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कार्टूश
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कार्टूश (Cartouche) वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला तथा सजावटी कलाओं में प्रयुक्त एक अलंकरणीय फ्रेम या सीमारेखा होती है, जिसके भीतर कोई नाम, प्रतीक, चित्र, शिलालेख, कुलचिह्न अथवा सजावटी आकृति अंकित की जाती है। इसका आकार सामान्यतः अंडाकार, आयताकार, दीर्घवृत्तीय या घुमावदार होता है तथा इसके चारों ओर बेल-बूटों, स्क्रॉलों, पुष्पाकार रूपांकनों अथवा अन्य सजावटी तत्वों का प्रयोग किया जाता है।Ching Francis D. K. A Visual Dictionary of Architecture https://archive.org/details/visualdictionary0000fran John Wiley & Sons 1995 183thumb|रोमानिया के बुखारेस्ट नगर की एक इमारत पर बना कार्टूशकार्टूश का प्रयोग प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आधुनिक काल तक विभिन्न रूपों में होता रहा है। यह विशेष रूप से वास्तुकला, सजावटी कला, मूर्तिकला, हेरल्ड्री तथा भवनों के अग्रभागों के अलंकरण में लोकप्रिय रहा है। समय के साथ इसके स्वरूप में परिवर्तन हुआ, किन्तु इसका मूल उद्देश्य किसी महत्वपूर्ण सूचना, प्रतीक अथवा कलात्मक रचना को विशेष रूप से प्रदर्शित करना रहा।
व्युत्पत्ति
कार्टूश शब्द का उद्गम इतालवी शब्द cartuccia से माना जाता है, जिसका अर्थ सजावटी कागज़ी पट्टी या अलंकृत फ्रेम से संबंधित है। यूरोप में पुनर्जागरण काल के दौरान यह शब्द वास्तुकला और सजावटी कलाओं में प्रचलित हुआ तथा बाद में अनेक यूरोपीय भाषाओं में अपनाया गया।Architectural Styles: A Visual Guide Hopkins Owen Laurence King Publishing 2014
विशेषताएँ
कार्टूश की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
किसी चित्र, लेख, प्रतीक या कुलचिह्न को घेरने वाला सजावटी फ्रेम।
अंडाकार, आयताकार, ढालाकार या घुमावदार आकृतियों में निर्मित।
किनारों पर स्क्रॉल, पुष्प, पत्तियाँ, रिबन या अन्य अलंकरण।
पत्थर, लकड़ी, धातु, प्लास्टर, चीनी मिट्टी, हाथीदाँत तथा वस्त्रों पर निर्मित।
भवनों, स्मारकों, फर्नीचर, मानचित्रों और कलाकृतियों में व्यापक उपयोग।
इतिहास
प्राचीन काल
कार्टूश जैसे अलंकृत फ्रेमों का उपयोग प्राचीन रोमन साम्राज्य में भवनों, समाधियों, स्तंभों तथा ताबूतों पर किया जाता था। इनका स्वरूप प्रायः आयताकार होता था और इनके भीतर शिलालेख अथवा स्मारकीय विवरण अंकित किए जाते थे। कई रोमन मूर्तियों और संगमरमर के ताबूतों पर कार्टूश जैसे सजावटी पैनल आज भी देखे जा सकते हैं।
चीनी कला में
चीनी कला में कार्टूशों का उपयोग विशेष रूप से चीनी मिट्टी के पात्रों, फूलदानों और सजावटी वस्तुओं पर किया गया। इन कार्टूशों के भीतर प्रायः पुष्पीय रूपांकन, प्राकृतिक दृश्य या शुभ प्रतीक अंकित किए जाते थे।
इस्लामी कला में
इस्लामी कला और शिल्प में कार्टूश का उपयोग सुलेख, ज्यामितीय अलंकरण तथा धार्मिक अभिलेखों को प्रदर्शित करने के लिए किया गया। फ़ारसी कालीनों, पांडुलिपियों और स्थापत्य सज्जा में इसके सुंदर उदाहरण मिलते हैं।
पुनर्जागरण काल
पुनर्जागरण के दौरान यूरोप में प्राचीन यूनानी और रोमन कला के पुनरुत्थान के साथ कार्टूश का प्रयोग अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। इस काल में कार्टूश अधिक जटिल, सजावटी और कलात्मक रूप धारण करने लगे। भवनों के अग्रभाग, फर्नीचर, पुस्तकों के शीर्षक पृष्ठ तथा भित्ति सज्जा में इनका व्यापक उपयोग हुआ।
पुनर्जागरण काल के कार्टूशों में स्क्रॉल, रिबन, पुष्पमालाएँ तथा कुलचिह्न प्रमुख सजावटी तत्व थे। बाद के बारोक और रोकोको कालों में इनका रूप और भी अधिक अलंकृत हो गया।
बारोक और रोकोको काल
17वीं और 18वीं शताब्दी में बारोक तथा रोकोको शैलियों के विकास के साथ कार्टूशों का स्वरूप अत्यंत भव्य और जटिल हो गया। इस समय कलाकारों ने इन्हें केवल लेख या प्रतीकों को घेरने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वयं एक स्वतंत्र सजावटी तत्व के रूप में भी प्रयोग किया।
बारोक शैली के कार्टूशों में गहरी नक्काशी, नाटकीय वक्र रेखाएँ, देवदूतों की आकृतियाँ, पुष्पीय अलंकरण तथा कुलचिह्नों का समावेश सामान्य था। वहीं रोकोको शैली में हल्के, अधिक प्रवाहयुक्त और असममित रूप दिखाई देते हैं। यूरोप के महलों, गिरजाघरों, फव्वारों तथा स्मारकों में इस काल के अनेक उत्कृष्ट उदाहरण सुरक्षित हैं।
नवजागरण और 19वीं शताब्दी
19वीं शताब्दी में यूरोप में ऐतिहासिक स्थापत्य शैलियों के पुनरुद्धार के साथ कार्टूशों का पुनः व्यापक उपयोग हुआ। नवशास्त्रीय वास्तुकला, पुनर्जागरण पुनरुद्धार वास्तुकला तथा रोकोको पुनरुद्धार आंदोलनों ने कार्टूश को फिर से लोकप्रिय बना दिया।
इस काल में भवनों के अग्रभागों, फर्नीचर, चीनी मिट्टी के पात्रों, पंखों, प्रदर्शनी अलमारियों तथा सार्वजनिक स्मारकों पर कार्टूशों का उपयोग किया गया। अनेक नगरों में मकानों के संख्या-पट्ट, संस्थानों के नाम तथा राजकीय प्रतीक भी कार्टूशों के भीतर प्रदर्शित किए जाते थे।
आर्ट नोवो और आर्ट डेको
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 20वीं शताब्दी के आरम्भ में आर्ट नोवो शैली ने कार्टूशों को नए रूप प्रदान किए। इनमें प्राकृतिक आकृतियाँ, बेलें, पुष्प तथा प्रवाहयुक्त रेखाएँ प्रमुख थीं।
बाद में आर्ट डेको शैली ने सरलता और ज्यामितीय संतुलन को महत्व दिया। परिणामस्वरूप कार्टूश अधिक सादे और शैलीबद्ध रूप में दिखाई देने लगे। यद्यपि उनका प्रयोग पहले की अपेक्षा कम हुआ, फिर भी वे सजावटी तत्व के रूप में बने रहे।
आधुनिक और उत्तर-आधुनिक उपयोग
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आधुनिकतावादी वास्तुकला में अलंकरणों का प्रयोग बहुत कम हो गया। परिणामस्वरूप कार्टूश भी धीरे-धीरे वास्तुकला से लगभग गायब हो गए। हालांकि 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्तर-आधुनिक वास्तुकला के उदय के साथ ऐतिहासिक अलंकरणों में पुनः रुचि बढ़ी।
कुछ उत्तर-आधुनिक वास्तुकारों ने पारंपरिक कार्टूशों की सरल व्याख्याएँ अपने डिज़ाइनों में सम्मिलित कीं। 21वीं शताब्दी में भी रेट्रो शैली, आंतरिक सज्जा, फैशन तथा ग्राफिक डिज़ाइन में कार्टूश प्रेरित रूपांकनों का प्रयोग किया जाता है।
विभिन्न कलाशैलियों में जालचित्र
पुनर्जागरण शैली — संतुलित और शास्त्रीय रूपांकन।
बारोक शैली — अत्यधिक अलंकृत, भव्य और नाटकीय सज्जा।
रोकोको शैली — हल्के, प्रवाहयुक्त और सजावटी घुमावदार रूप।
नवशास्त्रीय शैली — नियंत्रित और सममितीय रचनाएँ।
आर्ट नोवो — प्राकृतिक एवं वनस्पति प्रेरित आकृतियाँ।
आर्ट डेको — सरल, ज्यामितीय और आधुनिक स्वरूप।
उत्तर-आधुनिक शैली — ऐतिहासिक तत्वों का नवीन पुनर्प्रयोग।
महत्व
जालचित्र केवल सजावट का साधन नहीं है, बल्कि यह सूचना, पहचान और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम भी रहा है। इतिहास में इसका उपयोग राजकीय घोषणाओं, स्मारक लेखों, कुलचिह्नों, धार्मिक संदेशों और कलात्मक संरचनाओं को प्रमुखता से प्रदर्शित करने के लिए किया जाता था। इसी कारण यह वास्तुकला और सजावटी कलाओं के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण अलंकरणीय तत्व माना जाता है।
चित्र दीर्घा
इन्हें भी देखें
पदक
मूर्तिकला
सजावटी कला
वास्तुशिल्प
सन्दर्भ
ग्रंथसूची
Hodge Susie The Short Story of Architecture Laurence King Publishing 2019 978-1786273703
Cartouche
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Cartouche
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Architectural Ornament
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https://www.metmuseum.org/
2026-06-17
श्रेणी:सजावटी कलाएँ
श्रेणी:कला
श्रेणी:वास्तुकला