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मेरु प्रस्तार
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गणित में, मेरु प्रस्तार या हलायुध त्रिकोण या पास्कल त्रिकोण (पास्कल ट्रायंगल) द्विपद गुणांकों को त्रिभुज के रूप में प्रस्तुत करने से बनता है। पश्चिमी जगत् में इस का नाम विदेशी गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल के नाम पर रखा दिया गया। किन्तु पास्कल से पहले अनेक गणितज्ञों ने इस का अध्ययन किया है, उदाहरण : भारत के पिंगलाचार्य और जैन ग्रंथों मेंhttps://mathshistory.st-andrews.ac.uk/Projects/Pearce/chapter-6/ Jainism Maths History en 2020-09-24, चीन, परसिया, जर्मनी आदि के गणितज्ञ।
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मेरु प्रस्तार की छः पंक्तियां
मेरु प्रस्तार का सबसे पहला वर्णन पिंगल के छन्दशास्त्र में है। जनश्रुति के अनुसार पिंगल महावैयाकरण पाणिनि के अनुज थे। इन का काल ४०० ईपू से २०० ईपू॰ अनुमानित है। छन्दों के विभेद को वर्णित करने वाला 'मेरुप्रस्तार' (मेरु पर्वत की सीढ़ी) पास्कल (ब्लेज़ पास्कल १६२३-१६६२) के त्रिभुज से तुलनीय बनता है।
पिंगल
पिंगल द्वारा दिये गये मेरुप्रस्तार (Pyramidal expansion) नियम की व्याख्या हलायुध ने अपने मृतसंजीवनी में इस प्रकार की है-Binomial theorem in Ancient India https://web.archive.org/web/20171128231252/http://insa.nic.in/writereaddata/UpLoadedFiles/IJHS/Vol01_1_8_AKBag.pdf 28 नवंबर 2017 (अमूल्य कुमार बाघ)
अतोऽनेकद्वित्रिलघुक्रियासिद्यर्थ यावदभिमतं प्रथमप्रस्तारवन्मेरुप्रस्तारं दर्शयति-
परे पूर्णमिति ॥ ८। ३५ ॥
उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तादुभयतोऽर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठकद्वयं लिखेत्।
तस्याप्यधस्तात्रयं तस्याप्यधस्ताच्चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः ॥
तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्। तत्र परे कोष्ठे यद्वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्टयोः पूर्णं निवेशयेत्।
तत्रोभयोः कोष्ठकयोरेकैकमंगं दद्यात्, मध्ये कोष्ठे तु परकोष्टद्वयांकमेकीकृत्य पूर्ण निवेशयेदिति पूर्णशब्दार्थः।
चतुर्थ्यां पंक्तावपि पर्यन्तकोष्ठयोरेकैकमेव स्थापयेत्। मध्यमकोष्ठयोस्तु परकोष्ठद्वयांकमेकीकृत्य पूर्णं त्रिसंख्यारूपं स्थापयेत्।
उत्तरत्राप्ययमेव न्यासः। तत्र द्विकोष्ठायां पंक्तौ एकाक्षरस्य विन्यासः। तत्रैकगुर्वेकलघुवृत्तं भवति। तृतीयायां पंक्तौ द्वयक्षरस्य प्रस्तारः।
तत्रैकं सर्वगुरु, द्वे एकलघुनी, एकं सर्वलघ्विति कोष्ठक्रमेण वृत्तानि भवन्ति ॥ चतुर्थ्यां पंक्तौ त्यक्षरस्य प्रस्तारः।
तत्रैकं सर्वगुरु त्रीण्येकलघूनि त्रीणि द्विलघूनि एकं सर्वलघु ॥ तथा पंचमादिपंक्तावपि सर्वगुर्वादिसर्वलघ्वन्तमेकद्वयादिलघु द्रष्टव्यमिति ॥पृष्ठम्:छन्दःशास्त्रम् (पिंगलः).djvu/३१९सितंबर 2021 InternetArchiveBot
व्याख्या
'मेरु प्रस्तार' या 'पास्कल त्रिकोण' बनाने की विधि सामने के एनिमेशन से स्पष्ट हो जायेगी।
right|thumb|300px|मेरु प्रस्तार (पास्कल त्रिकोण) की निर्माण विधि
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
कटपयादि
प्रत्याहार
यमाताराजभानसलगा
छन्दशास्त्र
भारतीय छन्दशास्त्र
द्विपद प्रमेय
बाहरी कड़ियाँ
Date of Pingala - The Origin of Binary Computation in India
Date of Pingala - Origin of Binary Computation
Binomial theorem in Ancient India
पिंगलछन्दःसूत्रम्सितंबर 2021 InternetArchiveBot (संस्कृत विकिस्रोत)
पिंगल छन्दःरसूत्र
श्रेणी:भारत का वैज्ञानिक चिन्तन