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भारतीय नवजागरण में अनुवाद की भूमिका
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भारत के अलग अलग प्रांतों में नवजागरण को देखने की अलग अलग प्रवृत्ति रही है| भारत जैसे बहुभाषिक , बहुसांस्कृतिक देश में एक ही तरह का नवजागरण नहीं रहा| इस देश में एक नहीं कई नवजागरण हुआ है | जिनको एक हो तराजू पर तौलकर किसी को श्रेष्ठ और किसी को हीन नहीं घोषित किया जा सकता | विविध प्रांतों की आर्थिक ,सामाजिक, राजनीतिक विविधता ने नवजागरण को पूरे देश में अलग अलग तरह से प्रभावित किया|भारत में नवजागरण की पहली किरण बंगालन में ही दिखाई पड़ी और यही से नवजागरण का सूर्योदय हुआ| इस नवजागरण में अनुवाद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | 18-19 वीं सदी में अंग्रेजी , संस्कृत, फारसी और अन्य भाषाओं से बड़े पैमाने पर ग्रंथों का बंगला में अनुवाद हुआ| इन अनुवादों से आधुनिक विज्ञान , इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र, की अवधारणाएं आम जनता तक पहुंची| तार्किक व वैज्ञानिक दृष्टि का प्रसार हुआ तथा शिक्षा में बंगाल की स्थिति मजबूत हुई| बंगला नवजागरण के सूत्रधार राजा राममोहन राय माने जाते हैं| इन्होंने वेदांत और उपनिषद के विचारों को आम जनता तक पहुंचाने के लिए इन ग्रंथों की अनुवाद बंगाल में किया |हिन्दी नवजागरण का मुख्य लक्ष्य साम्राज्यवाद व सामंतवाद से मुक्ति पाना था| यहां साहित्य से जुड़े लोगों ने ही अपना प्रभाव छोड़ा| इन लेखकों की लेखनी ने आगे चल कर राष्ट्रवाद का आधार ग्रहण कर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया| डॉ नामवर सिंह के शब्दों में " जिस प्रकार अन्य देशों के अन्यत्र में नवजागरण एक वृहत्तर मानवतावाद या मानवतावाद के अग्रदूत रहे हैं, उसी प्रकार यह हिंदी का नवजागरण भी मानवतावाद का अग्रदूत रहा है|"बंसल नीतू 30 सितम्बर 2022 भारत के नवजागरण का स्वरूप अपनी माटी
साहित्य के माध्यम से भारतेंदु , महावीर प्रसाद द्विवेदी , प्रेमचन्द, निराला जैसे अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने सामाजिक कुरीतियों की तीखी आलोचना की है| आलोचना का नवजागरण में अपना अलग योगदान है| रामविलास शर्मा कहते हैं " ये लेखक गद्य के लिए गद्य नहीं लिख रहे थे , न भाषा सुधार के लिए भाषा सुधार रहे थे | भाषा उनके लिए साधन थी, साध्य नहीं| वह हिंदी गद्य के रूप में सामाजिक उत्थान का एक ऐसा प्रबल शस्त्र गढ़ रहे थे, जो बिखरे हुए हिंदी भाषियों को एक करे और उन्हें स्वाधीनता ,शिक्षा और अपने जनवादी अधिकारों के लिए लड़ना सिखाए|"भारतेंदु हरिश्चंद्र और भारतीय नवजागरण की समस्याएं शर्मा रामविलास राजकमल प्रकाशन 1984
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने रीतिकाल की विकृत सामंती संस्कृति को छोड़ कर नवीनता के बीज बोए| इनके इस कृत्य में शेक्सपीयर के मर्चेंट ऑफ वेनिस के हिंदी अनुवाद दुर्लभ बंधु के सहयोग से इंकार नहीं किया जा सकता|इसलिए भी हिंदी साहित्य में आधुनिक कल का प्रारंभ भारतेंदु से माना जाता है | इन्होंने ना केवल साहित्य व अनुवाद का सृजन किया बल्कि अपने मंडल के माध्यम से समकालीन साहित्यकारों को प्रेरित भी किया| उनके पक्ष महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कमान संभाली, और 20 से अधिक पुस्तकों के अनुवाद किया इनमें बड़ी संख्या में संस्कृत की कृतियां थीं| इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध बेकन विचार ग्रंथावली, हावर्ड स्पेंसर की रचना एजुकेशन का शिक्षा , जे एस मिल के ग्रंथ लिबर्टी का अनुवाद आदि हैं| दी रिडल ऑफ यूनिवर्स का आचार्य शुक्ल ने हिंदी में विश्व प्रपंच नाम से अनुवाद किया| हैकल की यह रचना विज्ञान से दर्शन का तार्किक सम्बन्ध स्थापित करती है| यह प्रगतिशील समाज में इस कदर विद्धमान थी कि तत्काल यूरोप की सभी भाषाओं में इसके अनुवाद हुए| प्रो देवशंकर नवीन ने लिखा है कि "प्राणीविज्ञान की इस कृति का अनुवाद आचार्य शुक्ल ने उस समय किया जब हिंदी में कोई वैज्ञानिक शब्दकोश नहीं था| आचार्य शुक्ल ने स्वयं उसके लिए शब्द गढ़े" और यह पुस्तक भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में ख्याति प्राप्त भारतेंदु जी ने देश की गरीबी , पराधीनता ,शासकों के अमानवीय शोषण के चित्रण को अपना लक्ष्य बनाया|