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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

रवीन्द्र सेतु

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रवीन्द्र सेतु(हावड़ा सेतु) Howrah Bridge, Kolkota.jpg हावड़ा और कोलकाता को जोड़ने वाला, हुगली नदी पर बना, हावड़ा पुल रवीन्द्र सेतु हावड़ा ब्रिज हावड़ा ब्रिज রবিন্দ্র সেতূ হাওড়া ব্রিজ हुगली नदी कोलकाता,हावड़ा संतुलित कैंटिलीवर सस्पेंशन 457.5 m ft 0 26 m ft 0 १,५०,००० वाहन, ४०,००,००० यात्री १९43 रवीन्द्र सेतु भारत के पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के उपर बना एक "कैन्टीलीवर सेतु" है। यह हावड़ा को कोलकाता से जोड़ता है। इसका मूल नाम "नया हावड़ा पुल" था जिसे बदलकर १४ जून सन् १९६५ को 'रवीन्द्र सेतु' कर दिया गया। किन्तु अब भी यह "हावड़ा ब्रिज" के नाम से अधिक जाना जाता है। यह अपने तरह का दुनिया का छठवाँ सबसे बड़ा पुल है। सामान्यतया प्रत्येक पुल के नीचे उसके नीचे बहने वाली नदी की चौड़ाई के आधार पर अनेक खंभे होते है जिन पर वह टिका रहता है परंतु यह एक ऐसा पुल है जो सिर्फ चार खम्भों पर टिका है, दो नदी के इस तरफ, और पौन किलोमीटर की चौड़ाई के बाद, दो नदी के उस तरफ। सहारे के लिए कोई रस्सा, कोई तार आदि कुछ नहीं। इस दुनिया के अनोखे हजारों टन बजनी इस्पात के गर्डरों के पुल ने केवल चार खम्भों पर खुद को इस तरह से बैलेंस बनाकर हवा में टिका रखा है कि 80 वर्षों से इस पर कोई फर्क नहीं पडा है जबकि लाखों की संख्या में दिन रात भारी वाहन और पैदल भीड़ इससे गुजरती है। अंग्रेजों ने जब इस पुल की कल्पना की तो वे ऐसा पुल बनाना चाहते थे कि नीचे नदी का जल मार्ग न रुके। क्योंकि यहाँ पर नदी की गहराई बहुत थी, पानी का वेग बहुत तेज था और तब यातायात के साधन के रूप मे हर वक्त तमाम जहाज इस नदी मे आवागमन करते थे । पानी के वेग के कारण इससे पहले बने सभी पुल कुछ ही समय मे नष्ट हो गए थे। अतः पुल के नीचे नदी के पानी मे कोई खंभा न हो। ऊपर पुल बन जाय और नीचे हुगली में पानी के जहाज और नाव भी बिना अवरोध चलते रहें। यह काम एक झूला अथवा कैंटिलिवर पुल से ही संभव था। जब निर्माण हुआ तो किसी भी स्टील कारखाना या कम्पनी द्वारा इस पुल के लिए इतना स्टील सप्लाई करना सम्भव नहीं था । इस पुल के लिए स्टील सप्लाई करने का जिम्मा उस समय भारतीय कंपनी टाटा स्टील ने उठाया । इस पुल में अधिकांशतः स्टील टाटा कम्पनी का ही लगा हुआ है। इतना बड़ा संतुलन में झूलता हुआ पुल होने के बाबजूद भी इस पुल में एक भी जगह नट बोल्ट का प्रयोग नहीं किया गया है । सभी जगह नट बोल्ट के स्थान पर रिबिट्स का प्रयोग किया गया है। कहीं भी कोई आयरन वेल्डिंग नहीं है। इतिहास से उस समय तक भारत के दो बड़े महानगरों कोलकाता और हावड़ा को हुगली नदी ने दो भागों मे बाँट रखा था । इस तरफ से उस तरफ जाने के लिए पौन किलोमीटर की चौड़ी और समुद्र जैसी गहरी नदी को पार करने के लिए कोई साधन और आसान रास्ता नहीं था। सिर्फ नावें ही इस पार उस पार जाने का सहारा थीं। अंग्रेजों द्वारा पीपे के बनाए गए पुलों से जहाजों और नावों का आवागमन रुक जाता था और वे पानी के वेग मे बह कर समुद्र मे चले जाते थे। तब दो शहरों को जोड़ने वाला तत्कालीन यही एकमात्र पुल था। गौरतलब है कि कलकत्ता समुद्र के किनारे पर स्थित है इसकी समुद्र तल से ऊंचाई मात्र 5 छह मीटर है । अतः यहाँ हुगली (गंगा) अपनी समानता समुद्र से करती है। उत्तर मे करीब 15-16 किलोमीटर दूर दूसरा स्थानापन्न बाली ब्रिज था, दक्षिण दिशा मे हुगली को पार करने के लिए उस पर पचासों किलोमीटर दूर तक कोई पुल न था। उस समय इस पुल के निर्माण की लागत कोई 2.5 करोड़ रु आई थी। तकनीकी जानकारी विवरणs0000304 Howrah Bridgeनिर्माणकाल1937—1943स्थितिकोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारतवर्तमान दशाउपयोग में हैकिसके ऊपरहुगली नदीसेतु का प्रकारसंतुलित कैन्टीलीवर झूला पुल (suspension bridge)उपयोगरेल सेतुदैनिक आवागमन1,50,000 वाहन, 40,00,000 पैदल यात्रीनिर्माता रेंडेल पामर & ट्रिटन क्लीवलैंड ब्रिज एंड इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेडनिर्माण-पदार्थइस्पातटॉवर की उंचाई82 मीटरस्पैनों की संख्या3स्पैनों की लंबाई99.125 m 457.50 m 99.125 mLength of drop-in span178.08 m इस सेतु का नाम बंगाली लेखक, कवि, समाज-सुधारक गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर के नाम पर रखा गया है। इस सेतु के दोनों ओर ही नदी पर दो अन्य बड़े सेतु भी हैं: विद्यासागर सेतु विवेकानंद सेतु thumb|center|550px|निकट से रवीन्द्र सेतु का दृष्य सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ Official Website of Howrah Bridge, maintained by Calcutta Port Trust Picture of old Howrah Bridge Photos of Howrah Bridge श्रेणी:हावड़ा श्रेणी:कोलकाता में यातायात श्रेणी:भारत में सेतु श्रेणी:कोलकाता की इमारतें श्रेणी:कैन्टीलीवर सेतु श्रेणी:रवीन्द्रनाथ ठाकुर के स्मारक श्रेणी:हुगली नदी सेतु