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वीर दुद्धा
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दुद्धा एक होनहार,वीर और साहसिक बालक था । अधिकतर लोग स्वार्थी होते हैं लेकिन बालक दुद्धा
में निस्वार्थ गुण थे। हल्दीघाटी के युद्ध का समय था । युद्ध से प्रजा में भोजन संबंधी समस्या आ रही थी। लोग खाना नहीं जुटा पा रहे थे , दुद्धा भील के पिता पूंजा भील एक वीर योद्धा थे और बालक में भी अपने पिता की तरह ही गुण थे, लेकिन पिता अपने वतन की रक्षा करते हुए हल्दीघाटी युद्ध में शहीद हो गए । बालक को भूख लगी थी , उसकी मां ने दुश्मनों से बचकर कहीं से भोजन का प्रबंध किया, लेकिन बालक ने भोजन नहीं किया वह वीर बालक सोच में पड़ गया की महाराणा प्रताप और उनके परिवार ने 7 दिनों से कुछ नहीं खाया उनकी क्या हालत हो रही होगी ,यही सोच कर वह बालक अपनी मां से कहने लगा कि वह महाराणा प्रताप और उनके परिवार के लिए भोजन ले जाएगा। दुद्धा की मां सोच में पड़ गई कि यह बालक कैसे महाराणा प्रताप के लिए भोजन ले जा पाएगा ? लेकिन उस बालक की जिद्द के आगे मां को झुकना पड़ा और वह बालक रोटी लेकर पहाड़ों कि तरफ दौड़ पड़ा वह बालक तेज रफ्तार से दौड़ रहा था महाराणा प्रताप के ठिकाने की तरफ जाने के लिए राह में कई दिक्कतें आई हजारों पत्थर आए, राह
मे गिरता पड़ता उठता पहाड़ों की तरफ भागे जा रहा था कि तभी अचानक पेड़ों के बीच से कहीं से एक चमकीली चीज उसे आकर लगी और उसका हाथ कट गया वह बालक समझ नहीं पाया वह समझा की कोई मामूली चोट लगी है । उसके मन में यही चल रहा था कि वह महाराणा प्रताप को ले जाकर रोटी दे दे और उनका परिवार भोजन कर सके । वह भीलपुत्र बालक दौड़ता दौड़ता महाराणा प्रताप के ठिकाने की तरफ बढ़ता चला गया, वह बालक खून में लथपथ हो चुका था आखिरकार और दौड़ता हुआ महाराणा प्रताप के पास पहुंचा और अपनी अंतिम सांस लेते हुए कहा महाराणा जी आपके लिए भोजन लाया हूं । महाराणा प्रताप के आंखो में आंसु थे ।
हल्दीघाटी के युद्ध में कई भीलों ने निस्वार्थ भाव से महाराणा प्रताप का साथ दिया ,इसका सिर्फ यही कारण था कि महाराणा प्रताप का व्यवहार भील ।लोगो से अच्छा था । इसलिए महाराणा प्रताप ने भी भील लोगो के महत्व को समझा और भील लोगो के बलिदान के लिए मेवाड़ चिन्ह में भील अंकित किया।