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राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
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[[चित्र:শহীদ রাজেন্দ্র লাহিড়ী.jpg|right|thumb|200px|महान बलिदानी राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी]]राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी (बाँग्ला:রাজেন্দ্র নাথ লাহিড়ী, २९ जून १९०१ -१७ दिसम्बर १९२७) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानी थे। युवा क्रान्तिकारी लाहिड़ी की प्रसिद्धि काकोरी काण्ड के एक प्रमुख अभियुक्त के रूप में हैं।http://www.samaylive.com/article-analysis-in-hindi/special-days-in-hindi/136511/history-of-indian-freedom-kakori-martyrdom-on-december-19-chandr.html काकोरी कांड:जीये वतन के लिए, मरे वतन के लिए 2 जुलाई 2012 https://web.archive.org/web/20120510011818/http://www.samaylive.com/article-analysis-in-hindi/special-days-in-hindi/136511/history-of-indian-freedom-kakori-martyrdom-on-december-19-chandr.html 10 मई 2012 dead वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के प्रमुख सदस्य थे जिसका ध्येय भारत को ब्रितानी दासता से मुक्त करना था।
जय हिंद जय भारत
संक्षिप्त जीवनी
thumb|right|200px|गोण्डा जिला कारागार के फाँसी गृह में स्थापित राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जीवनवृत्त शिलापट्ट
बंगाल (आज का बांग्लादेश) में पबना जिले के अन्तर्गत मड़याँ (मोहनपुर) गाँव में २९ जून १९०१ के दिन क्षिति मोहन लाहिड़ी के घर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम बसन्त कुमारी था। उनके जन्म के समय पिता क्रान्तिकारी क्षिति मोहन लाहिड़ी व बड़े भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन समिति की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे। दिल में राष्ट्र-प्रेम की चिन्गारी लेकर मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वे बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी पहुँचे। वाराणसी में ही उनकी शिक्षा दीक्षा सम्पन्न हुई। काकोरी काण्ड के दौरान लाहिड़ी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में एम० ए० (प्रथम वर्ष) के छात्र थे। १७ दिसम्बर १९२७ को गोण्डा के जिला कारागार में अपने साथियों से दो दिन पहले उन्हें फाँसी दे दी गयी। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को देश-प्रेम और निर्भीकता की भावना विरासत में मिली थी। राजेन्द्रनाथ काशी की धार्मिक नगरी में पढाई करने गये थे किन्तु संयोगवश वहाँ पहले से ही निवास कर रहे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आ गये। राजेन्द्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों को पहचान कर शचीन दा ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के सम्पादन का दायित्व तो दिया ही, अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी सौंप दिया। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए उन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की गुप्त बैठकों में आमन्त्रित भी किया जाने लगा।काकोरी के जाँबाज ‘लाहिड़ी’ आज के दिन फाँसी पर लटके थे!जुलाई 2020 InternetArchiveBot
अध्ययन प्रेमी
thumb|right|200px|गोण्डा जिला कारागार के फाँसीघर में राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी की प्रतिमापठन पाठन की अत्यधिक रूचि तथा बाँग्ला साहित्य के प्रति स्वाभाविक प्रेम के कारण लाहिड़ी अपने भाइयों के साथ मिलकर अपनी माता की स्मृति में बसंतकुमारी नाम का एक पारिवारिक पुस्तकालय स्थापित कर लिया था। काकोरी काण्ड में गिरफ्तारी के समय ये काशी हिंदू विश्वविद्यालय की बाँग्ला साहित्य परिषद के मंत्री थे। इनके लेख बाँग्ला के बंगवाणी और शंख आदि पत्रों में छपा करते थे। लाहिड़ी ही बनारस के क्रांतिकारियों के हस्तलिखित पत्र अग्रदूत के प्रवर्तक थे। इनका लगातार यह प्रयास रहता था कि क्रांतिकारी दल का प्रत्येक सदस्य अपने विचारों को लेख के रूप में दर्ज़ करे।हिंदू पंच, बलिदान अंक, संपादक- कमलादत्त पाण्डेय, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नयी दिल्ली, चौथी आवृत्ति, २0११, आईएसबीएन : ९७८ ८१ २३७ १८९0 ३ ; पृष्ठ- १५७
काकोरी काण्ड
काकोरी काण्ड
thumb|right|200px|फाँसी की फन्दा और लाहिड़ी का अन्तिम सन्देश
thumb|right|200px|फाँसी का तख्ता जिस पर लाहिड़ी को फाँसी दी गयी
क्रान्तिकारियों द्वारा चलाये जा रहे स्वतन्त्रता-आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था को देखते हुए शाहजहाँपुर में दल के सामरिक विभाग के प्रमुख पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के निवास पर हुई बैठक में राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी भी सम्मिलित हुए जिसमें सभी क्रान्तिकारियों ने एकमत से अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना को अन्तिम रूप दिया था। https://web.archive.org/web/20211217084956/https://phondia.com/rajendra-nath-lahiri-in-hindi/ 17 दिसंबर 2021 इस योजना में लाहिड़ी का अहम किरदार था क्योंकि उन्होंने ही अशफाक उल्ला खाँ के ट्रेन न लूटने के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप अशफाक ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया था।
इस योजना को अंजाम देने के लिये लाहिड़ी ने काकोरी से ट्रेन छूटते ही जंज़ीर खींच कर उसे रोक लिया और ९ अगस्त १९२५ की शाम सहारनपुर से चलकर लखनऊ पहुँचने वाली आठ डाउन ट्रेन पर क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अशफाक उल्ला खाँ और चन्द्रशेखर आजाद व ६ अन्य सहयोगियों की मदद से धावा बोल दिया। कुल १० नवयुवकों ने मिलकर ट्रेन में जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया। मजे की बात यह कि उसी ट्रेन में सफर कर रहे अंग्रेज सैनिकों तक की हिम्मत न हुई कि वे मुकाबला करने को आगे आते।
काकोरी काण्ड के बाद बिस्मिल ने लाहिड़ी को बम बनाने का प्रशिक्षण लेने बंगाल भेज दिया। राजेन्द्र बाबू कलकत्ता गये और वहाँ से कुछ दूर स्थित दक्षिणेश्वर में उन्होंने बम बनाने का सामान इकट्ठा किया। अभी वे पूरी तरह से प्रशिक्षित भी न हो पाये थे कि किसी साथी की असावधानी से एक बम फट गया और बम का धमाका सुनकर पुलिस आ गयी। कुल ९ साथियों के साथ राजेन्द्र भी गिरफ्तार हो गये। उन पर मुकदमा दायर किया और१० वर्ष की सजा हुई जो अपील करने पर ५ वर्ष कर दी गयी। बाद में ब्रिटिश राज ने दल के सभी प्रमुख क्रान्तिकारियों पर काकोरी काण्ड के नाम से मुकदमा दायर करते हुए सभी पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने तथा खजाना लूटने का न केवल आरोप लगाया बल्कि झूठी गवाहियाँ व मनगढ़न्त प्रमाण पेश कर उसे सही साबित भी कर दिखाया। राजेन्द्र लाहिड़ी को काकोरी काण्ड में शामिल करने के लिये बंगाल से लखनऊ लाया गया।
तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार टस से मस न हुई और अन्तत: राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह- एक साथ चार व्यक्तियों को फाँसी की सजा सुना दी गयी। लाहिड़ी को अन्य क्रान्तिकारियों से दो दिन पूर्व १७ दिसम्बर को ही फाँसी दे दी गयी।http://www.amarujala.com/city/Gonda/Gonda-24855-130.html दो दिन पहले दी थी लाहिड़ी को फाँसी 30 जून 2012 https://web.archive.org/web/20111217214213/http://www.amarujala.com/city/Gonda/Gonda-24855-130.html 17 दिसंबर 2011 dead
आजादी के इस दीवाने ने हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमने से पहले वंदे मातरम् की हुंकार भरते हुए कहा था- "मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।"
लाहिड़ी दिवस
thumb|right|200px|फाँसी की वेदी और फन्दे का रस्स जिस पर लाहिड़ी को फाँसी दी गयी
thumb|right|200px|लाहिड़ी के सम्मान में कविता
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले में एक क्रान्तिकारी महानायक का स्थान प्राप्त है। प्रति वर्ष १७ दिसम्बर स्थानीय जिला प्रशासन के लिये राजकीय महत्व का दिवस होता है। इस दिन जिले के समस्त विद्यालयों एवं प्रशासनिक प्रतिष्ठानों में राजकीय उत्सव का माहौल रहता है। सभी सम्बद्ध प्रतिष्ठानों में शहीद लाहिड़ी के सम्मान में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।बलिदान दिवस 17 कोसितंबर 2021 InternetArchiveBot इन समस्त सांस्कृतिक आयोजनों का केन्द्र बिन्दु गोण्डा का जिला कारागार होता है। कारागार के फाँसीघर में स्थापित लाहिड़ी की प्रतिमा के समक्ष यज्ञ का आयोजन किया जाता है।लाहिड़ी के नाम 17 दिसंबरसितंबर 2021 InternetArchiveBot लाहिड़ी स्मारक स्थल तक बनेगी सीसी रोड
फाँसी के दिन भी सुबह सुबह लाहिड़ी व्यायाम कर रहे थे। जेलर ने पूछा कि मरने के पहले व्यायाम का क्या प्रयोजन है? लाहिड़ी ने निर्वेद भाव से उत्तर दिया - "जेलर साब! चूँकि मैं हिन्दू हूँ और पुनर्जन्म में मेरी अटूट आस्था है, अतः अगले जन्म में मैं स्वस्थ शरीर के साथ ही पैदा होना चाहता हूँ ताकि अपने अधूरे कार्यों को पूरा कर देश को स्वतन्त्र करा सकूँ। इसीलिए मैं रोज सुबह व्यायाम करता हूँ। आज मेरे जीवन का सर्वाधिक गौरवशाली दिवस है तो यह क्रम मैं कैसे तोड़ सकता हूँ?" यज्ञ के आयोजन के पार्श्व में लाहिड़ी द्वारा जेलर को दिया गया अन्तिम सन्देश एक शिलापट्ट पर अंकित है - "मैं मरने नहीं जा रहा, अपितु भारत को स्वतन्त्र कराने के लिये पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।" इसके अतिरिक्त इन समस्त घटनाओं का उल्लेख भी गोण्डा जिला कारागार के फाँसीगृह में स्थापित लाहिड़ी जीवनवृत्त शिलापट्ट' पर अंकित है। धर्म सम्प्रदाय से ऊपर उठकर लाहिड़ी की अन्तिम इच्छा का सम्मान करने की यह परम्परा आज तक कायम है।बलिदान दिवस पर शिद्दत से याद किये गये लाहिड़ी लाहिड़ी की क्रान्तिकारी महानायक छवि को पुष्ट करती कविता शहीद लाहिड़ी के प्रति'' भी जिला कारागार के फाँसीगृह में स्थापित एक अन्य शिलापट्ट पर अंकित है।
सन्दर्भ
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन
काकोरी काण्ड
बाहरी कड़ियाँ
'स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ' -
'रख दे कोई जरा सी खाके वतन कफन में' जून 2020 InternetArchiveBot
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