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गेन्कान
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गेन्कान (जापानी: 玄関) जापान के पारम्परिक गृह, अपार्टमेण्ट अथवा भवनों में प्रवेशद्वार का क्षेत्र होता है, जो एक प्रकार से प्रवेश-पर्व तथा पादत्राण-स्थान का संयोग है। यह सामान्यतः भवन के भीतर, द्वार के ठीक सम्मुख स्थित होता है। गेन्कान का मुख्य प्रयोजन गृह अथवा भवन के आन्तरिक भाग में प्रवेश करने से पूर्व पादत्राण (जूते) उतारना होता है।
द्वितीयक प्रयोजन यह है कि आगन्तुक बिना गृह के भीतर प्रवेश किये, केवल गेन्कान की सीढ़ी पर खड़े होकर संक्षिप्त भेंट कर सके। उदाहरणार्थ, अंग्रेज़ीभाषी देशों में जहाँ पिज़्ज़ा-वितरक प्रायः बरामदे पर खड़े होकर खुले द्वार से वार्तालाप करता है, वहीं जापान में परम्परागत रूप से भोजन-वितरण गेन्कान की सीढ़ी पर ही सम्पन्न होता था।
जूते उतारने के पश्चात् व्यक्ति को गेन्कान के टाइल अथवा कंक्रीट-मण्डित तल (三和土, तातकि) पर मोज़े अथवा नंगे पाँव नहीं चलना चाहिए, जिससे गृह में मलिनता न प्रवेश करे। भीतर प्रवेश करने पर प्रायः व्यक्ति उवाबाकि (上履き) धारण करता है, ये गृह-भीतरी उपयोग हेतु विशेष चप्पल अथवा पादत्राण होते हैं।
गेन्कान अन्य भवनों में भी कभी-कभी मिलते हैं, विशेषतः प्राचीन व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में।
== अभिकल्प ==
गेन्कान सामान्यतः भूमि में कुछ गहरे बनाये जाते हैं, जिससे बाहर से आयी धूल-मिट्टी उसी में सीमित रहे। सीढ़ी की ऊँचाई अत्यल्प (५–१० सेण्टीमीटर/२.०–३.९ इंच) से लेकर पिण्डली अथवा घुटने तक हो सकती है। अपार्टमेण्टों में गेन्कान प्रायः गृहों की अपेक्षा छोटे होते हैं, और कभी-कभी भूमि-स्तर में कोई भिन्नता नहीं होती; केवल भिन्न प्रकार की फ़र्श-सामग्री द्वारा गेन्कान को पृथक् किया जाता है।
विद्यालयों तथा सार्वजनिक स्नानगृहों (銭湯, सेन्तो) में विशाल पादत्राण-कोष्ठक (下駄箱, गेताबको) होते हैं, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति के बाह्य-पादत्राण हेतु पृथक् खण्ड होते हैं। निजी गृहों में गेताबको प्रायः अनुपस्थित रहते हैं, और जूते सामान्यतः द्वार की ओर मुख किये रखे जाते हैं, जिससे बाहर जाते समय उन्हें सहजता से पहना जा सके।
== इतिहास ==
गृह में प्रवेश करने से पूर्व पादत्राण उतारने की परम्परा लगभग एक सहस्राब्दि पूर्व, प्रागैतिहासिक उन्नत-मञ्च-गृहों के युग से चली आ रही मानी जाती है। यह परम्परा आज तक निरन्तर बनी हुई है, यहाँ तक कि जापानी गृहों के पाश्चात्यीकरण (मेइजी काल- १८६८–१९१२ ईस्वी; विक्रम संवत् १९२५–१९६९; शक संवत् १७९०–१८३४; कलियुग ४९६९–५०१३) के पश्चात् भी।[४]
== सन्दर्भ ==
== बाहरी कड़ियाँ ==
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