटोत्सव आषाढ़ कृष्ण तीज श्री हंसदास जी का निकुंज प्राप्ति उत्सव आषाढ़ पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा उत्सव श्रावण शुक्ल तीज हरियाली तीज श्रावण शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा झूला उत्सव भाद्रपद कृष्ण अष्टमी ठाकुरजी का जन्मोत्सव भाद्रपद कृष्ण नवमी नंदोत्सव भाद्रपद शुक्ल अष्टमी श्रीजी (राधा) का जन्मोत्सव भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अनंत चतुर्दशी (गुरु महाराज जी का निकुंज प्राप्ति उत्सव) आश्विन कृष्ण त्रयोदशी मैयाजी का निकुंज प्राप्ति उत्सव आश्विन पूर्णिमा शरद पूर्णिमा कार्तिक कृष्ण पंचमी गुरु महाराज जयंती, निम्बार्क महोत्सव का शुभारंभ कार्तिक कृष्ण द्वादशी श्रीहरिव्यास देवाचार्य जयंती (कथा, समाज व रासलीला आरंभ) कार्तिक अमावस्या दीपावली उत्सव कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा गोवर्धन पूजा, अन्नकूट कार्तिक शुक्ल अष्टमी गोपाष्टमी, स्वयंभूराम देवाचार्य जयंती कार्तिक शुक्ल नवमी अक्षय नवमी (हंस व सनकादिक भगवान जयंती) कार्तिक पूर्णिमा निम्बार्क भगवान जयंती मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण प्रतिपदा निम्बार्क भगवान की शोभायात्रा मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी छठी उत्सव, वैष्णव साधु सेवा बड़ा भंडारा मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी नारद भगवान जयंती पौष पूर्णिमा श्रृंगारीजी का उत्सव माघ शुक्ल पंचमी वसंत पंचमी, निवासाचार्य जयंती फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा होली उत्सव
एकादशी की परिपाटी
निम्बार्क कोट में एकादशी व अन्य व्रत निम्बार्की सिद्धांत ‘कपालवेध’ के आधार पर मनाए जाते हैं। निम्बार्क संप्रदाय में व्रत-उपवास के लिए 'उदयव्यापिनी तिथि' को स्वीकार किया गया है, अर्थात् जिस तिथि में सूर्योदय होगा, पूरे दिन वही तिथि मानी जाएगी।
दिनभर में 60 घटी (घड़ी) होते हैं। यदि दशमी तिथि मध्य रात्रि के बाद 45 घटी तक रहे और उसके बाद एकादशी आए, तो उस दिन एकादशी का स्पर्श (स्पर्श वेध) माना जाता है। ऐसी स्थिति में एकादशी छोड़कर अगले दिन द्वादशी को व्रत करने का विधान है। रात्रि के अर्धभाग के इस वेध को मानने के कारण ही इसे 'कपालवेध सिद्धांत' कहा जाता है। जब एकादशी पूर्व तिथि (दशमी) से जुड़ी हो तो उसे 'विद्धा' और जब अगली तिथि (द्वादशी) से जुड़ी हो तो उसे 'शुद्धा एकादशी' कहते हैं। आचार्यों का निर्देश विद्धा को त्यागकर शुद्धा एकादशी का व्रत करने का है। विशेष योग होने पर महाद्वादशी का व्रत किया जाता है। नारद पुराण के अनुसार त्रिस्पृशा, उन्मीलनी, वंजुलिनी, पक्षवर्धिनी, जया, विजया, जयंती और अपराजिता महाद्वादशी प्रमुख हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार कुछ विशेष ग्रह स्थितियों में शुद्धा एकादशी छोड़कर भी द्वादशी का ही व्रत किया जाता है।
एकादशी का व्रत विधान
वैष्णवों की सगुणोपासना में एकादशी के दिन ठाकुरजी को फलाहारी अर्पण किया जाता है। इस दिन पूर्ण निराहार रहने की बाध्यता नहीं है, किंतु भोजन में अन्न (गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा, दाल, चावल) वर्जित है। फलाहार में फल (केला, सेब, अनार आदि) और कंद (आलू, शकरकंद) लिए जा सकते हैं। तरबूज, गाजर, पालक, मटर, गोभी आदि वर्जित हैं। वैष्णवों के लिए प्याज-लहसुन पूर्णतः निषिद्ध है। दूध, दही, पनीर, काजू, बादाम, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा और समा के चावल उपयोग किए जा सकते हैं। साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक और लाल मिर्च के स्थान पर काली मिर्च का उपयोग होता है। हल्दी, हींग, राई और सरसों का तेल इस दिन वर्जित माने जाते हैं।
मंदिर की स्थिति
अंगूठाकार|निम्बार्क कोट का दक्षिणी दरवाजा
वृन्दावन में निम्बार्क कोट पहुँचना अत्यंत सुगम है। बनखंडी चौराहे से पूर्व दिशा में जाने वाली गली में दाहिनी ओर पाँचवाँ दरवाजा इसी मंदिर का उत्तरी द्वार है। मंदिर का एक दक्षिणी द्वार पुराना बजाजा में है, जो ऋषि बाल्मीकि स्कूल और सब-स्टेशन नं 3 के ठीक सामने है। नेशनल हाइवे 2 (दिल्ली-आगरा) से छटीकरा मोड होते हुए या यमुना एक्सप्रेसवे से वृंदावन कट के जरिए यहाँ पहुँचा जा सकता है।
मंदिर का पास-पड़ोस और अन्य महत्वपूर्ण देवस्थल
निम्बार्क कोट की लोकेशन वृंदावन में सर्वोत्तम स्थान पर है। यहां से वृंदावन के किसी भी महत्वपूर्ण देवस्थल, मंदिर व दर्शनीय स्थान पर जाने के लिए करीब-करीब एक समान दूरी ही चलनी पड़ती है। वृंदावन में निम्बार्क आचार्य पीठ का प्रमुख स्थान श्रीजी मंदिर जो रेतिया (प्रताप) बाजार में है, इसे बड़ी कुंज और श्रीनिकुंज भी कहते हैं, ये निम्बार्क कोट से 200 मीटर पर है। श्रीजी कुंज से आगे बढ़ें तो शाह बिहारी मंदिर, निधिवन और राधारमण जी मंदिर हैं। यहां से केशी घाट, जुगल किशोर मंदिर और फिर गोपीनाथ जी होते हुए गोपेश्वर महादेव पहुंच सकते हैं। फिर वंशीवट (यहां महाप्रभुजी की बैठक भी है), सुदामा कुटी, खाक चौक होते हुए ज्ञान गूदड़ी जा सकते हैं, यहां टिकारी रानी मंदिर, जगन्नाथ जी मंदिर और तुलसी राम दर्शन स्थल भी है। यहां अखाड़े भी हैं। ज्ञान गूदड़ी से राम बाग होते हुए टटिया स्थान जा सकते हैं। टटिया स्थान से लौटते समय कात्यायनी केश पीठ जा सकते हैं। यहां से रंगजी और फिर ब्रह्म कुंड, लाला बाबू, गोदा विहार और ब्रह्मचारी मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। यहां से गोविंद जी मंदिर (वृंदा देवी मंदिर भी इसी परिसर में है) का दर्शन करते हुए सिंहपौर हनुमान व पत्थरपुरा होते हुए गोविंद घाट के पास मीराबाई मंदिर आ सकते हैं, यहां से बाहर निकलने पर रासमंडल होते हुए श्रृंगारवट, फिर राधा दामोदर मंदिर, फिर राधा श्याम सुंदर मंदिर, सवामन शालिग्राम के दर्शन करके रिक्शा सरीखे वाहन से मदन मोहन जी मंदिर और अष्टसखी मंदिर होते हुए सीधे रमणरेती जा सकते हैं, जहां कृष्ण बलराम (इस्कॉन अंग्रेज) मंदिर है। इस्कॉन के पहले दावानल कुंड की ओर आनंद वृंदावन यानी अखंडानंद आश्रम भी जा सकते हैं, साधुबेला (कदंब छाया), हरि निकुंज व हरिमिलाप भी रास्ते में हैं। वृंदावन की परिक्रमा मार्ग से बाहर प्रेम मंदिर, प्रियाकांत जू मंदिर, चंद्रोदय मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर सहित कई नए मंदिर हैं। वहां से वाहन से लौटकर सीधे अटल्ला चुंगी आ सकते हैं, यहां से पागल बाबा मंदिर देख सकते हैं, फिर लौटकर नीम करोली आश्रम है, गोरे दाऊजी, गोलोक धाम जा सकते हैं। यहां से बस अड्डे जाने वाली सड़क पर अनेक मंदिर हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है राधा माधव (जयपुर) मंदिर और इसके सामने गली में तराश वाला मंदिर है। आगे बढ़ने पर मुंगेर मंदिर और उसके सामने गुरुकुल मार्ग पर काठियाबाबा आश्रम है। फिर से निम्बार्क कोट के सामने होते हुए बनखंडी महादेव, रसिक बिहारी मंदिर, मोटा गणेश, गंगा मंदिर, सत्यनारायण मंदिर होते हुए बांके बिहारीजी का दर्शन कर सकते हैं। इसी के करीब है राधा बल्लभजी का मंदिर। राधा बल्लभ जी मंदिर से बाहर निकलने सामने भट्ट गली में मधु निकुंज है, युगल घाट की तरफ बढ़ने पर यशोदानंदन मंदिर है, फिर टोपीवाली कुंज, यहां से दान-मान गली (रुप-सनातन गौड़िया मठ) होते हुए सेवा कुंज और इमली तला जा सकते हैं। व्यास घेरा में युगल बिहारी मंदिर और सामने प्रेम गली में गोरेलाल जी कुंज होते हुए वापस निम्बार्क कोट आ सकते हैं।
वृंदावन में सभी वैष्णव संप्रदायों के अलावा महादेव, देवी, गणेश के मंदिर हैं, सर्वाधिक निम्बार्क संप्रदाय के हैं, फिर गौड़िया, हरिदासी, राधा बल्लभी, रामानंदी, रामानुजी व बल्लभकुल के हैं।
मंदिर की दिनचर्या और स्तुति
दैनिक रूप से मंदिर में तीन प्रमुख आरतियाँ होती हैं—सुबह मंगला आरती, श्रृंगार आरती और शाम को संध्या आरती। दिन में भोग और रात्रि में शयन के समय धूप आरती होती है। आरतियों में विजय घंट बजाए जाते हैं। श्रृंगार आरती में संक्षिप्त और संध्या आरती में संपूर्ण निम्बार्क स्तुति गाई जाती है। आरती पीतल, तांबे या चांदी की हो सकती है, आरती में घी की भीगी हुई रुई की बाती जलाएं। बाती विषम संख्या यानी 3, 5, 7 या अधिक हो सकती हैं। आरती को बांयीं ओर से शुरू करके दायीं ओर घुमाते हैं यानी घड़ी की दिशा में। बाएं हाथ से गरुड़ घंट बजाते रहते हैं और दाएं हाथ से आरती की जाती है। आरती मंत्रोच्चार के साथ होनी चाहिए और गरुण घंटी बजाकर प्रतीकात्मक रूप से माना जाता है कि मंत्रोच्चार हो रहा है। आरती करते समय सबसे पहले ठाकुर जी के चरणों में 4 बार दीपक घुमाते हैं। फिर उनकी नाभि के सामने 2 बार घुमाते हैं। इसके बाद उनके मुखमंडल के सामने 1 बार घुमाते हैं और अंत में प्रभु के संपूर्ण श्रीअंगों पर 7 बार आरती घुमाएं (इस प्रकार कुल 14 बार दीपक घुमाया जाता है)।
मंदिर की संध्याकालीन आरती की स्तुति
श्री हंस च सनत्कुमारप्रभ्रतीन वीणाधरम नारदं।
निम्बादित्यगुरुं च द्वादश गुरुं श्री निवासादिकान॥
वन्दे सुन्दर भट्ट देशिक मुखान्वस्विंदु संख्या युतान।
श्री व्यासाद्धरिमध्यगा च परितः सर्वान्गुरुन्सादरम॥
हे निम्बार्क दयानिधे गुणनिधे हे भक्त चिंतामने।
हे आचार्य शिरोमने मुनि गणेराम्रग्यपादाम्बुजम॥
हे सृष्टिस्थितिपालनप्रभवन हे नाथ मायाधिपे।
हे गोवर्धन कन्दरालयविभो मां पाहि सर्वेश्वर।
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षः स्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वर मौक्तिकं करतले वेणु करे कंकणं॥
सर्वांगे हरीचन्दनं सुललितं कंठे च मक्तावली।
गोपस्त्रीपरिवेष्ठितो विजयते गोपालचूरामणि॥
फुल्लेंदीवर कान्ति मिंदुवदनं वर्हावतंसन प्रियं।
श्री वत्सांगमुदार कौस्तुभधरं पीताम्बर सुन्दरम॥
गोपीनां नयनोत्पलार्ची त तनुं गोगोपसंघाव्रतम।
गोविन्दं कलवेणु वादनपरं दिव्यांगभुषम भजे॥
हे राधे वृष भानु भूपतनये हे पूर्ण चंद्रानने।
हे कांते कमनीय कोकिलरवे ब्रन्दावनाधीश्वरी॥
हे मत्प्रानपरायने च रसिके हे सर्वयुथेश्वरी।
आगत्य त्वरितं प्रतप्त मणिशं मां दीनमानन्दय॥
हे राधे वृषभानुभूपतनये सर्वेश्वरी राधिके।
हे कृष्णानन पंकजभ्रमरिके कृष्ण प्रिये माधवी॥
हे वृन्दावननागरी गुणगुरो दामोदरप्रेयसी।
हे हे श्री मलललितादिक प्रियसखी प्रनाधिके पाहि माम॥
शिन्जनू पुरपादपदमयुगलामा हंसीं गतिं विभ्रतीम।
चंचतखंजनमंजुलोचनयुगां पोनोल्लसत्कंधराम॥
शोभित कांचनकंकनद्युति मिलतपानौ चलच्चामरम।
कुरवाणाम हिरराधिकोपरि सदा श्री रंगदेवीं भजे॥
श्री रंगादिसुदेविका च ललिता वैशाखिका चम्पिका।
चित्र तंग सुखिंदुलेखकपरा चाष्टो प्रधानाप्रिया॥
चान्या सन्ति प्रियात्प्रिया लघुतमानित्ये च नैमित्तके।
वन्दे त्वच चरणारविन्दनितरां दासा वयं श्रद्धया॥
स्वभावतोपास्तसमस्तदोष मशेष कल्याण गुनेकराशिम।
व्यूहांगिनं ब्रह्म परंवरेण्यम ध्यायेम कृष्णं कमलेक्षण हरिम॥
अंगे तुवामे ब्रिषभानुजा मुदाविराजमानामनुरूपसौभागाम।
सखी सह्त्रै परिसेविताम सदा स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम॥
नान्यागति कृष्णपदारबिन्दात संद्रेश्यते ब्रह्मशिवादिवंदितात।
भक्तेछ्योपत्सुचिन्त्त्यविग्रहादचिन्त्यशक्तेरविचिन्त्यशासनात॥
लोकत्रये यान्यसदीहितानी तान्येव सर्वाणि मया कृतानि।
तदीय पाकावसरम विसोढुमसक्नुवन देवमुपैमी नाथ॥
वशीकृतिं यान्ति न हीन्द्रियानी बुद्धिर्नशुद्धिम समुपैति तस्मात्।
न साधनं मेस्ती तव प्रसादे दयालुभावेन बिना हरे ते॥
न धर्मनिष्ठोस्मी नचात्मवेदी न भक्तित्मा स्त्वच्चारानार्विंदे।
अकिन्चनोनन्यगति शरण्यं त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
कीर्तन
दोहा
पराभक्ति रति वर्द्धनी, स्याम सब सुख दैनि।
रसिक मुकुटमनि राधिके, जै नव नीरज नैन।।
स्तोत्र
जयति जय राधा रसिकमनि मुकुट मन-हरनी त्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 1 ।।
जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 2 ।।
जयति रति रस वर्द्धनी अति अद्भुता सदया हिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 3 ।।
जयति आनंद कंदनी जगबंदनी बर बदनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 4 ।।
जयति स्यामा अमित नामा वेद बिधि निर्वाचिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 5 ।।
जयति रास-बिलासिनी कल कला कोटि प्रकाशिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 6 ।।
जयति बिबिध बिहार कवनी रसिक रवनी सुभ धिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 7 ।।
जयति चंचल चारु लोचनि दिव्य दुकुला भरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 8 ।।
जयति प्रेमा प्रेम सीमा कोकिला कल बैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 9 ।।
जयति कंचन दिव्य अंगी नवल नीरज नैनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 10 ।।
जयति बल्लभ बल्लभा आनंद कलभा तरुनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 11 ।।
जयति नागरि गुन उजागरि प्रान धन मन हरनिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 12 ।।
जयति नौतन नित्य लीला नित्य धाम निवासिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 13 ।।
जयति गुण माधूर्य भूपा सिद्धि रूपा शक्तिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 14 ।।
जयति सुद्ध स्वभाव सीला स्यामला सुकुमारिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 15 ।।
जयति जस जग प्रचुर परिकर हरिप्रिया जीवनि जिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणानिधि प्रिये।। 16 ।।
दोहा
नव-नव रंगि त्रिभंगि जै, स्याम सुअंगी स्याम।
जै राधे जै हरिप्रिये, श्री राधे सुख धाम।।
स्तोत्र
जै राधे जै राधे राधे जै राधे जै श्री राधे।
जै कृष्ण जै कृष्ण कृष्ण जै कृष्ण जै श्री कृष्ण। 1 ।
स्याम गोरी नित्य किसोरी प्रीतम जोरी श्री राधे।
रसिक रसीलो छैल छबीलो गुन गरबीलो श्री कृष्ण। 2 ।
रासविहारनि रसबिसतारनि पिय उर धारनि श्री राधे।
नव-नव रंगी नवल त्रिभंगी स्याम सुअंगी श्री कृष्ण। 3 ।
प्रान पियारी रूप उज्यारी अति सुकुंमारी श्री राधे।
मैंन मनोहर महा मोदकर सुंदर बर तर श्री कृष्ण। 4 ।
सोभा सेंनी मोहा मेंनी कोकिल बेंनी श्री राधे।
कीरतिवंता कामिनिकंता श्री भगवंता श्री कृष्ण। 5 ।
चंदा-वदनी कुंदा रदनी सोभा सदनी श्री राधे।
परम उदारा प्रभा अपारा अति सुकुंवारा श्री कृष्ण। 6 ।
हंसागवनी राजति रवनी क्रीड़ा कवनी श्री राधे।
रूपा रसाला नैंन बिसाला परम कृपाला श्री कृष्ण। 7 ।
कंचनबेली रति रस रेली अति अलबेली श्री राधे।
सब सुख सागर सब गुन आगर रूप उजागर श्री कृष्ण। 8 ।
रवनी रम्या तर तर तम्या गुण आगम्या श्री राधे।
धाम निवासी प्रभा प्रकासी सहज सुहासी श्री कृष्ण। 9 ।
शक्तयाह्लादनि अति प्रियवादनि उर उन्मादनि श्री राधे।
अंग अंग टोना सरस सलोना सुभग सुठोना श्री कृष्ण। 10 ।
राधा नामिनि गुण अभिरामिनि हरिप्रिया स्वामिनि श्री राधे।
हरे हरे हरि हरे हरे हरि हरे हरे हरि श्री कृष्ण। 11 ।
अंत में: गोविंद जय जय गोपाल जय जय, राधारमण हरि गोविंद जय जय।
निम्बार्की हरिव्यासी परंपरा में विशेष
इष्टदेव: सर्वेश्वर भगवान श्री कृष्ण
कुलदेव: रुक्मिणी माता
शाखा: हंस
आचार्य: सनकादि
मुनि: नारद
वेद: सामवेद
आहार: हरिनाम
अखाड़ा: निर्मोही
देवता: गरुड़
धाम: बद्रिकाश्रम
माला: तुलसी
तिलक: हरि मंदिर श्याम बिंदी
द्वारा: स्वयंभूराम (शोभूराम)
गोत्र: अच्युत
गोपाल मंत्र: क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजन बल्लभाय स्वाहा:
संकीर्तन: राधे कृष्ण राधे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण राधे राधे, राधे श्याम राधे श्याम, श्याम श्याम राधे राधे।
मंदिर की उपासना व दीक्षा पद्धति
निम्बार्क संप्रदाय में अकेले श्रीकृष्ण की उपसना नहीं होती बल्कि राधा-कृष्ण की युगल उपासना होती है।
निम्बार्क संप्रदाय में पंच संस्कार का विधान है-गोपीचंदन का मस्तक पर ऊर्ध्वपुंड्र तिलक, भुजाओं पर शंख-चक्र, गुरुदेव द्वारा भगवत संबंधी नामकरण, गले में तुलसी की कंठी और मंत्रोपदेश। इन पांच संस्कारों से व्यक्ति में वैष्णवत्व आता है।
पहला संस्कार- तिलक लगाने का विधान: गोपीचंदन (यदि भेंट द्वारिका के पास गोपी तालाब से उपलब्ध है तो सर्वोत्तम) को हथेली में जल के साथ घिसकर मस्तक (ललाट) पर ऊर्ध्वपुंड्र तिलक लगाने का विधान है। भस्म से तिलक लगाना निषेध है लेकिन ब्रज रज का इस्तेमाल कर सकते हैं। नासिका के तीन भाग में से दो भाग छोड़कर तीसरे भाग से तिलक शुरू करें और ललाट के अंत में केशों तक ले जाएं, दो रेखाओं के बीच में एक अंगुल से कम स्थान न हो बल्कि कुछ ज्यादा हो और ऊपर की ओर चौड़ाई लगातार बढ़ती जाए। रेखाएं चावल की मोटाई जितनी हों। तिलक की आकृति हरिचरणारविंद के समान हो। निम्बार्की तिलक हरिपादाकृति कहलाता है। इसे हरि मंदिर भी कहते हैं। तिलक के बीच दोनों भोहों के मध्य में श्यामश्री (यदि जगन्नाथपुरी के पास कज्जलगिरी या गोवर्धन की तलहटी में राधाकुंड का श्यामश्री उपलब्ध हो तो उत्तम) से एक छोटा सा गोल श्यामबिंदु (काला बिंदी) लगाएं। शरीर पर द्वादश तिलक लगाने का विधान है, ये स्थान हैं- ललाट, पेट, वक्षस्थल, कंठ, दक्षिणी कांख, दक्षिणी भुजा, दक्षिणी कंधा, बांयीं कांख, बांयी भुजा, बांया कंधा, पीठ व कमर पर। https://www.nimbarksocialwelfare.com/nimbark-books/BHAGAVANNIMBARKACHARYA-siddhant-upasan-aacharya-parampara.pdf भगवन्निम्बार्काचार्य : सिद्धांत, उपासना एवं आचार्य-परंपरा (डॉ) प्रभाकर शास्त्री प्रो. 2002 NimbarkSocialWelfare
दूसरा संस्कार- भुजाओं पर शंख-चक्र: भगवान के आयुध चिह्नों को भी गोपीचंदन से अंकित करें। दक्षिणी बाहु पर चक्र और वाम बाहु में शंख धारण करना चाहिए। इन दिनों कुछ वैष्णव अपनी बांहों पर शंख-चक्र के स्थायी गोदना गुदवाने लगे हैं।
तीसरा संस्कार- कंठी माला: आचार्य (गुरुदेव) से प्राप्त कंठी माला भगवान का दासत्व स्वीकार करने का प्रतीक है। शास्त्रों में वैष्णवों द्वारा कंठी धारण न करना अपराध की श्रेणी में गिना गया है। कंठी को गले से किसी भी परिस्थिति (अशौच व अनाचार अवस्था) में नहीं उतरना चाहिए। निम्बार्क संप्रदाय में युगलोपासना है, इसलिए कंठी को दोहरा (दो लड़ियां) पहनने की परंपरा है। कंठी उपास्य विग्रह के श्रीअंग से स्पर्श करके और गुरुदेव आचार्य से अभिमंत्रित ही पहननी चाहिए।
चौथा संस्कार- गुरु द्वारा नामकरण: यदि पूर्व नाम यानी मौजूदा नाम भगवत संबंधी नहीं है तो गुरुदेव नया नामकरण करते हैं। नए नाम में भगवान के विविध नामों के साथ दास, शरण, प्रपन्न (किशोरी जी के अनन्य उपासकों के नामों में दासी, सखी व आली) आदि जोड़े जाते हैं।
पांचवां संस्कार- मंत्रोपदेश: गुरुदीक्षा पंच संस्कारों में सर्वोपरि महत्ता का संस्कार है। संप्रदाय में दो मंत्र देने की परंपरा है, पहला शरणागति मंत्र और दूसरा श्रीगोपाल मंत्र। पहला मंत्र नारद पांचरात्र से है, दूसरा अष्टादशाक्षर मंत्र अथर्ववेद के पिप्पलाद शाखा के गोपाल तापिनी उपनिषद का है। भगवन्निम्बार्काचार्य : सिद्धांत, उपासना एवं आचार्य परंपरा शास्त्री प्रो. (डॉ) प्रभाकर रचना प्रकाशन, जयपुर 2002 81-86116-96-6 भारत पेज-142 से 160
वैष्णव समाज गायन
कार्तिक मास में निम्बार्क कोट में हर शाम होने वाला समाज गायन महोत्सव का विशेष आकर्षण है। निम्बार्क संप्रदाय में समाज गायन की परंपरा 15वीं-16वीं सदी से मानी जाती है। निम्बार्क कोट में यह परंपरा लगभग 180 वर्ष पुरानी है। यहाँ इसकी शुरुआत स्वामी गोपाल दास ने 1843 ई. में की थी।डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की बदौलत हो रहा ब्रज संगीत का सुखद पुनरुद्धार https://www.devdiscourse.com/article/arts/278282-braj-sangeet-witnessing-happy-revival-thanks-to-digital-platforms Devdiscourse समाज गायन प्राचीन भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक वैष्णवी शैली है, जिसमें संत समूह आचार्यों की रचित वाणी पदों का गायन करते हैं।
अंगूठाकार|निम्बार्क कोट में समाज गायन
समाज गायन के समय साधु-संत दो दलों (मुखिया दल और झेला दल) में विभक्त होकर आमने-सामने बैठते हैं। मुखिया दल दाईं ओर और झेला दल बाईं ओर होता है। बीच में ऊँची चौकी पर वाणी (समाज शृंखला) रखी जाती है। गायन की शुरुआत मंगलाचरण (बड़ा मंगल व छोटा मंगल) से होती है, जिसमें सूहा विलावल राग का प्रयोग होता है। इसके उपरांत श्रीभट्ट की रचना 'युगल शतक'युगल शतक श्रीजी कुंज https://archive.org/details/LfFC_yugal-shatak-by-bhatta-devacharya-sarveshvar-press/page/n11/mode/1up और हरिव्यास देवाचार्य की 'महावाणी'महावाणी https://archive.org/details/MahaVaani के पदों का गायन होता है। बधाइयाँ 'हंसवंश यश सागर'हंसवंश यश सागर https://www.nimbarksocialwelfare.com/nimbark-books/Shri-Hansha-Vansha-Yasha-Sagar.pdf से गाई जाती हैं।
निम्बार्क समाज गायन में सूहा विलावल, यमन कल्याण, देव गंधार, काफी, मल्हार, बिहाग, भूपाली आदि अनेक रागों और चौताल, झप, कहरवा, दादरा आदि तालों का प्रयोग होता है।मध्ययुगीन वैष्णव संप्रदायों में संगीत विजयेंद्र स्नातक, राकेशबाला सक्सेना 1990 निम्बार्क कोट घराने की समाज गायन में 'दंडक गायन' (झप ताल में लंबे कवित्त) की एक विशेष शैली है, जो कार्तिक शुक्ल दशमी और एकादशी को गाई जाती है।
वृंदावन की समाज गायन परंपरा पुस्तक में डॉ. गंगा प्रिया ने वृंदावन में समाज गायन के विशिष्ट स्थलों में निम्बार्क कोट का जिक्र किया है। इस पुस्तक में वृंदावन के मंदिरों में समाज गायन श्रृंखला का विवरण है। https://www.exoticindiaart.com/book/details/community-singing-tradition-of-vrindavan-ba2604/ वृन्दावन की समाज गायन परंपरा डॉ. गंगा प्रिया वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन
महावाणी की हस्तलिखित प्रति
निम्बार्क कोट में 'महावाणी' की एक हस्तलिखित प्रति उपलब्ध है, जो संवत 1824 में रूपनगर में जोशी मोतीराम द्वारा लिखी गई थी। यह वृंदावन में प्राप्त महावाणी की सबसे पुरानी प्रतियों में से एक है।हरिव्यास देवाचार्य एवं महावाणी राजेंद्र प्रसाद गौतम 1974 80-81 https://www.google.co.in/books/edition/Śrīharivyāsadevācārya_aura_Mahāvā/ZLNichRlNJEC
निम्बार्क कोट मंदिर की आचार्य परंपरा
हंस भगवान व सनकादिक: हंस भगवान निम्बार्क संप्रदाय के आद्य आचार्य हैं, जो विष्णु के अवतार माने जाते हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्मा के मानस पुत्रों (सनकादिकों-सनक, सनंदन, सनातन व सनत कुमार) को सृष्टि से विरक्त कर भगवत चिंतन की ओर मोड़ने के लिए भगवान ने हंस रूप धारण किया था।
नारद भगवान: पौराणिक कथाओं में नारद को अनेक युग पुरुषों (ध्रुव, प्रह्लाद, वेदव्यास, निम्बार्काचार्य) का गुरु माना गया है।
निम्बार्काचार्य: राधाकृष्ण की युगलोपासना के प्रणेता। इनका जन्म मूंगी पैठण (महाराष्ट्र) में हुआ था। इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर 'वेदांत पारिजात सौरभ' टीका लिखी और 'द्वैताद्वैत' या 'भेदाभेद' दर्शन प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में वेदांत कामधेनु, दशश्लोकी, गीता वाक्यार्थ, मंत्र रहस्य षोडशी, प्रपन्न कल्प वल्ली, प्रपत्ति चिंतामणि, कृष्ण स्तवराज, श्रीराधाष्टक, सदाचार प्रकाश और प्रात: स्मरण स्तोत्र शामिल हैं। संप्रदाय की मान्यताओं के अनुसार इन्हें सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है। अनुयायी ऐसा मानते हैं कि निम्बार्क भगवान सुदर्शन चक्र सहित 8 रुपों में विराजमान हैं-भगवान विष्णु के चार आयुधों में से एक सुदर्शन चक्र के रूप में, कृष्णावतार के चतुर्व्यूह में अनिरुद्ध के रूप में, कृष्ण सखाओं में तोष के रूप में, श्रीराधा की अष्टसखियों में रंगदेवी सखी के रूप में, कलियुग में निम्बार्काचार्य के रूप में, गोलोक के श्रीवृंदावन नित्यनिकुंज में प्रिया-प्रीतम की अंगकांति के रूप में, गोचारण के दौरान ठाकुरजी द्वारा इस्तेमाल की गई लकुटी के रूप में और कृष्ण की गउओं में धूसर गाय के रूप में।
निवासाचार्य: निम्बार्काचार्य के पट्ट शिष्य, जिन्हें पांचजन्य शंख का अवतार माना जाता है। इन्होंने 'वेदांत कौस्तुभ' की रचना की।
विश्वाचार्य: निवासाचार्य के शिष्य। किंवदंतियों के अनुसार, निवासाचार्य ने इनसे 11 दार्शनिक प्रश्न किए थे, जिनके उत्तर के बाद वे उनके शिष्य बन गए।
पुरुषोत्तामाचार्य
विलासाचार्य
स्वरूपाचार्य
माधवाचार्य
बलभद्राचार्य
पद्माचार्य
श्यामाचार्य
गोपालाचार्य
कृपाचार्य
देवाचार्य : आपने वेदांत सिद्धांत जाह्नवी की रचना की।
सुंदर भट्ट : आपने सिद्धांत सेतुका की रचना की।
पद्मनाभ भट्ट देवाचार्य
उपेंद्र भट्ट देवाचार्य
रामचंद्र भट्ट देवाचार्य
वामन भट्ट देवाचार्य
कृष्णभट्ट देवाचार्य
पद्माकर भट्ट देवाचार्य
वाण भट्ट देवाचार्य
भूरि भट्ट देवाचार्य
माधव भट्ट देवाचार्य
श्याम भट्ट देवाचार्य
गोपाल भट्ट देवाचार्य
बलभद्र भट्ट देवाचार्य
गोपीनाथ भट्ट देवाचार्य
केशव भट्ट देवाचार्य
गांगल भट्ट देवाचार्य
केशव काश्मीरी भट्टाचार्य: निम्बार्क परंपरा में 30वें आचार्य। इन्होंने कश्मीर में 'कौस्तुभ प्रभा' और 'क्रम दीपिका' जैसे ग्रंथ लिखे।
श्रीभट्ट देवाचार्य: 'युगल शतक' के रचयिता।
हरिव्यास देवाचार्य: 'महावाणी' के प्रणेता।
स्वयंभूराम देवाचार्य: निम्बार्क कोट के द्वाराचार्य। हरिव्यास देवाचार्य के 12 प्रधान शिष्यों में सबसे वरिष्ठ।
कर्णहर देव
नारायण देव
हरिदेव
श्याम देव
श्याम दामोदर देव
श्रुति देव
सहजराम देव
रामदेव
ज्ञानदेव
वृंदावन देव
रामशरण देव
धर्म देव
सेवादास
बाबा गोपालदास महाराज: सेवादास के शिष्य, जिन्होंने 1843 में वृंदावन में निम्बार्क महोत्सव प्रारंभ किया और 'उत्सवी बाबा' के नाम से विख्यात हुए।मेरो वृंदावन चैनल पर निम्बार्क कोट के दर्शन https://www.facebook.com/reel/2063201144459760 Facebook
बाबा हंसदास: गोपालदास के शिष्य। 1895 से 1937 तक निम्बार्क जयंती उत्सव का संचालन किया।
बाबा बाल गोविंद दास: हंसदास के विरक्त शिष्य, जिन्होंने निम्बार्क कोट का निर्माण कराया।
हरिदास श्रृंगारी: बालगोविंद दास के छोटे भाई, जो 18 वर्ष की आयु में वृंदावन आ गए थे। राधारमण लालजी की अष्टयाम सेवा में समर्पित रहे।
माता श्याम प्यारी: हरिदास श्रृंगारी की धर्मपत्नी। 1950 से 1983 तक निम्बार्क कोट का संचालन किया।
वृंदावन बिहारी: हरिदास श्रृंगारी के पुत्र। वर्तमान में निम्बार्क कोट के सेवायत।
वृंदावन बिहारी
श्री वृंदावन बिहारी शर्मा (आयु 88 वर्ष) वर्तमान में निम्बार्क कोट के व्यवस्थापक और सेवायत हैं। वे 14-15 वर्ष की आयु से ही मंदिर की परंपराओं का संचालन कर रहे हैं। समाज गायन, नित्य रासलीला और हस्तलिखित साहित्य के संरक्षण में उनका विशेष योगदान रहा है। उन्होंने अपने पैतृक मंदिर में एक मासीय निम्बार्क जयंती आयोजन में समाज गायन की प्राचीन शैली और रासलीलाओं के क्रम को व्यवस्थित किया।
1970 के दशक से 2020 में उन्होंने वृंदावन शोध संस्थान में ब्रज की हस्तलिखित पांडुलिपियों (संस्कृत, हिंदी, बंगाली, गुजराती, मराठी, उर्दू) की विस्तृत कैटलॉगिंग का कार्य किया। उनके संपादित व संकलित तीन कैटलॉग प्रकाशित हुए। संस्थान में आए देश-विदेश के अनेक लेखक व शोधकर्ताओं की अकादमिक मदद की।
अमेरिका की वाशिंगटन यूनीवर्सिटी और नीदरलैंड के ग्रोनिंगन यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर व ब्रिटिश लेखक एलन डब्ल्यू. एंटविस्टल ने अपनी दो पुस्तक ‘वैष्णव तिलक : सेक्टेरियन मार्क्स वॉर्न बाय वरशिपर्स ऑफ विष्णु’ (1982) और ‘ब्रज : सेंटर ऑफ कृष्ण पिलग्रिमेज’ (1987) में निम्बार्क कोट व वृंदावन बिहारी का जिक्र किया है। https://www.exoticindiaart.com/book/details/vaisnava-tilakas-sectarian-marks-worn-by-worshippers-of-visnu-vishnu-ide441/ Vaisnava Tilakas Sectarian marks worn by worshippers of Vishnu Alan W Entwistle Vrindavan Research Institute, Vrindavan https://archive.org/details/entwistles-braj-center-of-krsna-pilgramage/page/n8/mode/1up Braj Centre of Krsna Pilgramage Alan W. Entwistle Vrindavan Research Institute, Vrindavan
1985 में वृंदावन बिहारी के संपादन में ‘ए कैटलॉग ऑफ संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स इन वृंदावन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ का पार्ट-4 (708 पेज) प्रकाशित हुआ। https://www.exoticindiaart.com/book/details/catalogue-of-sanskrit-manuscripts-in-vrindaban-research-institute-part-4-old-and-rare-book-ubc069/ कैटलॉग ऑफ संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स इन वृंदावन रिसर्च इंस्टीट्यूट वी.बी. गोस्वामी वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन 1991 में वृंदावन बिहारी ने ए कैटलॉग ऑफ संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स इन वृंदावन रिसर्च इंस्टीट्यूट के पार्ट-5 (718 पेज) का संपादन किया। https://www.exoticindiaart.com/book/details/catalogue-of-sanskrit-manuscripts-in-vrindaban-research-institute-part-5-old-and-rare-book-ubc068/ कैटलॉग ऑफ संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स इन वृंदावन रिसर्च इंस्टीट्यूट पार्ट-5 V.B. Goswami Vrindavan Research Institute, Vrindavan 2010 में वृंदावन बिहारी ने ए कैटलॉग ऑफ संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स इन वृंदावन रिसर्च इंस्टीट्यूट के पार्ट-6 (676 पेज) का संकलन किया। https://www.exoticindiaart.com/book/details/catalogue-of-sanskrit-manuscripts-in-vrindaban-research-institute-part-6-ubc067/ कैटलॉग ऑफ संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स इन वृंदावन रिसर्च इंस्टीट्यूट पार्ट-6 Vrindaban Bihari Vrindavan Research Institute, Vrindavan
वृंदावन शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘भारत भाव रूप श्री कृष्ण’ के खंड-1 में शामिल पांच लेखों में वृंदावन बिहारी का लिखा लेख ‘महामानव के परिप्रेक्ष्य में महाभारत के श्रीकृष्ण’ भी है। इस खंड के अन्य लेखकों में डॉ. विद्यानिवास मिश्र, डॉ. प्रभुदयाल मीतल व डॉ. रघुवीर शास्त्री शामिल हैं, अन्य खंडों के लेखक समूह में डॉ. विजयेंद्र स्नातक, आचार्य डॉ. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी, प्रो. कृष्ण दत्त वाजपेयी, डॉ. प्रभाकर माचवे, डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया, डॉ. प्रेम नारायण श्रीवास्तव, नरेश बंसल, बसंत जामदग्नि जैसे दिग्गजों का नाम उल्लेखनीय है।https://www.exoticindiaart.com/book/details/bharat-bhava-rupa-shri-krishna-aze003/ भारत भाव रूप श्रीकृष्ण भवानी शंकर शुक्ला एवं हरिमोहन मालवीय वृंदावन शोध संस्थान, वृंदावन
उन्होंने यमुना के संरक्षण पर शोधपरक पुस्तक ‘यमुना एवं यमुनाष्टक’यमुना एवं यमुनाष्टक वृंदावन बिहारी 1990 https://www.google.co.in/books/edition/Yamun%C4%81_eva%E1%B9%83_yamun%C4%81sh%E1%B9%ADaka/mY8XAAAAIAAJवृंदावन शोध संस्थान की प्रकाशन सूची https://vribharat.org/hi/prakashan/ लिखी है। 2015 में यमुना एवं यमुनाष्टक का पुनर्प्रकाशन हुआ। वृंदावन बिहारी ने अपनी ही पुस्तक का इंग्लिश अनुवाद भी किया जो ‘यमुना : द एटर्नल स्ट्रीम ऑफ यमुना’ (1923) के रूप में उपलब्ध है। https://www.exoticindiaart.com/book/details/yamuna-eternal-stream-of-culture-ba2605/ यमुना एटर्नल स्ट्रीम ऑफ कल्चर Vrindaban Bihari Vrindavan Research Institute, Vrindavan
वृंदावन शोध संस्थान से प्रकाशित हरिमोहन मालवीय की पुस्तक ‘रागमाला ऑफ तानसेन’ के अंग्रेजी संस्करण के संपादन भी वृंदावन बिहारी ने किया। https://www.exoticindiaart.com/book/details/ragamala-of-tansen-published-with-grant-from-ministry-of-culture-government-of-india-bab470/ Ragamala of Tansen harimohan Malviya Vrindavan Bihari Vrindavan Research Institute, Vrindavan
उनके लिखे गए दो पद आज भी समाज गायन के अंत में गाए जाते हैं: पहला पद:
सेवों श्री राधा रमण उदार।
जिन श्री गोपाल दास जू सेव्यो, गोपाल रूप उर धार।
श्री हंस दास जू सेवत मानसी, युगल रूप उर सार।
तिनकी कृपा श्री गोविंद बाल जू, दिए सिंहासन बैठार।।
दूसरा पद:
जै जै श्री राधा रमण विराजै।
निज लावण्य रूप निधि संग लिए, कोटि काम छवि लाजैं।
कुंज कुंज मिल बिलसत हुलसत, सेवत सहचरि संग समाजैं।
श्री वृंदावन श्री हितु श्री हरिप्रिया, चोज मनोजन काजैं।।
सन्दर्भ
श्रेणी:मन्दिर
श्रेणी:वृन्दावन के मन्दिर
श्रेणी:निम्बार्क सम्प्रदाय
श्रेणी:हिन्दू मन्दिर
श्रेणी:निम्बार्क संप्रदाय के प्रमुख मंदिर