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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

फ़ज़ले हक़ खैराबादी

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अल्लामा फ़ज़्ल-ए-हक़ 7 अप्रैल 1796जफरजरपर 1861 08 19 अंडमान द्वीपसमूह, ब्रिटिश इंडिया खैराबाद, अवध शायर / कवी सव्रतुल हिंदिया अल्लामा फ़ज़ले-हक़ खैराबादी (1797-1861) अल्लामा फज़ले हक खैराबादी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के क्रान्तिकारी, तर्कशास्त्री व उर्दू अरबी, फारसी के प्रसिद्ध शायर थे। उनका जन्म 1797 ई• में उत्तर प्रदेश राज्य के ज़िला सीतापुर के शहर खैराबाद में हुआ था। प्रारम्भिक जीवन व विद्याभ्यास इनका जन्म मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था। उन्होंने धार्मिक रीति रिवाजों से शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा सम्पन्न होने के पश्चात वह खैराबाद में ही अध्यापन कार्य करने लगे और फिर 1816 ई• में उन्नीस वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार में नौकरी कर ली। लेकिन एक ऐसा समय आया जब उन्होंने नौकरी नहीं करने का मन बना लिया और 1831 ई• में सरकारी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के पश्चात वह दिल्ली के मुग़ल दरबार में कामकाज देखने लगे और शायरो की महफिलें से वाबस्ता होने लगे। सामाजिक जीवन 1857 के दौर में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के ज़ुल्मो की हद हो गई तो हिन्दुस्तान के राजा-महाराजाओं व महारानियो तथा नवबो व मौलवियों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकलने का प्रयास किया और ज़बरदस्त विद्रोह की योजना बनाई। जिसका नेतृत्व क्रांति के महानायक मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा किया गया और अल्लामा फज़ले हक खैराबादी ने अहम भूमिका निभाई । अल्लामा फज़ले हक खैराबादी द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा देकर मुस्लिम समुदाय को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल होने की अपील की। जिसका लाभ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर व अन्य विद्रोही नेताओं को मिला। मौलाना द्वारा फतवा जारी करने के बाद से ही अंग्रेज़ो द्वारा उनकी तलाश शुरू हो गई। 1857 की क्रांति असफल हो जाने के बाद मौलाना बचते बचाते दिल्ली से खैराबाद तशरीफ ले आये। खैराबाद में अंग्रेजों को भनक लग गई और 30 जनवरी 1859 को उन्हें खैराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया। खैराबाद से उन्हें लखनऊ सेंशन कोर्ट ले जाया गया और वहीं पर मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमे की पैरवी उन्होंने खुद की। कोई वकील नियुक्त नहीं किया। मौलाना पर अग्रेंजों के खिलाफ जेहाद का फतवा जारी करने तथा लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने के संगीन आरोप लगाये गये। मुकदमे की वार्ता के समय उन्होंने अपने अपराध को स्वीकार किया पर झूठ नहीं बोला और कहा- हॉ वह फतवा सही है, वह मेरा लिखा हुआ था और आज भी मैं अपने फतवे पर कायम हूं। आरोपो को स्वीकार करने के पश्चात उन्हें काला पानी की सज़ा सुनाई गई और सारी जायदाद ज़ब्त करने का आदेश जारी किया गया। अंडमान निकोबार (सेलुलर जेल) में ही 20 अगस्त 1861 ई• में उनका इंतकाल हो गया। साहित्यकार के रूप में अल्लामा साहब ने अपनी शायरी को एक नया मिजाज़ बख्शा है। उन्होंने अपने कलामो में अहसास व जज़्बात का बेहद इज़हार किया है। अल्लामा का नाम ऊर्दू ,फारसी व शायरी की तारीख में सुनहरे हुरूफो मे लिखा जायेगा क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी ऊर्दू,फारसी भाषा के लिए खिदमते अंजाम दी।https://www.qadrishattari.xyz/p/fazl-e-haq-khairabadi.html Fazl e Haq Khairabadi en 2022-02-07 Life फजल-ए-हक का जन्म 1796 या 1797 में सीतापुर के खैराबाद में हुआ था। उनके पिता सदर अल-सदर थे, जो धार्मिक मामलों के संबंध में मुगलों के मुख्य सलाहकार थे।Tazkirah Mashāhīr-e-Hind: Karwān-e-Rafta Asir Adrawi April 2016 Darul Moallifeen 2nd Deoband 210–211 Urdu Mawlāna Fazl-e-Haq KhairabadiHUSAIN IQBAL 1987 Fazle Haq of Khairabad—A Scholarly Rebel of 1857 Proceedings of the Indian History Congress 48 355–365 2249-1937 44141709 13 साल की उम्र में वे शिक्षक बन गए। 1828 में, उन्हें क़ज़ा विभाग में मुफ्ती के पद पर नियुक्त किया गया था। फ़ज़्ल-ए-हक़ सिर्फ़ इस्लामी पढ़ाई और धर्म के विद्वान ही नहीं थे, बल्कि उर्दू, अरबी और फ़ारसी के बड़े साहित्यकार भी थे। उनके नाम से अरबी में 400 से ज़्यादा शेर मिलते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब के निवेदन पर उन्होंने उनका पहला दीवान (कविताओं का संग्रह) तैयार किया था। वह हनफ़ी मज़हबी विचारधारा को मानते थे और मातुरीदी स्कूल के आलिम (धर्मशास्त्री) भी थे। साथ ही वे एक अच्छे शायर भी थे। Life फजल-ए-हक का जन्म 1796 या 1797 में सीतापुर के खैराबाद में हुआ था। उनके पिता सदर अल-सदर थे, जो धार्मिक मामलों के संबंध में मुगलों के मुख्य सलाहकार थे।Tazkirah Mashāhīr-e-Hind: Karwān-e-Rafta Asir Adrawi April 2016 Darul Moallifeen 2nd Deoband 210–211 Urdu Mawlāna Fazl-e-Haq KhairabadiHUSAIN IQBAL 1987 Fazle Haq of Khairabad—A Scholarly Rebel of 1857 Proceedings of the Indian History Congress 48 355–365 2249-1937 44141709 13 साल की उम्र में वे शिक्षक बन गए। 1828 में, उन्हें क़ज़ा विभाग में मुफ्ती के पद पर नियुक्त किया गया था। फ़ज़्ल-ए-हक़ सिर्फ़ इस्लामी पढ़ाई और धर्म के विद्वान ही नहीं थे, बल्कि उर्दू, अरबी और फ़ारसी के बड़े साहित्यकार भी थे। उनके नाम से अरबी में 400 से ज़्यादा शेर मिलते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब के निवेदन पर उन्होंने उनका पहला दीवान (कविताओं का संग्रह) तैयार किया था। वह हनफ़ी मज़हबी विचारधारा को मानते थे और मातुरीदी स्कूल के आलिम (धर्मशास्त्री) भी थे। साथ ही वे एक अच्छे शायर भी थे। उनके गहरे ज्ञान और विद्वत्ता के कारण उन्हें “अल्लामा” की उपाधि दी गई थी। बाद में उन्हें एक महान सूफ़ी के रूप में भी सम्मानित किया गया। उन्हें तर्कशास्त्र (मंतक), दर्शन और साहित्य का इमाम कहा जाता था। विद्वानों के बीच वे फ़तवा (धार्मिक निर्णय) देने के सर्वोच्च अधिकारी माने जाते थे।https://books.google.com/books?id=kl08TgBBxHIC&pg=PA213 Ali Sardar Jafri Anil Sehgal Bharatiya Jnanpith 2001 978-81-263-0671-8 213– उनके पास तेज़ दिमाग़ और ग़ज़ब की सूझ-बूझ थी। उनके मिर्ज़ा ग़ालिब और उस समय के मशहूर शायरों, लेखकों और विद्वानों के साथ होने वाली मज़ेदार बातचीतों (हाज़िरजवाबी की कहानियों) के कई किस्से मशहूर हैं। उन्होंने अपने बेटे अब्दुल हक़ ख़ैराबादी के साथ मिलकर उत्तर भारत में मदरसा ख़ैराबाद की स्थापना की, जहाँ कई बड़े विद्वान तैयार हुए। उन्होंने अरबी भाषा में रिसाला अल-थौरत अल-हिंदिय्या नामक किताब लिखी और 1857 के विद्रोह पर अल-थौरत अल-हिंदिय्या नाम से एक विवरण भी लिखा।HUSAIN IQBAL 1987 Fazle Haq of Khairabad—A Scholarly Rebel of 1857 Proceedings of the Indian History Congress 48 355–365 2249-1937 44141709HUSAIN, IQBAL (1987). "Fazle Haq of Khairabad—A Scholarly Rebel of 1857". Proceedings of the Indian History Congress. 48: 355–365. ISSN 2249-1937. JSTOR 44141709. वहाबी और देवबंदी मान्यताओं के खिलाफ फतवे अपने करियर के दौरान ख़ैराबादी ने वहाबियों के ख़िलाफ़ कई मसनवियाँ (लंबी काव्य रचनाएँ) लिखीं।1825 में, ख़ैराबादी ने इस्माईल देहलवी के उस मत (सिद्धांत) के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया था, जिसमें यह कहा गया था कि अल्लाह के लिए झूठ बोलना संभव है — जिसे “इमकान-उल-क़िज़्ब” कहा जाता है।इस्माईल देहलवी को बाद में दारुल उलूम देवबंद के विचारों का बौद्धिक पूर्वज माना गया। देवबंद के संस्थापक रशीद अहमद गंगोही ने देहलवी के इसी मत को स्वीकार किया और कहा कि अल्लाह के पास झूठ बोलने की शक्ति है।इस मत को “इमकान-उल-क़िज़्ब” कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि क्योंकि अल्लाह सर्वशक्तिमान है, इसलिए वह झूठ बोलने की क्षमता रखता है (हालाँकि ऐसा करना उसकी शान के ख़िलाफ़ है)।गंगोही ने यह विचार भी समर्थन किया कि अल्लाह चाहे तो हज़रत मुहम्मद ﷺ के बाद और नबी पैदा कर सकता है (इमकान-उन-नज़ीर) यानी अन्य नबी भी मुहम्मद ﷺ के समान हो सकते हैं। अल्लामा फ़ज़्ल-ए-हक़ ख़ैराबादी ने इन सिद्धांतों का कड़ा खंडन किया। उन्होंने लिखा कि कुरआन और हदीस के अनुसार, हज़रत मुहम्मद ﷺ आख़िरी नबी हैं, और उनके बाद न कोई नबी हो सकता है, न कोई रसूल (संदेशवाहक)।उन्होंने कहा कि अगर कोई यह माने कि मुहम्मद ﷺ के बाद कोई और मुहम्मद हो सकता है, तो इसका मतलब यह होगा कि अल्लाह ने कुरआन में जो फ़रमाया है, उसके विपरीत काम किया, यानी अल्लाह ने झूठ बोला। जबकि झूठ बोलना एक कमी (ख़ामी) है, और अल्लाह के लिए किसी भी तरह की कमी का होना असंभव है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ जिहाद जैसे ही भारतीयों ने ब्रिटिश कब्जे के खिलाफ संघर्ष करना शुरू किया, खैराबादी ने मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के साथ कई निजी बैठकें कीं, जो मई 1857 तक जारी रहीं। 26 जून, 1857 को जब जनरल बख्त खान अपनी 14000 की सेना के साथ बरेली से दिल्ली पहुंचे, तो खैराबादी ने शुक्रवार का उपदेश दिया, जिसमें कई मुस्लिम विद्वानों ने भाग लिया और औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ जिहाद का समर्थन करते हुए एक धार्मिक फरमान जारी किया। फतवे पर सदरउद्दीन अज़ुरदा, अब्दुल कादिर, फैजुल्ला देहलवी, फैज़ अहमद बदायुनी, वजीर खान और सैयद मुबारक शाह रामपुरी ने हस्ताक्षर किए थे। इस शिलालेख के माध्यम से, उन्होंने लोगों को 1857 के विद्रोह में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।https://www.dnaindia.com/analysis/column-andaman-s-cellular-jail-holds-lessons-for-the-current-indian-polity-2430535 Andaman's Cellular jail holds lessons for the current Indian polity Sircar Jawhar 8 May 2017 DNA India https://web.archive.org/web/20210512135933/https://www.dnaindia.com/analysis/column-andaman-s-cellular-jail-holds-lessons-for-the-current-indian-polity-2430535 12 May 2021 12 May 2021https://books.google.com/books?id=kl08TgBBxHIC&pg=PA213 Ali Sardar Jafri Bharatiya Jnanpith 2001 9788126306718 इसके बाद, अंग्रेजों ने खैराबादी के आदेश के जारी होने के बाद, अपने हितों की रक्षा करने और जिहाद के प्रसार को रोकने के लिए दिल्ली के आसपास लगभग 90,000 की सेना तैनात की।https://nation.com.pk/23-Jan-2021/allama-fazle-haq-khairabadi-the-scholarly-rebel-of-1857 Allama Fazle Haq Khairabadi – the scholarly rebel of 1857 23 January 2021 The Nation https://web.archive.org/web/20210501231702/https://nation.com.pk/23-Jan-2021/allama-fazle-haq-khairabadi-the-scholarly-rebel-of-1857 1 May 2021 12 May 2021"Allama Fazle Haq Khairabadi – the scholarly rebel of 1857". The Nation. 23 January 2021. Archived from the original on 1 May 2021. Retrieved 12 May 2021.https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-independence-day-special-maulana-fazle-haq-khairabadi-contribution-of-freedom-fight-19488148.html Independence Day Special: अल्लामा फजले हक को फातवा देने पर मिली थी काला पानी की सजा Lucknow News Dainik Jagran https://web.archive.org/web/20210512092140/https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-independence-day-special-maulana-fazle-haq-khairabadi-contribution-of-freedom-fight-19488148.html 12 May 2021 12 May 2021"Independence Day Special: अल्लामा फजले हक को फातवा देने पर मिली थी काला पानी की सजा Lucknow News". Dainik Jagran. Archived from the original on 12 May 2021. Retrieved 12 May 2021. बाद में, उन्हें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कालापानी जेल में निर्वासित कर दिया गया।http://twocircles.net/2012feb01/seminar_allamafazlehaqkhairabadi_held_bhiwandi.html Seminar on Allama Fazle Haq Khairabadi held in Bhiwandi 1 February 2012 TwoCircles.net 14 July 2020 https://web.archive.org/web/20200714145740/http://twocircles.net/2012feb01/seminar_allamafazlehaqkhairabadi_held_bhiwandi.html 14 July 2020https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/27559/9/09_chapter%204.pdf The role of muslims in the pre independence politics in India: a historical study Sher Ali 5 November 2014 Faculty of Fine Arts, Shri Jagdishprasad Jhabarmal Tibarewala University Jhunjhunu, Rajasthan 125 14 July 2020 https://web.archive.org/web/20200716210355/https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/27559/9/09_chapter%204.pdf 16 July 20202008 The Role of Popular Muslim Movements https://books.google.com/books?id=R9QMAQAAMAAJ&q=Khairabadi The American Journal of Islamic Social Sciences en Indiana University Jointly published by the Association of Muslim Social Scientists; International Institute of Islamic Thought 25 1–3 150 https://web.archive.org/web/20240210114516/https://books.google.com/books?id=R9QMAQAAMAAJ&q=Khairabadi 10 February 2024 14 July 2020https://books.google.com/books?id=PLO8mq8aSBkC&pg=PA43 Ghalib, Gandhi and the Gita Vivek Iyer Polyglot Publications London 2012 978-0-9550628-3-4 43– उन्हें 30 जनवरी, 1859 को खैराबाद में हिंसा भड़काने के आरोप में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें हत्या को प्रोत्साहित करने और विद्रोह में भूमिका निभाने का दोषी पाया गया। अधिकारियों ने उन्हें "असाधारण बुद्धिमत्ता और कुशाग्रता" माना, जिन्हें भारत में अंग्रेजों की उपस्थिति के लिए सबसे खतरनाक खतरे के रूप में माना जाना चाहिए, और इसलिए उन्हें भारतीय मुख्य भूमि से बेदखल किया जाना चाहिए। उन पर विद्रोह के पीछे प्रमुख शक्ति होने का आरोप लगाया गया था, जनता को कंपनी के अधिकार के खिलाफ विद्रोह में उठने के लिए राजी करना, स्वतंत्रता संग्राम कहकर जनता को विद्रोह में शामिल होने के लिए प्रेरित करना और हिंसा भड़काने वाले फतवे जारी करना और भड़काऊ भाषण देना।https://nation.com.pk/23-Jan-2021/allama-fazle-haq-khairabadi-the-scholarly-rebel-of-1857 Allama Fazle Haq Khairabadi – the scholarly rebel of 1857 23 January 2021 The Nation https://web.archive.org/web/20210501231702/https://nation.com.pk/23-Jan-2021/allama-fazle-haq-khairabadi-the-scholarly-rebel-of-1857 1 May 2021 12 May 2021"Allama Fazle Haq Khairabadi – the scholarly rebel of 1857". The Nation. 23 January 2021. Archived from the original on 1 May 2021. Retrieved 12 May 2021.https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-independence-day-special-maulana-fazle-haq-khairabadi-contribution-of-freedom-fight-19488148.html Independence Day Special: अल्लामा फजले हक को फातवा देने पर मिली थी काला पानी की सजा Lucknow News Dainik Jagran https://web.archive.org/web/20210512092140/https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-independence-day-special-maulana-fazle-haq-khairabadi-contribution-of-freedom-fight-19488148.html 12 May 2021 12 May 2021 उन्होंने अपना वकील बनना चुना था और तर्कों और एक ऐसे तरीके का उपयोग करके अपना बचाव किया था जिसमें उन्होंने अपने मामले का बचाव किया था जो इतना आश्वस्त था कि पीठासीन मजिस्ट्रेट उन्हें दोषमुक्त करने के लिए एक निर्णय लिख रहे थे, जब उन्होंने फतवा देने की बात स्वीकार की, यह घोषणा करते हुए कि वह झूठ नहीं बोल सकते। उन्हें अंडमान द्वीप समूह में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और उनकी संपत्ति को अवध अदालत के न्यायिक आयुक्त द्वारा जब्त कर लिया गया था। वे 8 अक्टूबर, 1859 को भाप से चलने वाले युद्धपोत फायर क्वीन पर सवार होकर अंडमान द्वीप पहुंचे। 1861 में अपनी मृत्यु तक वे वहीं कैद रहे। युद्ध के प्रकोप के प्रमुख कारणों में से एक लोगों के बीच डर था कि ईसाई ब्रिटिश सरकार उनके धर्मों को नष्ट करने और भारतीयों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने जा रही थी।https://nation.com.pk/23-Jan-2021/allama-fazle-haq-khairabadi-the-scholarly-rebel-of-1857 Allama Fazle Haq Khairabadi – the scholarly rebel of 1857 23 January 2021 The Nation https://web.archive.org/web/20210501231702/https://nation.com.pk/23-Jan-2021/allama-fazle-haq-khairabadi-the-scholarly-rebel-of-1857 1 May 2021 12 May 2021 सन्दर्भ श्रेणी:लेखक श्रेणी:उर्दू शायर श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी